रविवार, 27 अप्रैल 2014

गई भैंस पानी में
एक दिन डेयरी पर पहुँचकर जब हकीम चिलगोजा को पता चला कि आज से दूध पैंतीस रुपए लीटर मिलेगा, तो बिफर पड़े। बड़बड़ाते हुए अपनी पाँच लीटर की डोलची, जिसमें वह सिर्फ पाव भर दूध लेते थे, उठाई और लौट पड़े। मारे ग़ुस्से के तय कर लिया कि आज से दूध का इस्तेमाल बंद। बच्चा तो हैं नहीं, जो बिना दूध के जी नहीं पाएँगे।
लेकिन हकीम चिलगोजा थे चाय के पक्के शौक़ीन। दोपहर होते-होते उनके सिर में भँवरें घूमने लगीं। बोलते तो लगता सिर में गोल-गोल कुछ घूम रहा है। क़दम यहाँ के वहाँ पड़ते। चिड़चिड़ाहट ऊपर से। इसी उलझन में छब्बू पहलवान से भेंट हो गई। छब्बू चाय के शौकीन तो नहीं थे, लेकिन खाने के बाद लीटर-डेढ़ लीटर मट्ठा ज़रूर पीते थे। पहले कभी दूध-दही बेचने का भी धंधा करते थे, लेकिन मन नहीं रमा तो सब छोड़-छाड़कर पहलवानी करने लगे।
सारी बात जानकर वह बोले, ‘‘हकीम जी, कहाँ तक क़समें खाते फिरोगे? दूध के दाम तो बढ़ते ही रहेंगे। आगे चलकर चाय और मट्ठा सपनों में भी नहीं दिखाई देंगे। मेरी मानो तो एक भैंस ले डालो।’’
बात हकीम चिलगोजा को समझ गई। सोचा, दूध के दाम तो सचमुच दिन-दूने, रात-चौगुने बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे में भैंस ख़रीद ली जाए तो सचमुच फ़ायदे का सौदा होगा। ताज़ा-खरा दूध तो मिलेगा ही, गाहे-बगाहे घी-मक्खन भी मिल जाया करेगा। हकीम चिलगोजा ख़यालों में डूब गए।
‘‘कहाँ खो गए, हकीम जी, मैं तो कहता हूँ नफ़ा ही नफ़ा है,’’ छब्बू पहलवान बोले, ‘‘एक औसत भैंस भी रोज़ाना दस-बारह लीटर दूध देती है। जितनी इच्छा हो पियो, दही-मक्खन जमाओ। बचे, सो बेच दो। आम के आम गुठलियों के दाम।’’
सचमुच! हकीम चिलगोजा ने तो यह सोचा भी नहीं था। बात ही बात में तय हो गया कि अगले बुध को सोहावल के नक्ख़ासे में जाकर कोई बढ़िया भैंस ख़रीद लाएँगे। लेकिन बात तय हो जाने के बाद भी हकीम चिलगोजा परेशान-से दिख रहे थे। छब्बू पहलवान ने कुरेदा तो बोले, ‘‘यार छब्बू, तुमने तो दुनिया का रंग-ढंग देख रखा है। मैं ठहरा सीधा-सादा आदमी। तो काले अच्छर से ख़ास पहचान है, काली भैंस से। कहीं ठग-ठगा लिया गया तो ज़िंदगी भर की पूँजी लुट जाएगी। तुम भी साथ क्यों नहीं चले चलते?’’
छब्बू पहलवान अपना सफाचट सिर खुजलाते हुए बोले, ‘‘हकीम जी, आप तो बड़े भाई जैसे हो। भला साथ चलने से कैसे मना कर सकता हूँ? लेकिन एक बात मेरे मन में रही है। कहो तो कह दूँ।’’
‘‘हाँ-हाँ, कहो।’’ हकीम चिलगोजा बोले।
‘‘देखो हकीम जी, जब गाढ़ी कमाई दाँव पर लग रही हो तो आगा-पीछा सब सोचना ही पड़ता है। मान लो कि भैंस ख़रीदकर जाए, लेकिन उसे दुहने वाला कोई हो तो? भैया, भैंस दुहना हँसी-खेल नहीं है, बताए देता हूँ। यह हमारे-आपके जैसों के बस की बात नहीं है।’’
हकीम चिलगोजा ने छब्बू पहलवान की अनुभव भरी बातों को सिर आँखों चढ़ाया। तय हुआ कि कल्लू ग्वाले को भी साथ ले लिया जाए। उसकी राय भी महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि असली काम तो उसी का है।
बात एकदम तय हो चुकी थी कि छब्बू पहलवान को फिर एक आइडिया आया, बोले, ‘‘हकीम जी, एक बात और सुन लो। कल्लू तो दूध दुहकर चला जाएगा। बाक़ी, भैंस का सानी-भूसा कौन करेगा, मैदान में चराएगा कौन? चरवाहों को सीधी और मरखनी भैंसों की ख़ूब जानकारी होती है। मेरे विचार से एक चरवाहा भी साथ लिए चलो।’’
छब्बू पहलवान की सूझ पर हकीम चिलगोजा लाजवाब हो गए। बित्तन चरवाहे को भी साथ ले चलना तय हो गया। 
थोड़ी देर बाद जब दोनों उठने लगे तो हकीम चिलगोजा के दिमाग में भी एक विचार गया। बोले, ‘‘यार छब्बू, भैंस आएगी, तो मैदान में तो खड़ी नहीं रहेगी? उसका छप्पर-खपरैल भी छवाना ही पड़ेगा। क्यों राजगीर को भी साथ लेते चलें? वह भी कोई कोई राय देगा ही।’’
छब्बू बोले, ‘‘चलो, राज को भी रख लो। लेकिन एक बात और कहे देता हूँ। जानवर भी हम इंसानों की तरह होते हैं। अगर उनकी सेवा-टहल की जाए, एक-दो दिन पर नहलाया-धुलाया जाए तो मुँह फुला लेते हैं। भैंस दिखने में भले ही बुद्धू नज़र आए, पर होती बड़ी नख़रीली है। अड़ जाए तो बूँद भर दूध के लिए तरसा दे। मेरी मानो तो बेंचू टहलुए को भी साथ ले लो।’’
हकीम चिलगोजा ने बात को ऐसे ध्यान से मुँह फैलाकर सुना मानो लाख टके की हो और छूट जाती तो जाने कितना बड़ा नुकसान हो जाता।
‘‘एक बात और सुनो,’’ छब्बू की सफाचट खोपड़ी में एक से बढ़कर एक विचार रहे थे, ‘‘भगवान करे, पर भैंस कभी बीमार-हैरान हुई तो? मेरी मानो तो चौबे वैद्य जी को भी ले चलो। हम लोग तो रंगी-पुती भैंस को ऊपर-ऊपर देखकर निहाल हो जाएँगे। पर भीतर का हाल तो एक अच्छा वैद्य ही बता सकता है।
‘‘लेकिन चौबे जी तो आदमियों के वैद्य हैं। वे भला भैंस के बारे में क्या बताएँगे?’’ हकीम चिलगोजा ने हिचकते-हिचकते अपनी बात रखी।
‘‘माना कि चौबे जी आदमियों के वैद्य हैं। पर जो वैद्य चेहरे का रंग देखकर बीमारी बता दे, नब्ज़ पकड़कर रोग पहचान ले, वह भला भैंस की तंदुरुस्ती नहीं पहचान सकेगा?’’ छब्बू ने अपना तर्क रखा।
हकीम चिलगोजा फिर लाजवाब हो गए।
‘‘देखो भाई छब्बू, तुम्हारी बातें सुन-सुनकर अब मेरा भी दिमाग़ खुलने लगा है।’’ हकीम चिलगोजा भी दूर की कौड़ी लाते हुए बोले, ‘‘यह तो सोचो कि भैंस गई तो वह मोढ़े पर तो बैठेगी नहीं। उसका खूँटा लुहार ही बनाएगा। अब अगर सब लोग गए और लुहार को साथ ले गए तो वह बुरा नहीं मानेगा?’’
‘‘अरे हाँ, अच्छा याद दिलाया,’’ छब्बू चहककर बोले, ‘‘लुहार को ले गए और रस्सी बँटने वाले बूढ़े बिद्दू को ले गए, तो? फिर वह भला अच्छी रस्सी देगा?’’
‘‘एक बात और सुनो,’’ हकीम चिलगोजा को फिर एक सूझ आई, ‘‘रात को तो सब अपने-अपने घर चले जाएँगे। आजकल चोर-उचक्कों का बड़ा डर रहता है। कहीं कोई भैंस को खोल ले गया तो? मेरी समझ से चौकीदार को भी साथ ले चलना चाहिए।’’
हकीम चिलगोजा और छब्बू बातें करते रहे और साथ ले चलने वालों की सूची लंबी होती रही। उठते-उठते करीब पंद्रह-बीस लोगों की सूची तैयार हो गई; वह भी बड़ी काट-छाँट और चुनाव के बाद।
निर्धरित दिन हकीम चिलगोजा की फौज भैंस ख़रीदने चल पड़ी। छब्बू की सलाह पर हकीम चिलगोजा ने परदादा की ज़ंग खाई बंदूक भी टाँग ली। उनकी सोच थी कि इससे दूकानदार पर रौब पड़ेगा।
दोपहर चढ़ते-चढ़ते हकीम चिलगोजा की पलटन सोहावल पहुँच गई।
नक्ख़ासे में बड़ी चहल-पहल थी। एक से एक जानवर बाज़ार में बिक रहे थे। बड़ी-बड़ी घूमी हुई सींगों वाले बैल, बर्फ जैसी सफेद रंगवाली दुधारू गायें, जमुनापारी बकरे, बढ़िया नस्ल के घोड़े। हकीम चिलगोजा और उनके साथी हैरत से आँखें फाड़े इधर-उधर देख रहे थे। दूर-दूर से लोग आए हुए थे। मेला-सा लगा हुआ था। कहीं चाट बिक रही थी, तो कहीं गर्मागर्म जलेबियाँ निकाली जा रही थीं। कहीं समोसे तले जा रहे थे, तो कहीं कचौड़ियाँ छानी जा रही थीं। हकीम चिलगोजा और उनका दल हर एक चीज़ को ठहर-ठहरकर हैरत से देखता चल रहा था और लोग उन्हें हैरत से देख रहे थे।
घूम-घामकर देखने के बाद आख़िरकार एक भैंस उन्हें पसंद गई। हकीम चिलगोजा पूरी फौज लेकर एक भैंस बेचनेवाले के पास जा पहुँचे। छब्बू ने पहले ही सिखा रखा था कि ख़ूब अकड़कर बातें करना। सिधाई से पूछोगे तो बुद्धू समझकर ठग लिए जाओगे। हकीम चिलगोजा ने आव देखा ताव पूरे जोश में भैंस बेचनेवाले पर बंदूक सीधी करते हुए बोले, ‘‘ दूकानदार, भैंस देता है या नहीं।’’
‘‘हाँ-हाँ, बोल?’’ छब्बू पहलवान ने भी मूँछें ऐंठी।
भैंस बेचनेवाला काँप गया। पंद्रह-बीस लोगों की फौज उसे घूरती हुई खड़ी थी। तरह-तरह के लोग। कोई कोयले के पहाड़ जैसा, तो कोई झाड़ू जैसी मूछों वाला। किसी की लाल-लाल आँखें, तो किसी का शीशे जैसा घुटा हुआ सिर। कोई लाठी लिए खड़ा, तो कोई रस्सी। ऊपर से हकीम चिलगोजा बंदूक ताने हुए। भैंस बेचनेवाले ने समझा, हो हो ये सब डाकू हैं। डर के मारे वह ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा, ‘‘बचाओ-बचाओ, डाकू गए।’’
नक्ख़ासे में पुलिस भी टहलती थी। उसने लोगों की चिल्लाहट सुनी तो लपकी आई। हकीम चिलगोजा ख़ाकी वर्दी देखकर वैसे भी काँपते थे और जब देखा कि पुलिस का पूरा दल उनकी ओर बंदूक ताने दौड़ा रहा है, तो उनकी हवा ख़िलाफ़ हो गई। बंदूक फेंकी और अचकन सँभालकर भाग खड़े हुए। जब लीडर भागा तो बाक़ी लोग खड़े रहकर क्या करते? छब्बू पहलवान सहित पूरा दलभागो-भागोचिल्लाता हुआ भाग खड़ा हुआ। पुलिस ने समझा ये सब सचमुच बड़े लुटेरे हैं। फिर तो नक्ख़ासे में तमाशा हो गया। आगे-आगे हकीम चिलगोजा की फौज और पीछे-पीछे बंदूक ताने पुलिस। लेकिन भला पुलिस से कब तक बचते? चारों तरफ से घेर के पकड़ लिए गए।
बेचारे हकीम चिलगोजा! गए तो थे भैंस लेने, हत्थे चढ़ गए पुलिस के। इस घटना के बाद उन्होंने ही क्या सबने मिलकर क़सम खा ली कि अब दूध की तरफ नज़र भी नहीं डालेंगे और चाय.....उसके बारे में तो सपने में भी नहीं सोचेंगे।