शनिवार, 11 अक्तूबर 2014

ऐसे मनाई गई रामलीला


जब हर कहीं रामलीला समाप्त हो जाती है, तब बच्चों की असली रामलीला शुरू होती है। पतली कमची को मोड़कर दोनों सिरे धागे से बाँध लिए, धनुष तैयार हो गया। पतली-पतली सिरकियाँ ले लीं, बाण बन गए। बस, सेना लेकर निकल पड़े लंका-विजय के लिए।

यही हाल काशीपुर का था। इधर गाँव की रामलीला के मजीरे थमते, उधर बच्चों के आलाप शुरू हो जाते। गाँव भर से चंदा वसूला जाता। कहीं से तखत जुटाए जाते। वेश-भूषा का इंतजाम किया जाता। साज-सजावट इकट्ठा की जाती और चौपाल के चबूतरे पर सरेशाम रामलीला शुरू हो जाती।
संवाद तैयार करने का काम हरीराम और भगवान दास के जिम्मे था। सुरपती बिना बुलाए अपना हारमोनियम लेकर हाज़िर हो जाता। गाँव की रामलीला में उसे कोई पूछता नहीं था, इसलिए सारी इच्छा बच्चों की रामलीला में ही पूरी कर लेता था। आख़िर थी तो रामलीला यह भी।
हरीराम और भगवान दास इंटर में पढ़ते थे। रोज़ शहर का आना-जाना था। पढ़ने-लिखने में तेज़ थे। अध्यापकों की भी कृपा थी। दोनों मिलकर ऐसे संवाद लिखते कि सभी निहाल हो जाते।
गाँव के कुछ लोग जहाँ खुले हृदय से बच्चों के प्रयास की प्रशंसा करते, वहीं कुछ लोग भीतर ही भीतर कुढ़ते भी थे। सबसे बड़े विरोधी थे लच्छू पांडे, यानी पं0 लक्ष्मी नारायण पाँडे। जब बच्चों की रामलीला शुरू होती, तो उनका भी काम शुरू हो जाता। चौराहे पर, चाय के ढाबे पर या पान की गुमटी पर, जहाँ कहीं दो आदमी जुटते लच्छू पाँडे शुरू हो जाते, ‘‘कलयुग आ गया है, कलयुग। ये कल के लड़के, चले हैं भगवान् बनने। दिन में बीसों पाप करते हैं। सैकड़ों झूठ बोलते हैं। ये धरेंगे भगवान का भेस। नाश हो इनका।’’
लोग मुँह छिपाकर मुस्करा देते। कोई मसखरा हुआ तो कह बैठता, ‘‘पंडित जी, बच्चे तो भगवान का रूप कहे जाते हैं। उन्हें गालियाँ देकर नाहक नरक के भागी बनते हो।’’
लच्छू पांडे बिदक उठते जैसे बर्र ने काट खाया हो। त्योरियाँ तन जातीं। चुटिया लटकने-झटकने लगती। थुलथुल तोंद डोलने लगती। ऐसी-ऐसी मुद्राएँ बनाते कि देखने वाले लोटपोट हो जाते।
लच्छू पाँडे जितना चीखते, लोग उतना ही हँसते। उनकी करतूत लोगों से छिपी नहीं थी। सबको पता था कि आठ घंटे भगवत्-भजन करने वाले पांडे जी मंदिर के फर्श पर कोयले से गेहूँ-चावल की बोरियों का हिसाब करते हैं। पूजा-पाठ तो सिर्फ बहाना है।
दूसरी ओर गाँव के ही कुछ लोग बच्चों के काम से बहुत ख़ुश होते। इनमें थे प्राइमरी स्कूल के मास्टर दीनानाथ जी और होम्योपैथ के डाक्टर रफ़ीक़ुल्ला ख़ाँ साहब। तखत, कुर्सियाँ, पहनने-ओढ़ने की सामग्री आदि तो ये लोग तो देते ही थे, चंदा देने में भी सबसे आगे रहते। इन सब लोगों द्वारा रामलीला में रुचि लेने का कारण भी था। बच्चे अपनी रामलीला में कुछ ऐसी बातें शामिल कर लेते थे जो अनपढ़ गाँव वालों के लिए बहुत फायदे की साबित होती थीं। जैसे लक्ष्मण-मूर्च्छा के प्रसंग में राम का पार्ट अदा करने वाला हरीराम बड़ी कुशलता से चिकित्सा के फायदे गिना जाता जो झाड़-फूँक में फँसे गाँववालों के मन पर गहरा असर करतीं। इसी तरह कभी प्रधान जी की पोल खोली जाती, तो कभी पटवारी की। लच्छू पाँडे की गत तो हर साल बनती थी। गाँववाले देख-देखकर दोहरे हो जाते।
गाँव का हर आदमी चंदे में कुछ न कुछ ज़रूर देता था। चाहे एक कटोरी गेहूँ ही क्यों न हो। आगे-आगे कापी-क़लम लेकर हरीराम और भगवानदास रहते और पीछे-पीछे गाँव भर के बच्चों का झुंड। तीन साल के मैकू से लेकर पोलियो में एक टांग गँवा चुका परमू तक। पैसा मिलता तो भगवानदास अपने पास रख लेता और अनाज मिलता तो पट्टू, बिरजू, रमेसर आदि अपनी झोलियाँ आगे कर देते। हरीराम तत्परता से कापी में नोट करता जाता। गाँव भर चंदा देने में ख़ुशी महसूस करता। बस, जान सूखती तो सिर्फ लच्छू पांडे की। ज्यों ही लड़कों का झुंड देखते, चेहरे का रंग उड़ जाता। मना तो नहीं कर पाते, लेकिन जो भी देते बड़ी कठिनाई से; और तमाम बहानेबाज़ियों के बाद। और देते भी क्या, कभी एक कटोरा कंकड़ मिली दाल, कभी घुन लगा गेहूँ। पैसे तो शायद ही कभी दिए हों। लड़कों को जो मिल जाता उसी में संतोष करते। ऊपर से वे भले ही दस बातें पकड़ाते, पर अंदर ही अंदर अपनी जीत पर फूले न समाते।
इस बार भी रामलीला की तैयारियाँ ज़ोर-शोर से शुरू हो गईं थीं। सुबह से ही चौपाल के चबूतरे पर तखत डाल दिए गए थे। जिसके हाथ जो काम लगा उसी में जुटा हुआ था। कोई घड़ा भर-भरकर तखत धोए जा रहा था, तो कोई मैदान साफ करने के बहाने धूल का बवंडर उड़ा रहा था। कोई चौपाल के जाले साफ कर रहा था, तो कोई दीवारों पर से गोबर के ठप्पे छुड़ा रहा था। काम से ज़्यादा शोर मच रहा था। कोई टूटा-फूटा भजन गाए जा रहा था, कोई काम बिगड़ जाने से दूसरे पर अपनी खीझ उतार रहा था। छोटे बच्चों के लिए यह किसी खेल से कम न था। शोर मचाते, धूल उड़ाते सबके बीच से होकर दौड़े जा चले रहे थे।
हरखू चौकीदार की कोठरी सजने-सजाने का स्थान बनाई गई। पैसे ज़्यादा इकट्ठा हुए नहीं थे इसलिए पिसा कोयला, सिंदूर, गेरू और संजरावट जैसी चीजें ही श्रृंगार-साधन के रूप में जुटाई गई थीं। फिर भी लाल मुखवाली वानर-सेना और काले पुते चेहरोंवाले राक्षसों को देखकर बच्चे तो क्या बड़े भी खिल उठते थे। मास्टर दीनानाथ सधे हाथों से दफ्ती पर रावण के दस चेहरे बनाकर काट लेते थे। फिर बड़े करीने से उन्हें रावण के मुकुट से चिपका या बाँध दिया जाता था। देखने वालों को लगता कि सचमुच दशानन रावण चला आ रहा हो।
रावण का पार्ट भगवानदास अदा करता। उसका लंबा-तडंगा गठीला शरीर और गरजती आवाज लोगों को ख़ूब प्रभावित करती। राम का पार्ट हरीराम निभाता था। सीता का पार्ट बिरजवा अदा करता। एक तो उसकी आवाज बड़ी महीन थी, दूसरे उसकी मूँछें भी नहीं आईं थीं। ऊपर से अभिनय इतना अच्छा करता कि लोग तालियाँ बजाए बिना न रहते।
शाम होते-होते मंडली सज गई। भगवानदास हाथ को माइक जैसा बनाकर सबको शांत बैठने की प्रार्थना कर रहा था। महिलाओं की टोली थोड़ी दूर पर नीम के पेड़ के नीचे जुटी, जहाँ हल्का अँधेरा था। यह स्थान ऊँचा भी था। यहाँ बड़ी आराम से रामलीला दिखती थी। बस, बुधना चाची और रामदेई बुआ बार-बार अपना चश्मा सही कर रही थीं। उन्हें दिखाई कम पड़ता था, इसलिए समझ में भी कम आता था। बग़लवाली को बार-बार कोहनी मारकर पूछती रहतीं। यही कारण था कि वे या तो टोली के बिल्कुल आगे रहतीं या पीछे छूट जातीं। उनके बगल में बैठने का साहस कौन करता? उन्हें समझ में नहीं आता था, तो श्रद्धा से ही तृप्त हो जाती थीं, लेकिन दूसरा अपना आनंद धूल में क्यों मिलाता?
छोटे बच्चे और बुज़ुर्ग दरी पर सबसे आगे बैठे थे। कुछ लोगों के लिए कुर्सियाँ आईं थीं। कुछ लोग बैठने की जगह होने के बावजूद पीछे खड़े थे।
रामलीला शुरू हुई। सूत्रधार बना सुरपती। चेलों सहित साज-सामान लेकर आ बैठा। अपनी मोटी और बेताल आवाज़ में लगा स्वर आलापने। बीच-बीच में ‘‘हाँ भाइयो-बहनो, साँती से सुनिए!’’ कहता जाता था।
पहले दिन नारद-मोह, रावण-अत्याचार और पृथ्वी-व्यथा के प्रसंग खेले गए। शुरूआती दिनों में तो बहुत कुछ अटपटा-सा रहा, पर धीरे-धीरे गति आती गई। राम-जन्म, राम-जानकी मिलन, वन-गमन, दशरथ-मरण आदि प्रसंग जैसे-जैसे खेले जाते गए, लोगों की रुचि बढ़ती गई। बच्चों को ही नहीं बड़ों को भी अगले दिन का इंतज़ार रहने लगा।
 कुंभकरण और मेघनाथ-वध वाले दिन तो लोगों का खूब मनोरंजन हुआ। कुंभकरण न था, लच्छू पांडे का ही प्रतिरूप था। भगवानदास ने हाथ-पैर जोड़कर गरीबे चाचा को मनाया था कुंभकरण का पार्ट लेने के लिए। वैसी ही तोंद, वैसी ही मूँछें, वैसी ही चाल-ढाल और हरकतें देखकर लोगों का हँसते-हँसते बुरा हाल हो गया।
लच्छू पांडे बाहर आकर भले ही रामलीला नहीं देखते थे, पर खिड़की के पीछे से नज़र ज़रूर रखते थे। यह देखकर क्रोध के मारे उनका बुरा हाल था। कमरे में बौराए साँड-से फुँफकारते टहल रहे थे। लेकिन विवश थे, कुछ कर भी नहीं सकते थे। उधर लोग खुलकर ठहाके लगा रहे थे।
आख़िरी दिन रावण जलाया गया। रावण जलाते समय बड़े-बूढ़ों और महिलाओं की टोली तो नहीं थी, हाँ पड़ोसी गाँवों के बच्चे ज़रूर जुट आए थे। दो-एक गुब्बारे, चाट और रेवड़ी वाले भी आ धमके थे।
भरत-मिलाप और राजतिलक के लिए रथ की ज़रूरत आन पड़ी। युद्ध-भूमि में भले ही राम और रावण पैदल लड़े पर अब रथ ज़रूरी हो गया था। गाँव भर में शोभा-यात्रा जो निकलनी थी। लेकिन गाड़ी सिर्फ लच्छू पांडे के पास थी। वह गाड़ी से अनाज की बोरियाँ मंडी पहुँचाया करते थे। लड़के निराश हो गए कि लच्छू पांडे से तो गाड़ी मिलने से रही। लेकिन गाड़ी मिले बिना भी काम नहीं बननेवाला था।
अचानक हरीराम को एक उपाय सूझा। उसने झटपट जटाएँ बाँधीं, कंधे पर तरकश लटकाया, धनुष लिया और लच्छू पाँडे के घर की ओर कदम बढ़ा दिए। लड़कों का झुंड पीछे-पीछे साथ हो लिया।
दरवाजे पहुँचकर हरीराम ने आवाज लगाई, ‘‘विप्रवर, हमें दर्शन देकर धन्य करिए।’’
लच्छू पांडे त्योरियाँ चढ़ाए बाहर निकले। देखा तो सामने साक्षात् भगवान् राम खड़े हैं।
‘‘विप्रवर, एक आवश्यकता आन पड़ी है।’’
लच्छू पांडे का मुँह सूख गया कि चंदा तो ले गए थे अब कौन-सी आवश्यकता आ पड़ी।
‘‘हमें आपकी गाड़ी चाहिए।’’
लच्छू पांडे उछल पड़े, ‘‘नहीं मिलेगी, नहीं मिलेगी। बिल्कुल नहीं मिलेगी।’’
भगवानदास ग़ुस्सैल स्वाभाव का था। तनकर सामने आ गया। लड़कों के झुंड में भी खुसर-पुसर शुरू हो गई। स्थिति बदलते देख लच्छू पांडे ने फौरन अपना लहजा बदल दिया, ‘‘देखो भगवानदास बेटा, गाड़ी देने में कोई एतराज़ नहीं है। पर क्या है कि गाड़ी के पटरे थोड़ा कमज़ोर हैं। एक पहिया भी ढचर-ढचर करता है। अब बताओ भला, राम जी की सवारी निकले और बीच रास्ते में एक पहिया निकल जाए तो, कितना बुरा लगेगा। है कि नहीं हरीराम बेटा?’’
‘‘हम मरम्मत कर लेंगे। आप हाँ तो कहें, ’’ हरीराम बोला।
‘‘अरे, हाँ कैसे कहें बेटा! गाड़ी पर अनाज की बोरियाँ लदी हैं। उन्हें उतारना कोई आसान बात है क्या?’’ लच्छू पांडे ने बहाना गढ़ा।
‘‘उसकी चिंता मत करिए। वह हम लोग उतार लेंगे,’’ भगवानदास बोला।
‘‘अरे ऐसे कैसे उतार देंगे? पूरा हिसाब करके, नाप-तौल करके चढ़ाया गया है। सब इधर-उधर हो जाएगा कि नहीं।’’ अब तक अपने को संभाले लच्छू पांडे बिदक उठे।
‘‘तो इसका मतलब आप गाड़ी नहीं देंगे?’’ हरीराम की भौहें तन गईं।
‘‘नहीं देंगे...’’ लच्छू पांडे ने लगभग चीख़कर कहा।
‘‘तो जाओ, मैं तुम्हें शाप देता हूँ,’’ हरीराम ने क्रोधित होकर कहा, ‘‘जिन बैलों से तुम अपनी गाड़ियाँ खींचते हो उनकी सींगें गायब हो जाएँ।’’
‘‘हुँह...’’ लच्छू पांडे ने उपेक्षा से कहा और भीतर चले गए। लड़कों का झुंड वापस लौट गया।
लच्छू पांडे बड़बड़ा रहे थे, ‘‘बड़े आए शाप देने वाले। भेस बना लिया तो ख़ुद को भगवान ही समझने लगे। नाश हो इनका।’’
पर लच्छू पांडे थे कमज़ोर दिल के। अंदर ही अंदर डर रहे थे कि सचमुच बैलों की सींगें ग़ायब हो गए तो? गाँव भर में हँसी होगी। बड़ी देर तक असमंजस में फँसे चहलक़दमी करते रहे। आख़िरकार उनसे न रहा गया। दरवाज़ा खोलकर बाहर झाँका। साँझ का झुटपुटा घिरने लगा था। मैदान में सन्नाटा छाया हुआ था। गोठान में, जहाँ बैल बँधते थे, घना अँधेरा छा गया था। पर उनकी आदत थी। अंदाज़ से बैलों के पास पहुँच गए। बड़े प्यार से जैसे ही एक बैल के माथे पर हाथ फेरा कि जी धक् से रह गया। उसकी सींगें ग़ायब थीं। बदहवासी में दूसरे बैल के माथे पर हाथ फिराया। दूसरे की सींगें भी ग़ायब थीं। लच्छू पांडे चीख़ते हुए बाहर की ओर भागे। बाहर निकलकर सिर पीट-पीटकर चीख़ने लगे। गाँव भर इकट्ठा हो गया। लच्छू पांडे बेसुरी आवाज में चिल्लाए जा रहे थे, ‘‘अनर्थ हो गया, अनर्थ। मुझसे कितना बड़ा पाप हो गया। हे भगवान, अब मैं क्या करूँ। मुझे क्षमा करो भगवान...’’
सारी बात जानकर मास्टर दीनानाथ ने लच्छू पांडे को जाकर क्षमा माँगने का सुझाव दिया। लच्छू पांडे गाड़ी लेकर गिरते-पड़ते, हाँफते-थरथराते चौपाल तक जा पहुँचे। हरीराम उसी वेश-भूषा में चौपाल के चबूतरे पर बैठा था। लच्छू पाँडे उसके चरणों में गिर पड़े, ‘‘मैं पापी हूँ, नीच हूँ, अधमी हूँ भगवान। मुझे क्षमा करो। मुझसे भारी भूल हुई। मैं गाड़ी ले आया हूँ। मेरी भूल क्षमा करो, दयानाथ।’’
हरीराम ने उन्हें प्यार से उठाते हुए कहा, ‘‘सुबह का भूला अगर साँझ को वापस आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते।’’ हरीराम ने क्षण भर के लिए आँखें बंद कीं और पुनः कहा, ‘‘जाओ, तुम्हारी भूल क्षमा की जाती है। बैलों के सींग वापस आ जायेंगे।’’
लच्छू पांडे पुलकित हो गए। भगवान की चरण-धूलि लेकर सीधे गोठान की ओर भागे। अभी वह दस कदम दूर ही थे कि उन्होंने गोठान से दो गधों को भागते देखा। उनके पीछे-पीछे भगवानदास निकलता दिखाई दिया। उन्हें सारी बात समझते देर न लगी। क्रोध के मारे तन-बदन में आग लग गई। पर अब बाजी हाथ से जा चुकी थी। रथ सजाया जा रहा था।
लच्छू पांडे दरवाज़े पर बैठे देर तक लड़कों को कोसते रहे। उधर राम की शोभा-यात्रा ख़ूब धूमधाम से निकली। सारा गाँव शामिल हुआ, सिवा लच्छू पांडे के।

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