Monday, 28 September 2026

किच्चू जादूगर है

 

 

‘‘सुनो, सब सुनो, पता है, किच्चू को जादू आता है...’’ पापा ने कहा। वह मंद-मंद मुस्करा रहे थे।
मम्मी रसोई में थीं। निकलकर आईं और बोलीं
, ‘‘अच्छा...! मैं तो समझती थी किच्चू को सिर्फ गुस्सा करना आता है।’’
‘‘हाँ, मैं भी यही सोचती थी किच्चू को बस जिद करना आता है।’’ दादी ने भी कहा।
‘‘अरे, कहाँ, किच्चू को सिर्फ रूठना आता है।’’ चाचू हँसते हुए बोले।
‘‘नहीं-नहीं, किच्चू को तो बस रोना आता है। ऊँ...ऊँ...ऊँ’’ चिक्की ने चिढ़ाते हुए कहा।
‘‘मेरी बात का यकीन करो। किच्चू अच्छा जादूगर है।’’ पापा ने जोर देकर कहा।
‘‘लेकिन कैसे?’’ सबने हैरानी से पूछा।
पापा की बात पर किच्चू खुद हैरान था। उसे भी समझ में नहीं आ रहा था। उसने भला कौन-सा जादू कर दिखाया
?
पापा बोले, ‘‘चिक्की, तुमने सुबह किच्चू को एक पेंसिल दी थी। सुनहरे रंगवाली। याद है न? किच्चू ने उसे दो पेंसिलों में बदल दिया।’’
पापा ने दोनों हाथ आगे किए। उनके पास सचमुच दो सुनहरी पेंसिलें थीं।
सब हैरत में पड़ गए।

‘‘पर किच्चू ने ये जादू कैसे किया?’’ दादा जी ने हैरान होकर पूछा।
‘‘ये तो किच्चू ही बता पाएगा।’’ पापा हँसते हुए बोले।
अब किच्चू को सारा मामला समझ में आया। थोड़ी देर पहले वह होमवर्क कर रहा था। बार-बार गलती हो रही थी। उसे गुस्सा आ गया। उसने गुस्से में पेंसिल के दो टुकड़े कर दिए। पापा यह देख रहे थे। उन्होंने दोनों टुकड़े शार्प कर दिए। दोनों टुकड़े छोटी-छोटी पेंसिलें बन गईं। पर यह बात सिर्फ किच्चू और पापा ही जान रहे थे।
तभी दादा जी बोले
, ‘‘मुझे एक और चश्मे की जरूरत है। मैं अपना चश्मा इधर-उधर रखकर भूल जाता हूँ। मेरे पास दो चश्मे हो जाएँगे तो बढ़िया रहेगा। मैं किच्चू से एक चश्मे से दो करवा लेता हूँ।’’
‘‘अरे, नहीं...मुझे जादू नहीं आता।’’ किच्चू शर्म से लाल हो गया और वहाँ से भाग गया।
 

Tuesday, 15 September 2026

चार व्यापारी

 



चार व्यापारी थे। लालचंद, मालचंद, तालचंद, और बालचंद। चारों एक से बढ़कर एक बड़बोले। कोई एक गप्प छेड़ता तो दूसरा उससे दोगुनी गप्प हाँकने लगता।

एक बार चारों व्यापारी बैलगड़ियों पर सामान लादकर व्यापार के लिए शहर चले। रास्ते में रात हो गई। बारिश का मौसम था। आसमान में बादल छाए हुए थे। चारों ने एक पेड़ के नीचे रुककर रात बिताने का विचार किया। उन्होंने साथ लाया भोजन किया और आग जलाकर बैठ गए।

उन दिनों चोर और ठग भी घात लगाए घूमा करते थे। इसलिए व्यापारियों ने रात जागकर बिताने का इरादा किया। लेकिन दिन भर थके होने के कारण वे जल्दी ही ऊँघने लगे। लालचंद, जो उन चारों में बड़ा और अनुभवी था, सोचने लगा अगर सब सो गए तो चोरी होने का ख़तरा रहेगा। आखिर इन सबको जगाए कैसे रखा जाए।

तभी हल्की-हल्की बूँदें पड़ने लगीं। सब दौड़कर अपनी-अपनी गाड़ियाँ ढँकने लगे। लालचंद कुछ सोचकर कहने लगा, ‘‘आज अगर मेरे परदादा जीवित होते तो हमें भीगने की चिंता न करनी पड़ती।’’

बाकी व्यापारी उसकी बात पर चौंक पड़े और बोले, ‘‘अच्छा...! वह कैसे?’’

लालचंद बोला, ‘‘उनके पास बहुत बड़ी छतरी थी। इतनी बड़ी कि उसके नीचे हमारा पूरा गाँव भीगने से बच जाता था। न गलियों में कीचड़ होता, न फिसलन। घनघोर बारिश में भी गाँववालों के काम हमेशा की तरह चलते रहते थे।’’

मालचंद ने हँसकर कहा, ‘‘लेकिन तुम्हारे परदादा की छतरी से हमें कोई लाभ नहीं होनेवाला था। यहाँ चारों तरफ पेड़-पौधे और जंगल-झाड़ियाँ हैं। इसलिए छतरी खोलना मुश्किल हो जाता। कँटीली झाड़ियों में उलझकर छतरी फट जाती।’’


‘‘तो क्या तुम्हारे परदादा के पास ऐसी कोई तरकीब थी, जिससे वे हमें बारिश से बचा सकते?’’ लालचंद ने उकसाते हुए पूछा।

‘‘हाँ, हाँ क्यों नहीं,’’ मालचंद कम बड़बोला नहीं था। उसने बात बनाते हुए कहा, ‘‘मेरे परदादा बहुत बड़े पहलवान थे। उनकी लंबाई 12 गज से थोड़ी ही कम रही होगी। मूँछें इतनी बड़ी-बड़ी थीं कि उन पर दो आदमी झूला झूल लें। कुर्ता सिलने के लिए चार दज़ीर् लगते थे। पगड़ी इतनी बड़ी कि उतारकर रख देते तो गाँव भर के बच्चे उसमें उछलते-कूदते थे। रोज सुबह कसरत करते और चार बाल्टी ताज़ा दूध पीते थे। चलते तो धरती ‘धम्म-धम्म’ हिलती थी।’’

‘‘लेकिन बात तो बारिश की हो रही थी।’’ लालचंद ने हँसकर कहा।

‘‘हाँ, हाँ, बता तो रहा हूँ,’’ मालचंद बोला, ‘‘जब कभी बारिश होती तो मेरे परदादा ऐसी फूँक मारते कि बादल तितर-बितर हो जाते। हमारे गाँव में तो कभी बारिश होती ही नहीं थी।’’

बालचंद हँस पड़ा, ‘‘तब तो तुम्हारे गाँव में सूखा पड़ता रहा होगा। तुम्हारे परदादा गाँव में पानी गिरने ही न देते होंगे।’’

उसकी बात सुनकर सब हँस दिए।

मालचंद बोला, ‘‘अरे नहीं, उनके पास एक लंबी छड़ी थी, जिससे वह बादलों को खींच लाते थे। एक बार ख़ूब गर्मी पड़ी। लोग पसीने से बेहाल हो गए। परदादा को आसमान में कहीं बादल का एक टुकड़ा दिख गया। बस उन्होंने उसे पकड़कर रस्सी से बाँध दिया। बेचारा हफ्ऱतों पतंग की तरह फड़फड़ाता रहा।’’


यह सुनकर तालचंद से न रहा गया। बोला, ‘‘मेरे परदादा बारिश तो नहीं रुकवा सकते थे, पर थे ऐसे कि उनकी चर्चा हर कहीं थी।’’

‘‘अच्छा, ऐसा क्या ख़ास था उनमें?’’ सब हैरानी से बोले।

‘‘उनके बाल इतने लंबे और घने थे कि वे कभी बिस्तर नहीं बिछाते थे। अपने बालों का नरम गद्दा बिछाकर कहीं भी लेट रहते थे। ओढ़ने के लिए कभी कंबल या रज़ाई की भी ज़रूरत नहीं पड़ती थी। दाढ़ी इतनी लंबी और घनी थी कि पूरा शरीर ढक जाता था। बच्चे लुका-छिपी खेलते समय अक्सर उनकी दाढ़ी या बालों के पीछे छिप जाते थे। पर एक बार किसी वजह से उन्हें दाढ़ी मुड़वानी पड़ी। उनकी दाढ़ी में दो-चार किताबें, एक रेडियो, चार गिलास और एक चिड़िया का घोंसला निकला। काग़ज के टुकड़ों, पन्नियों और सूखे पत्तों की तो गिनती ही नहीं। गाँववाले कहने लगे कि उन्हें बाल भी मुड़वाने चाहिए। पर वे इसके लिए तैयार नहीं हुए।’’

तालचंद की बात सुनकर सब हँसने लगे।


अब बारी बालचंद की थी। वह भला पीछे कैसे रहता? उसने खाँस-खँखारकर कहना शुरू किया, ‘‘बात चली है तो मैं कह देता हूँ। मेरे परदादा खाने-पीने के शौकीन थे। जब तक जागते रहते कुछ न कुछ खाते ही रहते। पेट इतना बड़ा था कि आठ लोग हाथ फैलाकर नापें तो भी मुश्किल हो। हाथ इतने भारी कि किसी के कंधे पर रख दें तो उसका राम-नाम सत्य हो जाए। वजन इतना कि चलते तो धरती पर गड्ढे हो जाते। जब वे घूमने निकलते तो पूरी सड़क जाम हो जाती। डुग्गी पिटवाकर लोगों के आने-जाने का रास्ता बदलवाना पड़ता। धूप से बचने के लिए लोगों की भीड़ अक्सर उनकी छाया में घूमा करती थी। उन्हें नहलाना...बाप रे बाप! पूरी मुसीबत थी। पूरा गाँव जुटता था। दो आदमी कंधे पर खड़े होकर बाल्टियाँ उलीचते थे। चार लोग सीढ़ियाँ लगाकर पीठ मलते थे। दुकान का सारा साबुन शरीर मलने में ही खप जाता था।’’

‘‘तब तो उन्हें तालाब जाकर नहाना चाहिए था। तुम लोगों की मेहनत बचती।’’ लालचंद ने कहा।

‘‘अरे नहीं, एक बार वे तालाब में नहाने जा घुसे थे। तालाब का सारा पानी उछलकर गाँव में फैल गया। रास्ते किचकिच हो गए। गाँव की औरतें चिल्लाने लगीं। तब से उन्हें गाँव के बाहर मैदान में बैठकर नहलाया जाने लगा।’’


‘‘तुम्हारी परदादी तो परेशान रहती होंगी। उनके लिए खाना बनाना तो बहुत मुश्किल काम रहा होगा?’’ लालचंद ने पूछा।

‘‘अब परदादी की याद दिला दी है तो उनका कमाल भी सुन लो,’’ बालचंद बताने लगा, ‘‘मेरी परदादी के कान इतने निराले थे क्या बताऊँ। मंद से मंद आवाज़ भी सुन लिया करते थे। जब परदादा बाहर से लौटते तो कोस भर पहले से क़दमों की आवाज़ सुन लिया करती थीं। एक बार चार चोर जंगल में बैठे चोरी की योजना बना रहे थे कि परदादी ने उनकी फुसफुसाहट सुन ली। फौरन कोतवाल को ख़बर कर दी। चारों पकड़े गए। परदादी का ख़ूब नाम हुआ। उन्हें इनाम भी मिला।’’ 

‘‘ये तो कुछ भी नहीं,’’ लालचंद ने बात काटकर कहा, ‘‘मेरी परदादी की आँखें इतनी तेज़ थी कि दीवार के पार भी देख लेती थीं। वह जमीन देखकर ही बता देतीं कहाँ पानी आसानी से मिल सकता है? कुआँ कहाँ खुदवाना चाहिए? उन्होंने ज़मीन में दबे अनेक खनिजों का पता सरकार को बताया। सरकार ने उन्हें बुलाकर सम्मानित भी किया था।’’

तब मालचंद बोला, ‘‘मेरी परदादी की कहानी भी कम मज़ेदार नहीं है। उनकी एक ख़ास बात थी कि वह सबके मन की बात जान लिया करती थीं। आदमी ही नहीं वह पशु-पक्षियों के मन की बात भी पढ़ लेती थीं। लेकिन घर के बच्चे बड़ा परेशान रहते थे। कभी कोई शरारत सोची नहीं कि वह छड़ी टेकती आ खड़ी होतीं।’’

तालचंद ने भी कहानी गढ़ी, ‘‘मेरी परदादी के पास एक जादुई डिबिया थी। उसमें जो कुछ भी डालो, वह उससे कई गुना होकर बाहर निकलती थी। दादा जी तब छोटे थे। एक बार डिबिया उनके हाथ लग गई। उन्होंने डिबिया खोलकर देखी तो उसमें धूल जमी थी। सोचा फूँक मारकर साफ कर दें। फूँक मारना था कि मुसीबत आ गई। हवा का ऐसा बवंडर उठा कि घर की सारी चीज़ें गोल-गोल नाचने लगीं। कोई दीवार से टकराया, कोई खंभे से। पूरे घर में धूल ही धूल। परदादी ने बड़ी मुश्किल से डिबिया बंद की, तब कहीं जाकर बवंडर थमा।’’


बातें चल ही रही थीं कि लालचंद चहककर बोला, ‘‘अरे देखो, पूरब से उजाला फूटने लगा है। रात बीत चली है। अब हम लोगों को आगे चलने की तैयारी करनी चाहिए।’’

सब अपनी-अपनी गाड़ियाँ सँवारने लगे।

मालचंद बोला, ‘‘आज तो बड़ा मज़ा आया। रात कैसे बीत गई पता ही नहीं चला।’’

‘‘पता कैसे चलता?’’ लालचंद हँसकर बोला, ‘‘सबकी गप्पें थी हीं इतनी मज़ेदार।’’

लालचंद की बात समझकर सब हँस पड़े और ख़ुशी-ख़ुशी आगे की यात्र पर बढ़ चले।



Thursday, 10 September 2026

दोरजी और चट्टान

 


दोरजी एक पहाड़ी पर रहा करता था। वह अकेला था। बचपन में हुई एक दुर्घटना में उसने एक पैर गँवा दिया था। इसलिए कहीं आने-जाने में उसे बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ता था। वह अपने खेतों में साग-सब्जि़याँ उगाकर गुज़ारा करता था। उसकी झोपड़ी के ठीक सामने एक बड़ी-सी चट्टान पड़ी थी, जिसकी वजह से उसे अपने खेतों तक घूमकर जाना पड़ता था। इसमें उसका काफी समय बर्बाद होता था। वह अक्सर सोचता कि यह चट्टान न होती तो वह झोपड़ी में बैठे-बैठे अपने खेतों की निगरानी कर सकता था। पर उसे हटा पाना उसके बस की बात नहीं थी।


एक दिन दोरजी ने पानी भरे बादल से कहा, ‘‘बादल, ओ बादल, क्या तुम मेरी मदद कर सकते हो?’’

‘‘कैसी मदद?’’ बादल ने पूछा।

‘‘तुम अपनी ताक़त से बड़ी-बड़ी चीज़ें बहा ले जाते हो। बिजली गिराकर बड़े-बड़े पहाड़ों को चकनाचूर कर सकते हो। क्या तुम यह अदना-सी चट्टान बहाकर घाटी में नहीं फेंक सकते?’’

बादल हँस पड़ा। उसके हँसने पर ऐसी गर्जना हुई कि पहाडि़याँ काँप उठीं। उसने कहा, ‘‘मैं तुम्हारी झोपड़ी को बहा सकता हूँ_ तुम्हारे खेतों को भी तहस-नहस कर सकता हूँ_ पर इस चट्टान को बहा पाना मेरे बस का नहीं।’’

दोरजी निराश नहीं हुआ। उसने हवा को रोका।

‘‘हवा, ओ हवा, क्या तुम मेरी मदद कर सकती हो?’’

‘‘कैसी मदद?’’ बड़े-बड़े पेड़ों को झुकाती जा रही हवा एकाएक ठहरकर बोली।

‘‘तुम अपनी ताक़त से धरती की गहराई में गड़े पेड़ों को उखाड़ देती हो, बड़ी-बड़ी चीज़ों को तिनके की तरह फूँक मारकर उड़ा सकती हो। क्या तुम इस चट्टान को उड़ाकर घाटी में नहीं फेंक सकतीं?’’

हवा ज़ोर से हँस पड़ी। उसके हँसने से ऐसा बवंडर उठा कि आस-पास के पेड़-पौधे बेचैन हो उठे। उसने कहा, ‘‘मैं अपनी ताक़त से तुम्हारी झोपड़ी को उड़ा सकती हूँ, तुम्हारे खेतों के एक-एक पौधे को बर्बाद कर सकती हूँ_ पर इस चट्टान को उड़ा पाना मेरे बस का नहीं है।’’

अबकी दोरजी ने सूरज से कहा, ‘‘सूरज, ओ सूरज, क्या तुम मेरी मदद कर सकते हो?’’

‘‘कैसी मदद?’’ सूरज ने कहा।

‘‘तुम्हारे भीतर आग भरी हुई है। इस आग से तुम सब कुछ खाक कर सकते हो। क्या तुम यह अदना-सी चट्टान अपने ताप से नहीं पिघला सकते?’’

सूरज हँसा तो आग ऐसा लपलपाई कि आस-पास उड़ रहे पक्षियों के पंख झुलस गए। उसने कहा, ‘‘प्यारे, मैं अपनी आग से तुम्हारी झोंपड़ी तो जला सकता हूँ_ खेतों को बंजर बना सकता हूँ_ पर इस चट्टान को पिघला पाना मेरे बस का नहीं।’’

दोरजी आखि़री उम्मीद लेकर धरती से बोला, ‘‘धरती, ओ धरती, क्या तुम मेरी मदद कर सकती हो?’’

‘‘कैसी मदद?’’ धरती ने अलसाकर पूछा।

‘‘तुम्हें जब ग़ुस्सा आता है तो बड़े-बड़े महलों को अपने भीतर समा लेती हो_ ऊँची-ऊँची मीनारें धूल में लोट जाती हैं_ क्या तुम इस अदना-सी चट्टान को अपने भीतर नहीं समा सकतीं?’’

धरती शांत रही। कुछ सोचने के बाद उसने कहा, ‘‘देखो, मैं अपने क्रोध से तुम्हारी झोपड़ी तो ग़र्क कर सकती हूँ_ खेतों को निगलकर तालाब बना सकती हूँ_ पर इस चट्टान को हटा पाना मेरे बस का नहीं।’’

हर कहीं से नाउम्मीद हो जाने के बाद भी दोरजी निराश नहीं हुआ। बल्कि उसे अंदर ही अंदर ग़ुस्सा आ रहा था। वह थोड़ी देर तक बैठा सोचता रहा। उसके नथुने फड़कते रहे और माथे पर लकीरें उभरती रहीं। फिर एकाएक वह उठ खड़ा हुआ। उसने अपनी बैसाखी एक ओर फेंकी और चट्टान को पूरी ताक़त लगाकर धकेलने लगा। उसका चेहरा लाल हो गया। बाहों की मछलियाँ फूल उठीं, पिंडलियों की नसें पुराने पेड़ के जड़ों-सी उभर आईं।

सूरज अपनी पूरी आग के साथ दहक रहा था, हवा थपेड़े मारकर बह रही थी, दूर कहीं बादल का टुकड़ा मंडरा रहा था। पर दोरजी इन सबसे बेखबर धरती पर पैर जमाए चट्टान को धकेल रहा था।

दोरजी का साहस देखकर सूरज डर गया। उसने दोरजी की मदद के लिए अपना ताप बढ़ा दिया। उसके ताप से हवाएँ गर्म होकर थपेड़े मारने लगीं। हवाएँ चलीं तो बादल भी खिंचे चले आए। बादलों ने झमाझम बारिश शुरू कर दी। सबको देखकर धरती ने भी मदद करने की ठानी। वह थोड़ा-सा कसमसाई। नीचे की ज़मीन धसकते ही चट्टान डगमगा उठी।


अचानक चट्टान अपनी जगह से खिसकी। दोरजी ने और ताक़त लगाई। इस बार चट्टान और ज़्यादा खिसकी और असंतुलित होकर घाटी में लुढ़क चली। उसके टुकड़े टूट-टूटकर बिखरने लगे। नीचे तक पहुँचते-पहुँचते वह विशाल चट्टान रेत में तब्दील हो गई।



Wednesday, 9 September 2026

कुनकुन के साथ कौन खेलेगा?


कुनकुन गिलहरी बोर हो रही थी। वह खेलना चाहती थी।

रास्ते में बुल्लू मेंढक मिला। वह उछल-उछलकर हड़बड़ी में भाग रहा था। कुनकुन ने उसे आवाज दी--‘‘बुल्लू, चलो खेलते हैं।’’

‘‘अरे नहीं,’’ बुल्लू परेशान-सा बोला, ‘‘अभी मुझे अपने छिपने की अच्छी-सी जगह तलाश करनी है। बहुत काम है। ठंड बढ़ रही है। मुझे पूरी सर्दियाँ सोकर बिताना है। मैं तुम्हारे साथ नहीं आ सकता।’’



बुल्लू उछलता-कूदता चला गया। कुनकुन आगे बढ़ चली। आगे हाथियों का एक झुंड दिखा। झुंड में उसका दोस्त बाकू भी था। वह बाकू की सूँड पर चढ़ती हुई बोली, ‘‘चलो, खेलते हैं।’’

बाकू उदास होकर बोला, ‘‘हमारा झुंड दूसरे जंगल जा रहा है। हमें दो दिन लगातार बिना रुके चलना पड़ेगा। इसलिए मैं अभी सोने जा रहा हूँ, ताकि चलने के लिए ऊर्जा इकट्ठी कर सकूँ।’’



कुनकुन आगे बढ़ी। आगे उसे गिट्टू और नट्टू जिराफ दिखे।

दोनों बोले, ‘‘अभी तो हम सोने जा रहे हैं। पर तुम आधा घंटा रुको। आधे घंटे में हमारी नींद पूरी हो जाएगी। फिर हम तुम्हारे साथ खेलने चलेंगे।’’

यह कहकर दोनों ने एक-दूसरे की पीठ पर अपनी गर्दन रखी और सो गए।

‘‘मैं इनके जागने का इंतजार नहीं कर सकती।’’ कुनकुन ने कहा और आगे बढ़ चली।

चलते-चलते वह झील के किनारे पहुँची। पिद्दू ऊदबिलाव अपने परिवार के साथ झील की ओर जा रहा था। कुनकुन ने आवाज दी। पिद्दू ने उसे देखकर कहा, ‘‘माफ करना कुनकुन, मैं सोने जा रहा हूँ। अभी तुम्हारे साथ नहीं खेल सकता।’’

यह कहकर वह पानी में पीठ के बल तैर गया। सबने एक-दूसरे का हाथ पकड़ लिया और तैरते हुए सो गए।

तभी कुनकुन की नजर मछली पर पड़ी। उसने मछली से कहा, ‘‘तोया, सब तो सोने जा रहे हैं। तुम ही मुझसे बातें कर लो। मैं बहुत बोर हो रही हूँ।’’

तोया ने पानी के बुलबुले छोड़ते हुए उबासी ली, ‘‘ओह कितनी अच्छी नींद आ रही थी पर तुमने जगा दिया।’’

‘‘पर तुम्हारी आँखें तो खुली हुई हैं!’’ कुनकुन हैरानी से बोली।

‘‘मैं ऐसे ही सोती हूँ।’’ तोया ने कहा और फिर से सो गई।



कुनकुन उदासी से आगे बढ़ चली। आगे उसे हिनहिन घोड़ा दिखाई दिया। वह सिर झुकाए खड़ा था।

‘‘हिनहिन, चलो खेलते हैं।’’ कुनकुन खुशी से चिल्लाई।

हिनहिन ने सिर हिलाया और गर्दन झटककर बोला, ‘‘ओह कुनकुन, तुमने मेरी नींद तोड़ दी। लंबी दौड़ लगाकर आया था। थक गया था, इसलिए सो रहा था।’’

‘‘पर तुम तो खड़े थे।’’ कुनकुन हैरान होकर बोली।

‘‘मैं खड़े-खड़े सो सकता हूँ।’’ हिनहिन ने कहा और जम्हाई लेने लगा।



कुनकुन मुँह लटकाकर आगे बढ़ चली। आगे उसे लेजी स्लाथ दिखाई पड़ा। वह पेड़ की डाल पर चारों पैरों से लटका हुआ था।

‘‘इससे तो कुछ कहना ही बेकार है। यह तो दिन भर सोया रहता है।’’ कुनकुन ने कहा और आगे बढ़ चली।

देर से घूमते-घूमते कुनकुन भी थक गई थी। उसने अँगड़ाई ली और हाथ-पैर फैलाकर डाली से चिपक गई। आँखें बंद करते हुए उसने कहा, ‘‘अब तो मुझे भी नींद सताने लगी है। मैं भी सो जाती हूँ। हो सकता है सपनों में खूब सारे दोस्त मिलें। उनके साथ जमकर खेलूँगी।’’

और कुनकुन खर्राटे भरने लगी।