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Tuesday, 20 May 2014

मियाँ चिलगोज़ा की दौड़


...और मियाँ चिलगोज़ा लड़कों से उलझ गए।
हुआ यह था कि वह बजरंगी की गुमटी पर पान खाने रुके थे। आदत थी कि पान लगवाते तो कत्था, चूना, ज़र्दा, इलायची, नारियल, क़िवाम--इतनी चीज़ें डलवाते कि बजरंगी को कहना पड़ जाता, ‘हकीम साहब, जो दो रुपए दिए हैं, कहिए तो वह भी डाल दूँ।’
आज भी जब वे पान खाने रुके तो दो रुपए वसूल करने के चक्कर में ज़र्दा ज़्यादा डलवा लिया। ज़र्दा था भी ऐसा असरदार कि उनकी कनपटियों से पसीना चू गया। उन्हें बेचैनी से सीना सहलाते देख एक मसखरे ने कहा, ‘‘हकीम साहब, ज़र्दा ज़रूर खाइए पर सेहत का भी ख्याल रखिए, ऐसा न हो कि गश खाकर गिरें तो सहारा देना पड़े।’’
बस, पाँच फुट के मियाँ चिलगोज़ा ताव खाकर दस फुट उछल गए।
‘‘बर्ख़ुरदार, पान खाना हमारा ख़ानदानी शौक़ रहा है। ज़ाफ़रान और केसर से मुअत्तर क़िवाम और ख़मीरे तुम सबने देखे भी नहीं होंगे। मियाँ, अगर महक भी ले लेते तो पाँच दिन होश न रहता। बड़े आए बातें करनेवाले!’’
‘‘कहाँ बीते ज़माने की बातें कर रहे हैं, हकीम साहब।’’ दूसरे मसखरे ने उनके ताव पर सान चढ़ाई, ‘‘जंगल में मोर नाचा किसने देखा? आज की बात करिए। आज का मुक़ाबला न तो पुराना ज़माना कर सकता है और न पुराने लोग।’’
‘‘क्या कहा...?’’ मियाँ चिलगोज़ा एक दम तवा हो गए, ‘‘अमाँ मुक़ाबला कर लो। चाहे ताक़त में, चाहे अक़्ल में, पार न पाओगे। तुम जैसों की तरह मिलावटी चीज़ें खाकर नहीं पला हूँ।’’
अब तक लोगों का मजमा इकट्ठा हो गया था। सब मज़े ले रहे थे। भीड़ में से किसी ने कहा, ‘‘हकीम साहब, ये आज के लड़के ऐसे नहीं मानेंगे। आपको ज़रूर कुछ करके दिखाना होगा।’’ 
‘‘हाँ-हाँ, अगले हफ्ते ‘क्रास-कंट्री’ दौड़ होने जा रही है। यह अच्छा मौका है। चैम्पियन बनकर सबके होश उड़ा दीजिए।’’ एक और आवाज़ आई।
‘‘हाँ-हाँ, सही कहा, यही ठीक है।’’ भीड़ ने शोर मचाया।
जोश में अच्छे-अच्छे होश खो बैठते हैं, मियाँ चिलगोज़ा तो वैसे भी बड़बोले थे। बात की बात में तय हो गया कि अगले हफ्ते होनेवाली रेस में हिस्सा लेकर और अव्वल नंबर आकर सबका मुँह बंद कर देंगे।
भीड़ अपने रास्ते चली, मियाँ चिलगोज़ा अपने रास्ते। घर तक पहुँचते-पहुँचते मियाँ चिलगोज़ा की ख़ुमारी उतर गई। अब जाकर उन्हें अहसास हुआ कि वो जोश में क्या गज़ब कर बैठे। रेस का ख़्याल आते ही टाँगें थरथराने लगीं। हालत पतली हो गई। पर लोगों के सामने ज़बान दे चुके थे, अब पीछे पलटना मुमकिन न था।
अँधेरा हुआ तो मियाँ चिलगोज़ा कंबल ओढ़कर छिपते-छिपाते हकीम बंदा मेहंदी के दवाख़ाने जा पहुँचे। हकीम साहब के बारे में लोग कहते थे कि उनके पास ऐसे-ऐसे माजून और ख़मीरे हैं कि एक हड्डी का आदमी भी दारा सिंह बन जाए। क़स्बे में जगह-जगह उनके दवाख़ाने के पोस्टर चिपके हुए थे जिनमें एक ओर दुबला-पतला, कमज़ोर और बीमार आदमी बना रहता था तो दूसरी ओर कसरती बदनवाला हट्टा-कट्टा पहलवान।
इसी उम्मीद और जादुई कायापलट की आस लेकर मियाँ चिलगोज़ा उनके दरवाज़े पहुँच गए।
सहन में किसी की आहट पाकर लालटेन की रोशनी ऊँची करते हुए हकीम साहब बोले, ‘‘वहाँ कौन है?’’
मियाँ चिलगोज़ा कंबल ओढ़े हाँफते-काँपते हकीम साहब के सामने आ खड़े हुए।
‘‘अमाँ मियाँ, इतनी गर्मी में कंबल ओढ़कर निकले हो, तबीयत तो ठीक है? मलेरिया-वलेरिया तो नहीं हो गया?’’ हकीम साहब चौंकते बोले।
‘‘ऐसा ही समझो, हकीम साहब। अपनी तो जान पर बन आई है।’’ मियाँ चिलगोज़ा ने गिड़गिड़ाते हुए सारा क़िस्सा कह सुनाया।
हकीम साहब ध्यान से सारी बात सुनते रहे। फिर उलाहना देते हुए बोले, ‘‘अमाँ, ऐसी बात कहने की ज़रूरत ही क्या थी? ये उमर और बच्चों जैसी नादानी!’’
‘‘पर अब तो जो कहना था कह दिया। किसी तरह नाक कटने से बचाइए। कभी दो क़दम तेज़ चाल से चला भी नहीं हूँ, कहाँ ये दस किलोमीटर की दौड़।’’ मियाँ चिलगोज़ा ने हाथ जोड़ लिए।
‘‘पर मियाँ, ऐसी कोई दवा भी तो नहीं है, जो रातों-रात तुम्हें मिल्खा सिंह बना सके।’’ हकीम साहब ने सिर खुजलाते हुए कहा।
‘‘तो जगह-जगह जो पोस्टर लगा रखे हैं, क्या वो सब झूठ हैं?’’ मियाँ चिलगोज़ा गरम होकर बोले।
‘‘अमाँ वे तो हाथी के दाँत हैं--ग्राहकों को फँसाने के तरीक़े।’’ हकीम साहब खिसियाकर बोले, ‘‘और हकीम तो तुम भी कहलाते हो; अपने लिए ख़ुद कोई नुसख़ा तैयार क्यों नहीं कर लेते?’’
‘‘अमाँ, मेरी जान पर बनी है और तुम्हें मज़ाक़ सूझा है।’’ मियाँ चिलगोज़ा खिसियाते हुए बोले, ‘‘मेरी हिकमत के बारे में तुम्हें तो अच्छी तरह पता है। मेरे नाम के साथ हकीम वैसे ही जुड़ा है, जैसे आजकल के लड़कों के नाम के साथ ग्रेजुएट।’’
  ‘‘वो तो ठीक है मियाँ पर इस उम्र में तुम्हें ताक़त की कोई दवा दी भी तो नहीं दी जा सकती। कमज़ोर हाज़मे के लिए वह जुलाब साबित होगी।’’ हकीम साहब सिर खुजलाते हुए बोले।
‘‘पर कुछ तो करो हकीम साहब, वर्ना मैं कहीं मुँह दिखाने के क़ाबिल नहीं रहूँगा।’’
‘‘एक रास्ता है...तुम अपने चचा के पास रामपुर चले जाओ।’’
‘‘अमाँ, ये उपाय है कि हँसी उड़वाने का माकूल इंतज़ाम? लौटकर आऊँगा तो लोग ताने दे-देकर जान नहीं ले-लेंगे।’’
‘‘मियाँ, पूरी बात तो सुनो...’’ हकीम साहब बताने लगे, ‘‘सुबह के ग्यारह बजे जब पान की गुमटी पर सबसे ज़्यादा भीड़ होती है, मैं तुम्हारा चचा बनकर बजरंगी के पास फोन करूँगा कि तबीयत बहुत ख़राब है। बस आज-कल का मेहमान हूँ। आ जाओ तुम्हारे दीदार में ही रुह अटकी है।’’
‘‘वाह-वाह, क्या आइडिया है! मेरे फोन तो वैसे भी बजरंगी के ही पास आते हैं। इस तरह लोगों को शक भी नहीं होगा।’’ मियाँ चिलगोज़ा ख़ुशी से उछल पड़े।
दूसरे दिन सुबह से ही मियाँ चिलगोज़ा पान की दूकान पर जा बैठे। वे पहुँचे तो भीड़ भी आ जुटी। हँसी-ठट्ठा मचने लगा।
अभी साढ़े दस ही बजा था कि बजरंगी पानवाले का मोबाइल टिनमिनाने लगा। कान से सटाकर ‘हलो’ कहते ही बजरंगी सिटपिटा गया और फोन मियाँ चिलगोज़ा को थमाता हुआ फुसफुसाया, ‘‘आपके चचाजान हैं, रामपुर से..’’
मियाँ चिलगोज़ा का मन बल्लियों उछल पड़ा। भीतर ही भीतर पफूलते हुए फोन कान से लगाया तो उधर से आवाज़ आई--‘‘अमाँ मियाँ, क्या हाल-चाल हैं? सुनने में आया है कि तुमने दस किलोमीटर की दौड़ में हिस्सा लेने का फैसला किया है। ये बहुत अच्छी बात है। तुम मेरे असली भतीजे हो। मैं कल सुबह की गाड़ी से आ रहा हूँ, तुम्हें दौड़ की बारीकियाँ सिखाने।’’
अरे, बाप रे! ये तो सचमुच चचा थे। दौड़ में भाग लेने की ख़बर उन तक भी जा पहुँची थी। मियाँ चिलगोज़ा को लगा कि हार्ट-फेल हो जाएगा। फोन फेंककर सीधे हकीम साहब के घर जा पहुँचे।
सारी बात जानकर हकीम साहब भी सकते में आ गए। मियाँ चिलगोज़ा उनके बचपन के दोस्त थे, उनकी दुख-तकलीफ में वे हमेशा बराबर के शरीक रहे थे। उन्हें भी नहीं समझ में आ रहा था कि करें तो क्या करें। एक रास्ता था, वह भी हाथ से निकल गया। 
मियाँ चिलगोज़ा मायूस होते हुए बोले, ‘‘हकीम साहब, आपकी दवाएँ बीमारी ठीक करती हैं। पर कोई ऐसी नहीं है जो बीमार कर दे? कम से कम इसी बहाने बच जाऊँ।’’
‘‘लेकिन बुखार और दस्त से भी क्या होगा?’’ हकीम साहब दाढ़ी खुजलाते हुए बोले, ‘‘लोग समझेंगे बहाना बना रहे हैं। काम तो तब बनेगा जब कोई ज़ाहिरी बात हो, जैसे--टाँग टूट जाए, चोट लग जाए...’’
सुनते-सुनते मियाँ चिलगोज़ा अचानक उठ खड़े हुए और घर की ओर चल पड़े। उनका चेहरा तमतमाया हुआ था। वह मन ही मन कोई निर्णय ले चुके थे।
घर पहुँचकर मियाँ चिलगोज़ा ने आव देखा न ताव, सीधे छत पर पहुँचे और आँख बंद करके, हिम्मत जुटाकर नीचे कूद पड़े।
हवा में अरा...रा...रा... ‘ध्म्म’ होते ही मियाँ चिलगोज़ा लगे चिल्लाने, ‘‘हाय मर गया, मर गया, टाँग टूट गई। बचाओ।’’
पर उनकी आवाज़ के साथ-साथ एक और आवाज़ सुनाई दी, उनसे भी ज़्यादा तेज़, ‘‘हाय मर गया, मर गया, कमर टूट गई। बचाओ।’’
मियाँ चिलगोज़ा ने नीचे देखा तो पता चला कि वो जिस गद्दे पर गिरे थे और सोच रहे थे लोग नाहक ही गिरने से डरते हैं, वह और कोई नहीं कल्लन था, जो दीवार की टेक लेकर आराम फ़रमाने बैठा था। मियाँ चिलगोज़ा को तो कुछ नहीं हुआ पर कल्लन की पीठ दोहरी हो गई। यह आइडिया भी फेल हो गया। मियाँ चिलगोज़ा मुँह लटकाए फिर हकीम साहब के पास जा पहुँचे और लगे बिसूरने।
हकीम साहब बड़ी देर तक ख़ामोश रहे, फिर बोले, ‘‘अब तो बस एक ही सूरत नज़र आती है। कल दौड़ में नाम लिखाने की आख़िरी तारीख़ है। तुम घर पर चादर तानकर सो जाना। कोई पूछे तो कह देना याद ही नहीं रहा।’’
अगले दिन मियाँ चिलगोज़ा की नींद हालाँकि अलस्सुबह उचट गई, पर वे दम साधकर पड़े रहे। सूरज सिर पर आ गया, सड़कों पर चहल-पहल शुरू हो गई, पर मियाँ चिलगोज़ा न जागे। किसी तरह दोपहर दो बजे तक तो उन्हें सोना ही था।
ख़ुदा-ख़ुदा करके दो बजे। वह चादर फेंककर उठने ही वाले थे कि दरवाज़े पर दस्तक हुई। मियाँ चिलगोज़ा ने आँखें मिचमिचाते और झूठी जम्हाइयाँ लेते हुए दरवाज़ा खोला तो सामने रब्बू खड़ा था।
 ‘‘मियाँ साहब, आज नाम लिखाने की आख़िरी तारीख़ थी। आप नहीं पहुँचे तो चेयरमैन साहब ने अपने पास से फीस जमा करके आपका नाम लिखा दिया।’’ रब्बू ने बताया।
मियाँ चिलगोज़ा को लगा अभी गश खाकर गिर पड़ेंगे। न रोते बन रहा था, न हँसते। इतनी मेहनत की, जान की बाज़ी लगाई, पर सब बेकार। अब तो दौड़ में हिस्सा लेना ही था।
आख़िरकार दौड़ का दिन आ गया। सब लोग नगर पालिका के मैदान में इकट्ठा हो गए। मियाँ चिलगोज़ा सबसे किनारे जाकर खड़े हो गए। ख़ूब हँसी-मज़ाक़ हो रहा था। दौड़नेवाले खिलाड़ी जोश में उछल रहे थे। लोग चिल्ला-चिल्लाकर उनका हौसला बढ़ा रहे थे।
दौड़ शुरू हुई। सब भाग चले। मियाँ चिलगोज़ा भी दौड़ पड़े। अब तो उनके सामने एक ही रास्ता बचा था--करो या मरो। थोड़ी ही देर में उनकी साँसें धौंकनी की तरह चलने लगीं, कान की लवें लाल हो गईं, सीने पर जैसे कोई हथौड़े मारने लगा। पर रुक रहना अब उनके बस में नहीं था।
मियाँ चिलगोज़ा दौड़ते रहे-दौड़ते रहे। जाने कितनी देर तक दौड़ते रहे। जब फिनिशि-लाइन पर पहुँचे तो धुँधलाती आँखों से इतना ही दिखा कि बाक़ी सब खिलाड़ी पहुँचकर उनका ही इंतज़ार देख रहे हैं।
फिनिशि-लाइन पार करते-करते मियाँ चिलगोज़ा ढह गए।
तभी उनके कानों में उद्घोषक की आवाज़ पहुँची। वह कह रहा था, ‘‘आज की दौड़-प्रतियोगिता में एक सबसे ख़ास पुरस्कार दिया जा रहा है, जिसके विजेता हैं- हकीम चिलगोज़ा। और यह पुरस्कार है--रेस में सबसे पीछे रहने का पुरस्कार।’’
मियाँ चिलगोज़ा ने तालियों की गड़गड़ाहट सुनी तो फूलकर कुप्पा हो गए। पर होश खोने से पहले उन्होंने उद्घोषक की आख़िरी लाइन नहीं सुनी।


Sunday, 27 April 2014

गई भैंस पानी में
एक दिन डेयरी पर पहुँचकर जब हकीम चिलगोजा को पता चला कि आज से दूध पैंतीस रुपए लीटर मिलेगा, तो बिफर पड़े। बड़बड़ाते हुए अपनी पाँच लीटर की डोलची, जिसमें वह सिर्फ पाव भर दूध लेते थे, उठाई और लौट पड़े। मारे ग़ुस्से के तय कर लिया कि आज से दूध का इस्तेमाल बंद। बच्चा तो हैं नहीं, जो बिना दूध के जी नहीं पाएँगे।
लेकिन हकीम चिलगोजा थे चाय के पक्के शौक़ीन। दोपहर होते-होते उनके सिर में भँवरें घूमने लगीं। बोलते तो लगता सिर में गोल-गोल कुछ घूम रहा है। क़दम यहाँ के वहाँ पड़ते। चिड़चिड़ाहट ऊपर से। इसी उलझन में छब्बू पहलवान से भेंट हो गई। छब्बू चाय के शौकीन तो नहीं थे, लेकिन खाने के बाद लीटर-डेढ़ लीटर मट्ठा ज़रूर पीते थे। पहले कभी दूध-दही बेचने का भी धंधा करते थे, लेकिन मन नहीं रमा तो सब छोड़-छाड़कर पहलवानी करने लगे।
सारी बात जानकर वह बोले, ‘‘हकीम जी, कहाँ तक क़समें खाते फिरोगे? दूध के दाम तो बढ़ते ही रहेंगे। आगे चलकर चाय और मट्ठा सपनों में भी नहीं दिखाई देंगे। मेरी मानो तो एक भैंस ले डालो।’’
बात हकीम चिलगोजा को समझ आ गई। सोचा, दूध के दाम तो सचमुच दिन-दूने, रात-चौगुने बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे में भैंस ख़रीद ली जाए तो सचमुच फ़ायदे का सौदा होगा। ताज़ा-खरा दूध तो मिलेगा ही, गाहे-बगाहे घी-मक्खन भी मिल जाया करेगा। हकीम चिलगोजा ख़यालों में डूब गए।
‘‘कहाँ खो गए, हकीम जी, मैं तो कहता हूँ नफ़ा ही नफ़ा है,’’ छब्बू पहलवान बोले, ‘‘एक औसत भैंस भी रोज़ाना दस-बारह लीटर दूध देती है। जितनी इच्छा हो पियो, दही-मक्खन जमाओ। बचे, सो बेच दो। आम के आम गुठलियों के दाम।’’
सचमुच! हकीम चिलगोजा ने तो यह सोचा भी नहीं था। बात ही बात में तय हो गया कि अगले बुध को सोहावल के नक्ख़ासे में जाकर कोई बढ़िया भैंस ख़रीद लाएँगे। लेकिन बात तय हो जाने के बाद भी हकीम चिलगोजा परेशान-से दिख रहे थे। छब्बू पहलवान ने कुरेदा तो बोले, ‘‘यार छब्बू, तुमने तो दुनिया का रंग-ढंग देख रखा है। मैं ठहरा सीधा-सादा आदमी। न तो काले अच्छर से ख़ास पहचान है, न काली भैंस से। कहीं ठग-ठगा लिया गया तो ज़िंदगी भर की पूँजी लुट जाएगी। तुम भी साथ क्यों नहीं चले चलते?’’
छब्बू पहलवान अपना सफाचट सिर खुजलाते हुए बोले, ‘‘हकीम जी, आप तो बड़े भाई जैसे हो। भला साथ चलने से कैसे मना कर सकता हूँ? लेकिन एक बात मेरे मन में आ रही है। कहो तो कह दूँ।’’
‘‘हाँ-हाँ, कहो।’’ हकीम चिलगोजा बोले।
‘‘देखो हकीम जी, जब गाढ़ी कमाई दाँव पर लग रही हो तो आगा-पीछा सब सोचना ही पड़ता है। मान लो कि भैंस ख़रीदकर आ जाए, लेकिन उसे दुहने वाला कोई न हो तो? भैया, भैंस दुहना हँसी-खेल नहीं है, बताए देता हूँ। यह हमारे-आपके जैसों के बस की बात नहीं है।’’
हकीम चिलगोजा ने छब्बू पहलवान की अनुभव भरी बातों को सिर आँखों चढ़ाया। तय हुआ कि कल्लू ग्वाले को भी साथ ले लिया जाए। उसकी राय भी महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि असली काम तो उसी का है।
बात एकदम तय हो चुकी थी कि छब्बू पहलवान को फिर एक आइडिया आया, बोले, ‘‘हकीम जी, एक बात और सुन लो। कल्लू तो दूध दुहकर चला जाएगा। बाक़ी, भैंस का सानी-भूसा कौन करेगा, मैदान में चराएगा कौन? चरवाहों को सीधी और मरखनी भैंसों की ख़ूब जानकारी होती है। मेरे विचार से एक चरवाहा भी साथ लिए चलो।’’
छब्बू पहलवान की सूझ पर हकीम चिलगोजा लाजवाब हो गए। बित्तन चरवाहे को भी साथ ले चलना तय हो गया। 
थोड़ी देर बाद जब दोनों उठने लगे तो हकीम चिलगोजा के दिमाग में भी एक विचार आ गया। बोले, ‘‘यार छब्बू, भैंस आएगी, तो मैदान में तो खड़ी नहीं रहेगी? उसका छप्पर-खपरैल भी छवाना ही पड़ेगा। क्यों न राजगीर को भी साथ लेते चलें? वह भी कोई न कोई राय देगा ही।’’
छब्बू बोले, ‘‘चलो, राज को भी रख लो। लेकिन एक बात और कहे देता हूँ। जानवर भी हम इंसानों की तरह होते हैं। अगर उनकी सेवा-टहल न की जाए, एक-दो दिन पर नहलाया-धुलाया न जाए तो मुँह फुला लेते हैं। भैंस दिखने में भले ही बुद्धू नज़र आए, पर होती बड़ी नख़रीली है। अड़ जाए तो बूँद भर दूध के लिए तरसा दे। मेरी मानो तो बेंचू टहलुए को भी साथ ले लो।’’
हकीम चिलगोजा ने बात को ऐसे ध्यान से मुँह फैलाकर सुना मानो लाख टके की हो और छूट जाती तो जाने कितना बड़ा नुकसान हो जाता।
‘‘एक बात और सुनो,’’ छब्बू की सफाचट खोपड़ी में एक से बढ़कर एक विचार आ रहे थे, ‘‘भगवान न करे, पर भैंस कभी बीमार-हैरान हुई तो? मेरी मानो तो चौबे वैद्य जी को भी ले चलो। हम लोग तो रंगी-पुती भैंस को ऊपर-ऊपर देखकर निहाल हो जाएँगे। पर भीतर का हाल तो एक अच्छा वैद्य ही बता सकता है।
‘‘लेकिन चौबे जी तो आदमियों के वैद्य हैं। वे भला भैंस के बारे में क्या बताएँगे?’’ हकीम चिलगोजा ने हिचकते-हिचकते अपनी बात रखी।
‘‘माना कि चौबे जी आदमियों के वैद्य हैं। पर जो वैद्य चेहरे का रंग देखकर बीमारी बता दे, नब्ज़ पकड़कर रोग पहचान ले, वह भला भैंस की तंदुरुस्ती नहीं पहचान सकेगा?’’ छब्बू ने अपना तर्क रखा।
हकीम चिलगोजा फिर लाजवाब हो गए।
‘‘देखो भाई छब्बू, तुम्हारी बातें सुन-सुनकर अब मेरा भी दिमाग़ खुलने लगा है।’’ हकीम चिलगोजा भी दूर की कौड़ी लाते हुए बोले, ‘‘यह तो सोचो कि भैंस आ गई तो वह मोढ़े पर तो बैठेगी नहीं। उसका खूँटा लुहार ही बनाएगा। अब अगर सब लोग गए और लुहार को साथ न ले गए तो वह बुरा नहीं मानेगा?’’
‘‘अरे हाँ, अच्छा याद दिलाया,’’ छब्बू चहककर बोले, ‘‘लुहार को ले गए और रस्सी बँटने वाले बूढ़े बिद्दू को न ले गए, तो? फिर वह भला अच्छी रस्सी देगा?’’
‘‘एक बात और सुनो,’’ हकीम चिलगोजा को फिर एक सूझ आई, ‘‘रात को तो सब अपने-अपने घर चले जाएँगे। आजकल चोर-उचक्कों का बड़ा डर रहता है। कहीं कोई भैंस को खोल ले गया तो? मेरी समझ से चौकीदार को भी साथ ले चलना चाहिए।’’
हकीम चिलगोजा और छब्बू बातें करते रहे और साथ ले चलने वालों की सूची लंबी होती रही। उठते-उठते करीब पंद्रह-बीस लोगों की सूची तैयार हो गई; वह भी बड़ी काट-छाँट और चुनाव के बाद।
निर्धरित दिन हकीम चिलगोजा की फौज भैंस ख़रीदने चल पड़ी। छब्बू की सलाह पर हकीम चिलगोजा ने परदादा की ज़ंग खाई बंदूक भी टाँग ली। उनकी सोच थी कि इससे दूकानदार पर रौब पड़ेगा।
दोपहर चढ़ते-चढ़ते हकीम चिलगोजा की पलटन सोहावल पहुँच गई।
नक्ख़ासे में बड़ी चहल-पहल थी। एक से एक जानवर बाज़ार में बिक रहे थे। बड़ी-बड़ी घूमी हुई सींगों वाले बैल, बर्फ जैसी सफेद रंगवाली दुधारू गायें, जमुनापारी बकरे, बढ़िया नस्ल के घोड़े। हकीम चिलगोजा और उनके साथी हैरत से आँखें फाड़े इधर-उधर देख रहे थे। दूर-दूर से लोग आए हुए थे। मेला-सा लगा हुआ था। कहीं चाट बिक रही थी, तो कहीं गर्मागर्म जलेबियाँ निकाली जा रही थीं। कहीं समोसे तले जा रहे थे, तो कहीं कचौड़ियाँ छानी जा रही थीं। हकीम चिलगोजा और उनका दल हर एक चीज़ को ठहर-ठहरकर हैरत से देखता चल रहा था और लोग उन्हें हैरत से देख रहे थे।
घूम-घामकर देखने के बाद आख़िरकार एक भैंस उन्हें पसंद आ गई। हकीम चिलगोजा पूरी फौज लेकर एक भैंस बेचनेवाले के पास जा पहुँचे। छब्बू ने पहले ही सिखा रखा था कि ख़ूब अकड़कर बातें करना। सिधाई से पूछोगे तो बुद्धू समझकर ठग लिए जाओगे। हकीम चिलगोजा ने आव देखा न ताव पूरे जोश में भैंस बेचनेवाले पर बंदूक सीधी करते हुए बोले, ‘‘ओ दूकानदार, भैंस देता है या नहीं।’’
‘‘हाँ-हाँ, बोल?’’ छब्बू पहलवान ने भी मूँछें ऐंठी।
भैंस बेचनेवाला काँप गया। पंद्रह-बीस लोगों की फौज उसे घूरती हुई खड़ी थी। तरह-तरह के लोग। कोई कोयले के पहाड़ जैसा, तो कोई झाड़ू जैसी मूछों वाला। किसी की लाल-लाल आँखें, तो किसी का शीशे जैसा घुटा हुआ सिर। कोई लाठी लिए खड़ा, तो कोई रस्सी। ऊपर से हकीम चिलगोजा बंदूक ताने हुए। भैंस बेचनेवाले ने समझा, हो न हो ये सब डाकू हैं। डर के मारे वह ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा, ‘‘बचाओ-बचाओ, डाकू आ गए।’’
नक्ख़ासे में पुलिस भी टहलती थी। उसने लोगों की चिल्लाहट सुनी तो लपकी आई। हकीम चिलगोजा ख़ाकी वर्दी देखकर वैसे भी काँपते थे और जब देखा कि पुलिस का पूरा दल उनकी ओर बंदूक ताने दौड़ा आ रहा है, तो उनकी हवा ख़िलाफ़ हो गई। बंदूक फेंकी और अचकन सँभालकर भाग खड़े हुए। जब लीडर भागा तो बाक़ी लोग खड़े रहकर क्या करते? छब्बू पहलवान सहित पूरा दल ‘भागो-भागो’ चिल्लाता हुआ भाग खड़ा हुआ। पुलिस ने समझा ये सब सचमुच बड़े लुटेरे हैं। फिर तो नक्ख़ासे में तमाशा हो गया। आगे-आगे हकीम चिलगोजा की फौज और पीछे-पीछे बंदूक ताने पुलिस। लेकिन भला पुलिस से कब तक बचते? चारों तरफ से घेर के पकड़ लिए गए।
बेचारे हकीम चिलगोजा! गए तो थे भैंस लेने, हत्थे चढ़ गए पुलिस के। इस घटना के बाद उन्होंने ही क्या सबने मिलकर क़सम खा ली कि अब दूध की तरफ नज़र भी नहीं डालेंगे और चाय.....उसके बारे में तो सपने में भी नहीं सोचेंगे।