गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

मियाँ चिलगोज़ा की मूँछें
हमारी क़स्बे में एक मियाँ चिलगोज़ा रहते हैं। रूप ऐसा कि जो देखे, देखता ही रह जाए। फुंदनोंवाली चौगोशिया टोपी, कमरतोइयों वाली शानदार अचकन और पैरों में मुड़े हुए घेतले जूते। जैसे कोई चलता-फिरता अजायबघर।
मियाँ चिलगोज़ा से मशहूर उनकी मूँछें हैं। इतनी बारीक कि ईरानी तलवार भी शरमा जाए और इतनी तरतीबवार कि एक-एक बाल अपनी अलग अहमियत दर्ज करता लगे। मानो एक बाल के इधर-उधर हो जाने से मूँछों का सारा संतुलन ही बिगड़ जाए। बीच-बीच में काले-सफेद बालों की जुगलबंदी का तो जवाब ही नहीं है। मियाँ चिलगोज़ा को जितना प्यार अपनी मूँछों से है, उतना शायद और किसी चीज़ से नहीं।
जाड़े की एक सुबह। मियाँ चिलगोज़ा गुनगुनी धूप में बैठे अपनी मूँछों की ख़िदमत कर रहे थे। कबूतर गुटरगूँकरते हुए इधर-उधर चोंच मार रहे थे। उनके बीच असील मुर्ग़ा भी कुकड़ूकूँकरता इतरा रहा था।
तभी उधर से मिर्ज़ा मुनक्का गुज़रे। सोचा मियाँ साहब से मिले काफी दिन हो गए हैं। आज मुलाक़ात करते चलें।
उन्होंने बाहर से ही पुकारा, ‘‘अरे, हकीम चिलगोज़ा घर पर हैं।’’
मियाँ चिलगोज़ा आवाज़ पहचान नहीं पाए। समझे कोई उधार वापस माँगनेवाला आ गया है। एकदम घबरा गए। इसी घबराहट में उस्तरा फिसला और बाईं ओर की मूँछ साफ हो गई। मियाँ चिलगोज़ा को लगा जैसे आसमान से आ गिरे हों। काटो तो ख़ून नहीं। समझ नहीं आ रहा था करें तो क्या करें? उधर मिर्ज़ा मुनक्का सामने खड़े थे। डर था कि भेद खुल जाएगा तो जग-हँसाई होगी।

आख़िरकार कुछ समझ न आया तो हड़बड़ी में मुँह घुमाकर खड़े हो गए। मिर्ज़ा मुनक्का हैरत से बोले, ‘‘अमाँ, हकीम साहब, कोई नाराज़गी है क्या, जो इस तरह से मुँह फेरकर खड़े हो?’’
‘‘मियाँ, आज मेरा चेहरा न देखो तो ही अच्छा है।’’ मियाँ चिलगोज़ा ने मन ही मन बहाना सोचते हुए कहा।
‘‘अमाँ, क्यों न देखें?’’
‘‘सोच लो, तुम्हारा ही नुकसान होगा। आजकल मेरे सितारे गर्दिश में चल रहे हैं। एक नजूमी ने कहा है कि सुबह-सुबह मेरा चेहरा देखनेवाले को जान-माल का बड़ा नुकसान हो सकता है।’’
मिर्ज़ा मुनक्का पक्के अंधविश्वासी ठहरे। मियाँ चिलगोज़ा की चेतावनी ने फ़ौरन असर दिखाया। इससे पहले कि बात पूरी होती, वह हिरन हो लिए।
मियाँ चिलगोज़ा ने राहत की साँस ली। लेकिन मूँछ के साफ हो जाने का उन्हें बेहद रंज हो रहा था। दिल बैठा जा रहा था। आज जैसे उनकी बरसों की पूँजी लुट गई थी। लग रहा था आसमान फट पड़ा है, क़यामत आ गई है या फिर जाने क्या हो गया है।
कुछ वक़्त बीता तो रोज़ की तरह छब्बू पहलवान के साथ चचा छुहारा और मियाँ मिसरी मिलने आ पहुँचे।
‘‘अमाँ, हकीम साहब, क्या अभी तक सो रहे हैं?’’ छब्बू पहलवान ने आदत के अनुसार ऊँची आवाज़ में पुकारा।
छब्बू पहलवान की आवाज़ पाकर मियाँ चिलगोज़ा का दिल धड़क उठा। समझ न आया कि इस मुसीबत का क्या करें? इसी उधेड़बुन में थे कि छब्बू पहलवान ने अधीरता में आगे बढ़कर जर्जर दरवाज़े पर हथेलियाँ थपथपाईं। दरवाज़े की दराज़ों से धूल झरने लगी। दो-चार छिपकलियाँ डरकर इधर-उधर भागीं। लगा दरवाज़ा टूटकर नीचे आ जाएगा। चचा छुहारा और मियाँँ मिसरी घबराकर दूर हट गए।
पहले तो मियाँ चिलगोज़ा ने सोचा था कि चुप्पी साधे पड़े रहेंगे तो हो सकता है बला टल जाए। दो-चार आवाज़ें देकर वे लोग चलते बनेंगे। पर अब लगा कि वह उपाय सही नहीं था। एक पल और न बोले तो भेद खुलेगा ही, दरवाज़े की इज़्ज़त भी उतर जाएगी।
इससे पहले कि छब्बू पहलवान दोबारा दरवाज़ा थपथपाते, मियाँ चिलगोज़ा अंदर से चिल्लाए, ‘‘भाई लोगो, आज तबीयत दुरुस्त नहीं है। ज़रा आराम फरमा रहा हूँ। आप लोग तशरीफ ले जाएँ।’’
छब्बू पहलवान अचरज में आ गए। मियाँ और बीमारी! यह भला कैसे संभव है।
‘‘अरे, आप तो ख़ुद हकीम हैं, भला कैसे बीमार हो सकते हैं? बाहर आइए।’’ उसने दरवाज़े पर एक और धौल जमाई। अबकी चौखट तक हिल गई। नीचे बिल बनाए एक चुहिया निकलकर भागी।
मियाँ चिलगोज़ा अचकचा गए। कहने को तो वे कह गए थे, पर लगा उन्हें भी था कि बहाना कमज़ोर है। लेकिन अब कह दिया था, तो बात रखनी ही थी। आवाज़ में कमज़ोरी लाकर बोले, ‘‘पहवान मियाँ, मर्ज़ को क्या पता कि मैं क्या हूँ। उसके पास आँखें थोड़े ही हैं, जो वह हकीम और मरीज़ में अंतर करे?’’
‘‘हाँ, बात तो सही है,’’ चचा छुहारा ने कहा।
चचा छुहारा को समझ में आ गया, मतलब छब्बू पहलवान को भी समझ में आ गया। तीनों जिधर से आए थे, सब उधर ही वापस चले गए।
मियाँ चिलगोज़ा की जान में जान आई। जब आवाज़ें दूर चली गईं और अंदाज़ा हो गया कि सब चले गए हैं तो उन्होंने बाहर का जायज़ा लेने के लिए खिड़की खोली। पर अभी चेहरा बाहर निकाला भी न था कि किसी ने लपककर खिड़की के दोनों पल्ले पकड़ लिए।
‘‘अब आए मियाँ पकड़ में। ख़ूब छकाया। अब बोलो, कौन-सा बहाना बनाओगे?’’
मियाँ चिलगोज़ा पत्थर की मूरत हो गए। लो एक और मुसीबत! डरते-डरते नज़र डाली तो देखा चिरौंजी बनिया खिड़की के दोनों पल्ले पकड़े धौंस देता हुआ खड़ा था। कई महीनों से उसका उधार खा रहे थे। चुकाने की बात आती तो इधर-उधर छिपने लगते। मियाँ चिलगोज़ा को समझ में नहीं आ रहा था क्या करें। इतनी जल्दी कोई बहाना भी दिमाग़ में नहीं आ रहा था। अब उसकी खरी-खोटी सुनने के अलावा कोई चारा न था। लेकिन हैरत की बात यह कि चीख़-चीख़कर मुहल्ले भर को इकट्ठा कर लेनेवाला चिरौंजी अब तक अचकचाया-सा खड़ा था। कनखियों से देखा तो पाया उसके चेहरे पर अजब-सा भाव है और हाथों की पकड़ धीरे-धीरे ढीली पड़ती जा रही है।
‘‘माफ़ करिएगा...क्या हकीम जी घर पर हैं?’’ उसने अटकते-अटकते पूछा।
पल भर को तो मियाँ चिलगोज़ा को कुछ समझ न आया। पर जब ख़तरा टलते देखा तो दिमाग़ की खिड़कियाँ खुलने लगीं। समझ गए कि चिरौंजी की तरफ सफाचट मूँछवाला चेहरा है। इसीलिए वह उन्हें पहचान नहीं पा रहा है।
मियाँ चिलगोज़ा आवाज़ बदलने में माहिर थे। फ़ौरन आवाज़ में कमसिनी घोलकर, लेकिन कड़कते हुए बोले, ‘‘जी नहीं, हकीम साहब तो नहीं हैं। मैं उनका छोटा भाई हूँ। पर शरीफों से बात करने का यह कौन-सा तरीका है?’’
डपट खाकर चिरौंजी बड़ा सिटपिटाया। उसने खिड़की के पल्ले छोड़े और वहाँ से सरपट हो लिया।
मियाँ चिलगोज़ा फूले न समाए। जो काम आज तक उनकी बहानेबाज़ी और झूठ बोलने की कला न कर पाई थी, आज सफाचट मूँछ ने कर दिखाया था।
अभी वह अपनी जीत का जश्न मना ही रहे थे कि दरवाज़े पर फिर दस्तक हुई। लपककर झिर्रियों से झाँका तो लगा सीने पर किसी ने घन चला दिया हो। एक मुसीबत टली, तो दूसरी आ खड़ी हुई। सामने मुनीम काजू अपनी बही दबाए खड़े थे। पर अबकी मियाँ चिलगोज़ा घबराए नहीं। एक रास्ता तो उन्हें मिल ही गया था। आव देखा न ताव, उस्तरा उठाया और दाईं तरफ की मूँछ भी सटाक् से उड़ा दी। फिर दरवाज़ा खोलकर सामने आ गए।
इससे पहले कि मुनीम काजू कुछ कहते, उन्होंने डपटते हुए कहा, ‘‘बड़े भाई ने दो-चार रुपए उधार क्या ले लिए, आप लोगों ने जीना हराम कर दिया? उधार ही लिया है, डकैती थोड़े ही डाली है? यहाँ से दफा होइए। अब मैं आ गया हूँ, उनकी पाई-पाई चुका दूँगा।’’
मुनीम काजू आए तो थे बड़े तमतमाकर, पर उनके ताव पर जैसे ठंडा पानी पड़ गया। सिटपिटाते हुए बग़ल में बही दबाई और धोती सँभालते हुए एक-दो-तीन हो लिए।
मियाँ चिलगोज़ा को जैसे अलादीन का चिराग़ मिल गया। फौरन माँग काढ़ी, कपड़े बदले और मुहल्ले में निकल पड़े। जिस-जिससे उधार लिया था, जाकर धमका आए कि अब दरवाज़े पर दिखे तो ख़ैर नहीं। बड़े भाई महीने भर के लिए बाहर गए हुए हैं। उनके आते ही पूछकर सबका उधार चुका दूँगा।
उधार देनेवालों ने तेवर देखकर समझा कि छोटा भाई ज़रूर पैसेवाला है। तभी तो इतनी ठसक से बोल रहा है। उन्होंने हाथ जोड़ लिए, ‘‘सरकार, ऐसी कोई जल्दी नहीं है। घर की बात है। जब मर्ज़ी हो, दे दीजिएगा।’’
यही नहीं, वह जहाँ पहुँचते चाय और पान अलग से पेश होते।
मियाँ चिलगोज़ा की मौज हो गई। अब वे बेफ़िक्री से पैर पसारकर सोते।
∙∙∙

इसके बाद की कहानी का तो मुझे पता नहीं। हाँ, मुहल्लेवाले बताते हैं एक महीने बाद उनके छोटे भाई बिना बताए वापस चले गए और उनकी जगह बड़ी-बड़ी मूछों और गंजे सिरवाले एक बड़े मियाँ आ गए हैं, जो ख़ुद को मियाँ चिलगोज़ा का बड़ा भाई बता रहे हैं और लोगों को धमकाते फिर रहे हैं कि किसी ने छोटे भाई को परेशान किया तो ख़ैर नहीं।

8 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन मुस्कुराते रहिए... फ़टफ़टिया बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. वाह साहब, मज़ा आ गया....! क्या चुटीला अंदाजे-बयां है! बहुत ख़ूब....

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  3. bahut achhi kahani hai .. bahut samy baad is tarah ka kuchh padhaa..

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  4. हाहहाहाहा...बहुत मजेदार कहानी लगी...

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