शनिवार, 12 अप्रैल 2014

फत्तन मियाँ का मुर्ग़ा



त्तन मियाँ दिखने में तो सींक-सलाई थे, लेकिन चीख़ने-शोर मचाने में अच्छे-अच्छों के छक्के छुड़ा देते थे। उन्होंने बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ अपनी इसी ताक़त के बल पर फतह कर रखी थीं। दोस्तों ने भी ख़ूब चढ़ा रखा था। इसी गुमान में वे सीना ताने-ताने फिरते थे।
एक दिन इसी ग़लतफ़हमी में वे मुहल्ले के पहलवान से भिड़ गए। कहाँ काले पहाड़ जैसा छः फिट का लंबा-चौड़ा पहलवान और कहाँ बित्ता भर के फत्तन मियाँ। क्या पिद्दी, क्या पिद्दी का शोरबा। उसने गर्दन पकड़कर उन्हें हवा में दो फुट ऊँचे टाँग दिया। फत्तन मियाँ ने बड़े हाथ-पैर मारे, बड़ी अकड़-फूँ दिखाई। लेकिन पहलवान ने ऐसी गर्दन कसी कि फत्तन मियाँ को दिन में तारे नज़र आ गए।
गर्दन पर पकड़ ढीली होते ही वह भागे और सीधे घर में जा घुसे।
दरवाजे़ पर आहट पाकर पत्नी ने पूछा, ‘‘कहाँ से आ रहे हो? चेहरे पर बारह क्यों बज रहे हैं?’’
फत्तन मियाँ के चेहरे पर सचमुच बारह बज रहे थे। आज उनकी इज़्ज़त को मिट्टी में मिल गई थी। बहादुरी और जाँबाज़ी की वर्षों में बनी साख रेत के घरौंदे की तरह भरभरा गई थी। उनके सिर में ग़ुस्से का बवंडर सनसना रहा था। बोले, ‘‘यह पहलवान अपने को बड़ा तीसमार ख़ाँ समझता है। मैंने भी तय कर लिया है, ऐसा सबक़ सिखाऊँगा कि बच्चू को हमेशा याद रहेगा!’’
‘‘पर आखि़र हुआ क्या...?’’ पत्नी ने हैरत से पूछा।
‘‘होना क्या है? बस ये समझ लो कि एक हफ़्ते के भीतर मियाँ की हवा निकाल दूँगा।’’ कहकर फत्तन मियाँ मुर्ग़खाने की ओर बढ़ गए।
‘‘बेगम, एक बात तुम भी जान लो,’’ मुर्ग़ों की कुकड़ूँकूँ के बीच फत्तन मियाँ की कुड़कुड़ाहट सुनाई दी, ‘‘पहलवान मुझे तो हरा सकता है, पर मेरे रुस्तम को नहीं। देखना मेरी हार का बदला रुस्तम कैसे लेता है।’’
पत्नी कुछ न बोलीं, मन ही मन झुँझलाकर रह गईं।
फत्तन मियाँ के पास अच्छी नस्ल के असील मुर्ग़े मौजूद थे। ख़ुद भले ही एक वक़्त फ़ाका कर लें पर मुर्ग़ों की गिज़ा में कमी न आने देते थे।
यों तो पहले भी फत्तन मियाँ का अच्छा-खासा वक़्त मुर्ग़ों की देखभाल में बीतता था, पर अब तो पूरा का पूरा दिन इसी में गुज़रने लगा। न खाने का होश रहता, न पीने का। आधी-आधी रात तक मुर्ग़बाज़ी के नए-नए पेंच ईजाद किया करते।
पहले सुबह होते ही उनके मुर्ग़े घूरे पर चोंचें लड़ाने निकल जाते थे, पर अब फत्तन मियाँ उन्हें बाहर की झलक न लेने देते थे। निकालते भी तो छड़ी लेकर पीछे-पीछे निगरानी में फिरा करते। क्या पता कोई कुछ खिला-पिला दे, चोट पहुँचा दे। किसी का क्या भरोसा?
पहले मुर्ग़ों का दड़बा बीटों से भरा, काला-सफेद बना रहता था। पानी की कटोरी और दानों की थाली भी मैली-कुचैली औंधी पड़ी रहती थी। पर अब फत्तन मियाँ ने ऐसी मेहनत की थी कि दड़बा एकदम चमचमा उठा था।
एक रात की बात है। शेख़ घसीटा मिलने आए। फत्तन मियाँ एक कोने में ले जाकर फुसफुसाते हुए बोले, ‘‘अमाँ फत्तन, जब से इस बाज़ी के बारे में सुना है, तब से फिक्रमंद हूँ। मैंने पता किया है, गोलागंज में एक हकीम साहब हैं जो कैफ़ की गोलियाँ बेचते हैं। वैसे तो अस्सी की एक देते हैं, पर मैं सत्तर की ला दूँगा।’’
कैफ़ एक प्रकार की नशे की गोलियाँ होती हैं। चालाक और बेईमान मुर्ग़बाज़ अक्सर अपने मुर्ग़ों को कैफ़ की गोलियाँ खिला दिया करते हैं। इन गोलियों की ख़ासियत यह होती है कि इन्हें खाने के बाद मुर्ग़े होश में नहीं रहते। चोट और दर्द भूलकर वे तब तक लड़ते रहते हैं, जब तक उनमें से कोई एक जीत न जाए; या फिर मर न जाए।
शेख़ घसीटा की बात सुनकर फत्तन मियाँ तैश में आ गए, ‘‘ख़ुदा क़सम, घसीटे भाई, मुर्ग़बाज़ी में आज तक हमारे ख़ानदान ने बेईमानी का सहारा न लिया। हमारा और आपका साथ तो बरसों का है, फिर आपने ऐसा कैसे सोच लिया?’’
      ‘‘अजी छोड़िए,’’ शेख़ घसीटा बेहयाई से बोले, ‘‘सच्चाई-ईमानदारी सब बीते ज़माने की बातें हैं। हमने तो यहाँ तक सुना है कि पहलवान अपने मुर्ग़े के पंजों पर संखिया लगा रहा है। तुम्हारे रुस्तम का तो अल्लाह ही भला करे।’’
फत्तन मियाँ भीतर ही भीतर थरथरा गए, पर चेहरे पर झलक न आने दी, बोले, ‘‘यह उसका ईमान जाने, पर मैं बेईमानी का रास्ता अख़्तियार नहीं कर सकता।’’
‘‘कोई बात नहीं मियाँ, मैं तो अज़ीज़ समझकर चला आया था। आगे तुम्हारी मर्ज़ी।’’ शेख़ घसीटा वापस लौट पड़े। पर जाते-जाते चौखट पर ठहर गए और किसी मायूस फेरीवाले की तरह बोले, ‘‘एक बार फिर सोच लो, साठ में दिलवा दूँगा।’’
फत्तन मियाँ ने कोई जवाब न दिया, लेकिन दिल ही दिल में मसोसकर रह गए कि काश, साठ रुपए होते तो एक गोली ख़रीद लेते।

आख़िरकार बाज़ी वाला दिन भी आ गया। फत्तन मियाँ और पहलवान अपने-अपने शागिर्दों को लेकर पुराने क़िले के खंडहर में आ जुटे। भीड़ ने चारों तरफ गोल घेरा बना लिया था।
फत्तन मियाँ अगर फराने मुर्ग़बाज़ थे, तो पहलवान भी कुछ कम न था। उसके लाले ने कई बाज़ियाँ जीतीं थीं। लाल भूरे पंखोंवाला वह एक मोटा-ताज़ा मुर्ग़ा था। पहलवान अपने मुर्ग़ों में उसका ख़ास ख़्याल रखता था।
मिर्ज़ा छंगा को रेफरी बनाया गया। वह हाथ उठाकर सबको चुप कराते हुए बोले, ‘‘तो हाज़िरीने महफ़िल, मुक़ाबला शुरू हो?’’
‘‘हाँ...,’’ भीड़ इस क़दर ज़ोर से चिल्लाई कि मुर्ग़े सिटपिटा उठे और कुड़कुड़ाने लगे।
‘‘तो ठीक है, एक...दो...तीन...’’ मिर्ज़ा छंगा गिनने लगे।
फत्तन मियाँ और पहलवान एकदम तैयार हो उठे।  मुर्गों की लड़ाई में जीत बहुत बार इससे भी तय होती है किसका मुर्ग़ा पहले उतरकर वार करना शुरू करता है।
एक...दो...तीन कहे जाने के साथ ही मुर्गे़ छोड़ दिए गए। ज़बर्दस्त जंग शुरू हो गई। रुस्तम किसी माहिर जाँबाज़ की तरह मुक़ाबला करने लगा। लेकिन पहलवान का मुर्ग़ा भी कम पहलवान न था। उछल-उछलकर वार कर रहा था। उसकी नुकीली चोंच और तीखे पंजों से रुस्तम हलकान होने लगा। हालाँकि मुक़ाबले की रात फत्तन मियाँ ने भी चाकू से तराशकर उसकी चोंच और पंजों को ख़ूब नोंकदार बना दिया था। यहाँ तक कि वह अपनी चोंच को नुकसान न पहुँचा ले, इसलिए दाने भी हथेली पर डालकर खिलाए थे।
लेकिन पहलवान का मुर्ग़ा जैसे पूरे जोश में था। वह उछल-उछलकर फत्तन मियाँ के मुर्ग़े को लहूलुहान किए डाल रहा था।
पहलवान की तरफ दाद देने और जोश बढ़ानेवालों का हुजूम भी कम न था। ख़ुद पहलवान भी वाह बेटा, शाबाश! घूम के मार! वाह-वाह, उछल के, ख़ूब!कह-कहकर अपने लाले का जोश बढ़ा रहा था।
फत्तन मियाँ का दिल बैठने लगा। उन्हें लगा कि बाज़ी ज़्यादा देर तक नहीं चल पाएगी। तभी मिर्ज़ा छंगा हाथ उठाकर ज़ोर से बोले, ‘‘पानी...’’
और पानीकर दिया गया। यानी मुर्ग़ों को पानी पिलाने, उनके ज़ख्म सहलाने और उनमें फिर से जोश भरने के लिए अंतराल कर दिया गया। लड़ाका मुर्ग़ों की बाज़ी तो कई-कई पानियोंतक चलती रहती है। कई-कई बार तो दो-दो तीन-तीन दिन तक लग जाते हैं।
फत्तन मियाँ की जान में जान आई। वह मुर्ग़े की गर्दन सहलाने लगे और ज़ख्मों पर केवड़ा डालने लगे।
पानीके बाद दोनों मुर्गे़ फिर भिड़ गए। मगर अबकी पहलवान का मोटा-ताजा मुर्ग़ा थका-थका-सा नज़र आ रहा था। उसमें पहले जैसा जोश नहीं रह गया था। जबकि फत्तन मियाँ का दुबला-पतला रुस्तम फुर्ती से पैंतरे बदल रहा था। शुरुआत में तो वह अपने ऊपर आए वारों को बचाता रहा, पर जब उसे दुश्मन की कमज़ोरी का एहसास हो गया, तो पूरी ताक़त से पिल पड़ा। सारा हुजूम, जो पहलवान की तरफ था, अब फत्तन मियाँ के पाले में आ गया। वाह-वाहका शोर बुलंद होने लगा।
फत्तन मियाँ अपनी ख़ुशी छिपाए चीख़ रहे थे, ‘‘शाबाश मेरे रुस्तम! और ज़ोर से, हाँ-हाँ, क्या कहने!’’
बाज़ी पलटते देख पहलवान ने मिर्ज़ा छंगा को डपटा, ‘‘अरे मिर्ज़ा, तुम्हें कुछ अक़्ल है, ‘पानीकरो, फौरन।’’
पर मिर्ज़ा ठहरे पुराने रेफरी। उन्होंने नवाबों का ज़माना देखा था। इस तरह की धौंस में आनेवाले नहीं थेे। वह अपनी पुरानी घड़ी पर एक निगाह डालकर ख़ामोशी से बैठे रहे। आख़िरकार जब वक़्त हो गया, तो हाथ उठाकर बोले, ‘‘पानी...!’’
अपने मुर्गे़ की पस्ती देख पहलवान बौखला गया था। वह अपने चेलों पर गरजने लगा, ‘‘अबे सत्ते, पानी की छींट मार! नब्बन केवड़ा ला...बाबू हवा कर..तेज़-तेज़!’’
और ख़ुद चाकू निकालकर मुर्ग़े की चोंच और नाख़ून तराशने बैठ गया।
पानीके लिए तय वक़्त के बाद बाज़ी फिर से शुरू हुई। इस बार भी फत्तन मियाँ का असील बीस पड़ रहा था और घूम-घूमकर लाले के सिर और डैनों पर वार किए जा रहा था। पहलवान का मोटा-ताज़ा दिखनेवाला चर्बीदार मुर्ग़ा बुरी तरह हाँफ रहा था।
पहलवान के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थीं, जबकि फत्तन मियाँ फूले न समा रहे थे।
तभी फत्तन मियाँ के मुर्ग़े ने उछलकर लाले के पोटे पर ऐसा वार किया कि वह बेचैन होकर ज़ोर से फड़फड़ाया और भीड़ के बीच जगह बनाता हुआ भाग खड़ा हुआ।
पहलवान ने बाज़ी हाथ से जाते देखी तो, खिसियाकर मुर्ग़े को पकड़ने के बहाने ख़ुद भी भाग निकला।
फत्तन मियाँ उछल पड़े। लोगों ने उन्हें कंधों पर उठा लिया। बड़ी देर तक गुलगपाड़ा मचता रहा। लोग फत्तन मियाँ को उछालते हुए मुहल्ले तक ले आए। फत्तन मियाँ जंग जीते हुए वीर की तरह आज फिर से सीना ताने हुए थे। जो काम वह न कर पाए, आज वह उनके रुस्तम ने कर दिखाया था।    

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें