रविवार, 13 अप्रैल 2014

बब्बन की चिट्ठी


बब्बन पढ़ने-लिखने के मामले में जितना होशियार था, जीवन-व्यवहार के मामले में उतना ही बुद्धू। गणित की कठिन से कठिन प्रश्नावलियाँ हल करना उसके लिए चुटकियों का काम था, पर बाजार से दो रुपए का नमक लाने में उसे पसीने आ जाते थे। दूकानदार भी उसे बुद्धू जानकर ठग लेते थे।
उससे दो-तीन घर दूर एक रामरतन साहू रहते थे। एक दिन जब बब्बन की छुट्टी थी, तो सहुआइन ने उसे बुलवा भेजा। उन्हें एक चिट्ठी लिखानी थी। बब्बन उस वक्त बैठा पढ़ रहा था। उसे खीझ तो बहुत आई, पर जाना जरूरी था। पड़ोस की बात थी। उसने कापी-कलम उठाया और चल पड़ा।
साहू की तीन संताने थीं। दो लड़के और एक लड़की। लड़की की शादी उन्होंने फागुन के महीने में तय कर रखी थी। सारे मेहमानों को चिट्ठी भेज-भेजकर न्योता दिया जा रहा था। सहुआइन ने बब्बन को इसी काम से बुलवाया था।
बब्बन पहुँचा तो सहुआइन फर्श पर बैठी दुलारी चाची और चमेली नाइन से बातें करने में मशगूल थीं। उसे देखते ही वह अंदर से एक स्टूल उठा लाईं और बोलीं, ‘‘आओ बेटा, बैठो।’’
बब्बन निगाहें नीची किए सकुचाया-सा बैठ गया।
‘‘क्या बताएँ बेटा, ’’ उतर गए पल्लू को फिर से सिर पर डालती हुई बोलीं, ‘‘देवर जी ससुराल गए हैं, नहीं तो तुमको कष्ट न देते।’’
‘‘नहीं-नहीं ताई, कष्ट किस बात का ? अम्मा कहती हैं पड़ोसी ही पड़ोसी के काम आता है।’’ बब्बन ने अटकते-अटकते अपनी बात इस तरह पूरी की, कि उसके कान की लवें लाल हो गईं।
‘‘हाँ-हाँ, कभी गलत कहा है तुम्हारी अम्मा ने!’’ चमेली ने मुँह बिचकाकर इस तरह कहा कि सहुआइन और दुलारी चाची मुँह छिपाकर हँस पड़ीं। दरअसल, कुछ दिनों पहले बब्बन की अम्मा से चमेली की, किसी बात पर कहा-सुनी हो गई थी। तभी से दोनों ने एक-दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोल लिया था।
सहुआइन फौरन अपने मकसद पर आ गईं और बोलीं, ‘‘अब जल्दी से चिट्ठी लिख दो, काहे से तुम्हें भी देर हो रही होगी।’’
‘‘किसके नाम लिखना है ताई ?’’
‘‘अरे वही सूपनखा, मेरी ननंद,’’ सहुआइन का दायाँ हाथ तलवार-सा लपलपाया, ‘‘आ जाती है हर छुट्टी में आधा दर्जन राक्षसों को लेकर। मरभुक्खे! सुबह, दोपहर, शाम हर वक्त खाना। पेट में जैसे समनसोख हो।’’
‘‘और सूरत तो देखो, मुँह सुई-पेट कुईं।’’ चमेली ने पानी चढ़ाया।
‘‘उसका पति पता नहीं कैसे इतनी लंबी छुट्टी दे देता है। रम्मू के बापू को दो वक्त की रोटी बनानी पड़े तो आसमान सिर पर उठा लें।’’ दुलारी चाची ने भी सुर में सुर मिलाया।
‘‘अच्छा जोरू का गुलाम पाया है,’’ सहुआइन के नथुने फड़क रहे थे। उनका नाटा कद और थुलथुल शरीर भावों के उतार-चढ़ावों के साथ गजब की फुर्ती दिखा रहा था।
बब्बन हैरान था- क्या लिखे, क्या छोड़े ?
‘‘हाँ आगे लिखो, अबकी फागुन में बिटिया का ब्याह ठाना है...’’ सहुआइन का मुँह फिर कड़वा गया, ‘‘आ जाएँ महीना भर पहले से, काहे से सारे बखार उन्हीं के लिए ही तो भरे हैं। नई कथरी-दुलाई उन्हीं के लिए तो सिलाई है। घर की सफेदी में वही तो अपना मुँह निहारेंगी।’’
‘‘अरे दीदी,’’ दुलारी चाची बोलीं, ‘‘जीजी के लड़कों से तो सारा मुहल्ला तंग रहता है। राम जाने तुम उन्हें चौबीसों घंटे कैसे झेलती हो!’’
‘‘मेरे भाग्य में तो सहना ही लिखा है...’’ सहुआइन का गला भर्रा गया, ‘‘देवर-देवरानी की सहो, लड़कों की चार बातें सुनो, ‘येलौट के आएँ तो इनकी धौंस सहो। किसी को मेरी फिकर नहीं। होगी क्यों ? मुफ्त की नौकरानी तो मिली ही है, सेवा-टहल के लिए।’’
‘‘घर वालों की तो सभी सहते हैं, चाची! पर बाहर वालों को कोई क्यों झेले ?’’ चमेली ने मुँह बनाया।
‘‘अपनी-अपनी किस्मत है,’’ सहुआइन ने माथे पर हाथ ठोंका।
बब्बन ने घड़ी की ओर निगाह दौड़ाई और सूखते कंठ से बोला, ‘‘ताई, आगे...?’’
‘‘हाँ...’’ सहुआइन थोड़ी देर असमंजस में रहीं कि लिखवाएँ या न लिखवाएँ, फिर बोलीं, ‘‘अच्छा चलो, लिख दो...।’’
बब्बन कलम लिए इंतजार में बैठा रहा।
दो मिनट चुप रहने के बाद सहुआइन बोलीं, ‘‘लिख दो कि तुम्हारे वहाँ चूड़ियाँ बहुत सुंदर मिलती हैं। तुम्हारी भतीजी दुल्हन बनेगी, कुछ उसके हिसाब से चूड़ियाँ लिए आएँ।’’
सहुआइन की बात खत्म होते न होते चमेली बड़ी जोर से हँस पड़ी, ‘‘बड़ी भोली हो चाची! कभी दो पैसे की हींग लाकर दी है, जो चूड़ियाँ लाकर देंगी। टिकट खरीदकर यहाँ तक आ जाती हैं, यही क्या कम है ?’’
सहुआइन खिसिया गईं, ‘‘अरे वो तो ऐसे ही लिखा दिया, नहीं तो कहेंगी लड़की का ब्याह है और हमसे कुछ कहा नहीं।’’
‘‘वह तो सवा रुपए का प्रसाद चढ़ाएंगी। खर्च करना तो तुम्हारे नसीब में लिखा है, सहुआइन।’’ दुलारी चाची बोलीं।
‘‘अरे, पिछली बार...’’चमेली को जैसे कुछ याद आया। वह बड़ी-बड़ी आँखें निकालती हुई बोली, ‘‘जब जीजी के छोटे लड़के ने गले में कंचा अटका लिया था। सब कितना परेशान हुए थे। डाक्टर ने सौ-पचास से क्या कम लिए होंगे ?’’
‘‘इसका एहसान कौन मानता है,’’ सहुआइन बोलीं।
‘‘खबर सुनकर जीजा आए तो हँसकर रह गए। खर्चे की बात तक न पूछी।’’
चमेली की बातों से सहुआइन का मन भारी हो गया।
मामला गंभीर होता देख बब्बन ने खामोशी तोड़ी, ‘‘ताई आगे...’’
‘‘हाँ, यह भी लिख दो,’’ सहुआइन जैसे किसी चीज को याद करके चहकीं। पर हँसी उड़ जाने के डर से उन्होंने दुलारी चाची की ओर देखा और उन्हें अपनी बात में शामिल करते हुए बोलीं, ‘‘अब साहू जी की इन्हीं बातों पर गुस्सा आता है। कह रहे थे लिखवा देना कि फूफा को भी ब्याह का न्योता देते आएँ। जब दोनों एक ही जगह हैं तो व्यर्थ में दूसरी चिट्ठी क्यों लिखी जाए ?’’
‘‘बात तो ठीक है, पर फूफा जी को अच्छा नहीं लगेगा। शादी-ब्याह में नातेदार तो मौका ढूँढते हैं नाक-भौंह सिकोड़ने का।’’ दुलारी चाची बोलीं।
‘‘पर चाचा ने कहा है, तो लिखवा ही दो, नहीं तो बाद में बेमतलब का बखेड़ा हो,’’ चमेली ने कहा।
समर्थन पाकर सहुआइन ने बब्बन से कहा, ‘‘ठीक है भैया, लिख दो यह भी।’’
बब्बन थोड़ी देर इंतजार में रहा कि शायद बोलकर लिखाएँ। पर जब वह दूसरी बातों में लग गईं तो उसने खुद से ही लिख लिया।
‘‘और क्या लिखूँ ?’’ बब्बन घड़ी की ओर देखकर व्याकुलता से पूछा।
‘‘बस्स...हो गया,’’ सहुआइन साँस लेती हुई बोलीं, ‘‘इतना लिखा दिया कम नहीं है। ब्याह की बात न होती तो कौन उस चुड़ैल के मुँह लगता।’’
‘‘अंत में क्या लिख दूँ ?’’ बब्बन ने पूछा।
‘‘अरे वही दुआ-सलाम, जो सब लिखते हैं। भाई साहब को प्रणाम, नासपीटों को आशीष...बस, है कि नहीं भौजी ?’’ सहुआइन ने हँसकर दुलारी चाची की ओर देखा।
‘‘हाँ, और क्या,’’ चमेली बीच में बोल पड़ी, ‘‘अंत में इतना और लिख देना कि तुम सबकी टाँगें टूटें, भगवान से यही कामना है।’’
‘‘अरे चुप,’’ सहुआइन ने हँसते हुए उसे चपत लगाई। चिट्ठी पूरी हो गई तो सहुआइन ने कहा, ‘‘भैया, तुम्हारे ताऊ को तो फुरसत नहीं है, लड़के भी दूकान पर फँसे रहते हैं। यह चिट्ठी तुम्हीं डाल देना।’’
बब्बन मन ही मन झल्लाया, पर यह सोचकर कि चलो, पूरे ढाई घंटे के बाद पिंड तो छूटा, उसने चिट्ठी ले ली।
चिट्ठी पाने के साथ ही सहुआइन की ननंद दौर्ड़ी आइं। सहुआइन पानी-बताशा लेकर आईं तो हैरान रह गईं। ननंद की आँखों से ज्वाला फूट रही थी। नथुने फड़क रहे थे। सहुआइन बोलीं, ‘‘दीदी, कैसी तबीयत हो रही है ? बैठ के थोड़ा पानी पी लो।’’
जवाब में ननंद का मुँह खुला तो जैसे भूचाल आ गया, ‘‘पानी तो मैं पिलाती हूँ तुझे!’’
और फिर शुरू हो गया भयंकर वाक्-युद्ध। सारा मुहल्ला इकट्ठा हो गया। सब हैरान कि यह बेमौसम बरसात कैसी ? और तो और, बात तो सहुआइन को भी नहीं समझ में आ रही थी। पर दोनों भिड़ी रहीं। साहू भी जीजा से बतकही करते रहे।
घंटे-आध घंटे सारे मुहल्ले को हिलाने के बाद ननंद दल-बल सहित वापस लौट गईं। साथ ही कसम भी खाकर गईं कि यहाँ दोबारा कदम नहीं रखेंगी।
सब हैरान थे कि यह आखिर हुआ क्या ?
पर यह शायद ही कोई जान रहा था कि सारी गड़बड़ी बब्बन की लिखी हुई चिट्ठी से हुई थी। आइए, हम भी वह चिट्ठी पढ़ लेते हैं-
मेरी प्यारी, सूपनखा,
                राम-राम!
जोरू के गुलाम जीजा जी को प्रणाम तथा आधा दर्जन मरभुक्खों को आशीष पहुँचे। तुम लोगों के यहाँ न होने से सब कुशल है। सूचना यह है कि अबकी फागुन में बिटिया का ब्याह ठाना है। तुम्हारे भैया ने बखारें भर-भर रखी हैं, आ जाओ महीना भर पहले से उनकी कमाई उड़ाने। फूटी कौड़ी खर्च करने में तो प्राण निकलते हैं, पर हो सके तो बिटिया के लिए चूड़ियाँ लेती आना। फूफा को सूचित कर देना ताकि हमारी चिट्ठी का खर्च बचे। वैसे तो, मैं तुम्हारे जैसी चुड़ैल के मुँह न लगती, पर बेटी के ब्याह के कारण चिट्ठी लिखना मजबूरी है। कम को बहुत खत को तार समझना।
          तुम सबकी टाँगें टूटें, भगवान् से यही कामना है।

तुम्हारी भौजी

3 टिप्‍पणियां:

  1. ब्‍लॉग बनाने की बधाई स्‍वीकारें।

    अभी इसमें कुछ और चीजें जोडने की जरूरत है। मैंने इस सम्‍बंध में अपने ब्‍लॉग पर एक पोस्‍ट लिखी थी, उसे जरूर पढें। पोस्‍ट का लिंक है: http://me.scientificworld.in/2011/08/blogs-essential.html#.U02YFaLbaho

    और हां, कमेंट सिस्‍टम में एनीवन कर दें, जिससे बिना लॉगिन के भी कमेंट किया जा सके।

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  2. बब्बन वाकई पढ़ा लिखा और काबिल था...बातचीत का सत ही निचोड़ कर लिख दिया चिट्ठी में!

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  3. आपकी यह टाप की कहानी पहले भी पढी है.
    मजेदार है.
    बधाई स्वीकार कीजिए.
    कुछ बाल मन्दिरको भी भेजिए.

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