कुनकुन गिलहरी बोर हो रही थी। वह खेलना
चाहती थी।
रास्ते में बुल्लू मेंढक मिला। वह
उछल-उछलकर हड़बड़ी में भाग रहा था। कुनकुन ने उसे आवाज दी--‘‘बुल्लू, चलो खेलते हैं।’’
‘‘अरे नहीं,’’ बुल्लू परेशान-सा बोला, ‘‘अभी मुझे अपने छिपने की अच्छी-सी जगह तलाश करनी है। बहुत काम है। ठंड बढ़ रही है। मुझे पूरी सर्दियाँ सोकर बिताना है। मैं तुम्हारे साथ नहीं आ सकता।’’
बुल्लू उछलता-कूदता चला गया। कुनकुन आगे
बढ़ चली। आगे हाथियों का एक झुंड दिखा। झुंड में उसका दोस्त बाकू भी था। वह बाकू की
सूँड पर चढ़ती हुई बोली, ‘‘चलो, खेलते हैं।’’
बाकू उदास होकर बोला, ‘‘हमारा झुंड दूसरे जंगल जा रहा है। हमें दो दिन लगातार बिना रुके चलना पड़ेगा। इसलिए मैं अभी सोने जा रहा हूँ, ताकि चलने के लिए ऊर्जा इकट्ठी कर सकूँ।’’
कुनकुन आगे बढ़ी। आगे उसे गिट्टू और नट्टू
जिराफ दिखे।
दोनों बोले, ‘‘अभी तो हम सोने जा रहे हैं। पर तुम आधा घंटा रुको।
आधे घंटे में हमारी नींद पूरी हो जाएगी। फिर हम तुम्हारे साथ खेलने चलेंगे।’’
यह कहकर दोनों ने एक-दूसरे की पीठ पर अपनी
गर्दन रखी और सो गए।
‘‘मैं इनके जागने का इंतजार
नहीं कर सकती।’’ कुनकुन ने कहा और आगे बढ़ चली।
चलते-चलते वह झील के किनारे पहुँची। पिद्दू ऊदबिलाव अपने परिवार के साथ झील की ओर जा रहा था। कुनकुन ने आवाज दी। पिद्दू ने उसे देखकर कहा, ‘‘माफ करना कुनकुन, मैं सोने जा रहा हूँ। अभी तुम्हारे साथ नहीं खेल सकता।’’
यह कहकर वह पानी में पीठ के बल तैर गया।
सबने एक-दूसरे का हाथ पकड़ लिया और तैरते हुए सो गए।
तभी कुनकुन की नजर मछली पर पड़ी। उसने मछली से कहा, ‘‘तोया, सब तो सोने जा रहे हैं। तुम ही मुझसे बातें कर लो। मैं बहुत बोर हो रही हूँ।’’
तोया ने पानी के बुलबुले छोड़ते हुए उबासी
ली, ‘‘ओह कितनी अच्छी नींद आ
रही थी पर तुमने जगा दिया।’’
‘‘पर तुम्हारी आँखें तो
खुली हुई हैं!’’ कुनकुन हैरानी से बोली।
‘‘मैं ऐसे ही सोती हूँ।’’
तोया ने कहा और फिर से सो गई।
कुनकुन उदासी से आगे बढ़ चली। आगे उसे
हिनहिन घोड़ा दिखाई दिया। वह सिर झुकाए खड़ा था।
‘‘हिनहिन, चलो खेलते हैं।’’ कुनकुन खुशी से चिल्लाई।
हिनहिन ने सिर हिलाया और गर्दन झटककर बोला, ‘‘ओह कुनकुन, तुमने मेरी नींद तोड़ दी। लंबी दौड़ लगाकर आया था। थक गया था, इसलिए सो रहा था।’’
‘‘पर तुम तो खड़े थे।’’
कुनकुन हैरान होकर बोली।
‘‘मैं खड़े-खड़े सो सकता हूँ।’’ हिनहिन ने कहा और जम्हाई लेने लगा।
कुनकुन मुँह लटकाकर आगे बढ़ चली। आगे उसे
लेजी स्लाथ दिखाई पड़ा। वह पेड़ की डाल पर चारों पैरों से लटका हुआ था।
‘‘इससे तो कुछ कहना ही
बेकार है। यह तो दिन भर सोया रहता है।’’ कुनकुन ने कहा और
आगे बढ़ चली।
देर से घूमते-घूमते कुनकुन भी थक गई थी।
उसने अँगड़ाई ली और हाथ-पैर फैलाकर डाली से चिपक गई। आँखें बंद करते हुए उसने कहा, ‘‘अब तो मुझे भी नींद
सताने लगी है। मैं भी सो जाती हूँ। हो सकता है सपनों में खूब सारे दोस्त मिलें।
उनके साथ जमकर खेलूँगी।’’
और कुनकुन खर्राटे भरने लगी।