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Monday, 28 September 2026

किच्चू जादूगर है

 

 

‘‘सुनो, सब सुनो, पता है, किच्चू को जादू आता है...’’ पापा ने कहा। वह मंद-मंद मुस्करा रहे थे।
मम्मी रसोई में थीं। निकलकर आईं और बोलीं
, ‘‘अच्छा...! मैं तो समझती थी किच्चू को सिर्फ गुस्सा करना आता है।’’
‘‘हाँ, मैं भी यही सोचती थी किच्चू को बस जिद करना आता है।’’ दादी ने भी कहा।
‘‘अरे, कहाँ, किच्चू को सिर्फ रूठना आता है।’’ चाचू हँसते हुए बोले।
‘‘नहीं-नहीं, किच्चू को तो बस रोना आता है। ऊँ...ऊँ...ऊँ’’ चिक्की ने चिढ़ाते हुए कहा।
‘‘मेरी बात का यकीन करो। किच्चू अच्छा जादूगर है।’’ पापा ने जोर देकर कहा।
‘‘लेकिन कैसे?’’ सबने हैरानी से पूछा।
पापा की बात पर किच्चू खुद हैरान था। उसे भी समझ में नहीं आ रहा था। उसने भला कौन-सा जादू कर दिखाया
?
पापा बोले, ‘‘चिक्की, तुमने सुबह किच्चू को एक पेंसिल दी थी। सुनहरे रंगवाली। याद है न? किच्चू ने उसे दो पेंसिलों में बदल दिया।’’
पापा ने दोनों हाथ आगे किए। उनके पास सचमुच दो सुनहरी पेंसिलें थीं।
सब हैरत में पड़ गए।

‘‘पर किच्चू ने ये जादू कैसे किया?’’ दादा जी ने हैरान होकर पूछा।
‘‘ये तो किच्चू ही बता पाएगा।’’ पापा हँसते हुए बोले।
अब किच्चू को सारा मामला समझ में आया। थोड़ी देर पहले वह होमवर्क कर रहा था। बार-बार गलती हो रही थी। उसे गुस्सा आ गया। उसने गुस्से में पेंसिल के दो टुकड़े कर दिए। पापा यह देख रहे थे। उन्होंने दोनों टुकड़े शार्प कर दिए। दोनों टुकड़े छोटी-छोटी पेंसिलें बन गईं। पर यह बात सिर्फ किच्चू और पापा ही जान रहे थे।
तभी दादा जी बोले
, ‘‘मुझे एक और चश्मे की जरूरत है। मैं अपना चश्मा इधर-उधर रखकर भूल जाता हूँ। मेरे पास दो चश्मे हो जाएँगे तो बढ़िया रहेगा। मैं किच्चू से एक चश्मे से दो करवा लेता हूँ।’’
‘‘अरे, नहीं...मुझे जादू नहीं आता।’’ किच्चू शर्म से लाल हो गया और वहाँ से भाग गया।
 

Wednesday, 9 September 2026

कुनकुन के साथ कौन खेलेगा?


कुनकुन गिलहरी बोर हो रही थी। वह खेलना चाहती थी।

रास्ते में बुल्लू मेंढक मिला। वह उछल-उछलकर हड़बड़ी में भाग रहा था। कुनकुन ने उसे आवाज दी--‘‘बुल्लू, चलो खेलते हैं।’’

‘‘अरे नहीं,’’ बुल्लू परेशान-सा बोला, ‘‘अभी मुझे अपने छिपने की अच्छी-सी जगह तलाश करनी है। बहुत काम है। ठंड बढ़ रही है। मुझे पूरी सर्दियाँ सोकर बिताना है। मैं तुम्हारे साथ नहीं आ सकता।’’



बुल्लू उछलता-कूदता चला गया। कुनकुन आगे बढ़ चली। आगे हाथियों का एक झुंड दिखा। झुंड में उसका दोस्त बाकू भी था। वह बाकू की सूँड पर चढ़ती हुई बोली, ‘‘चलो, खेलते हैं।’’

बाकू उदास होकर बोला, ‘‘हमारा झुंड दूसरे जंगल जा रहा है। हमें दो दिन लगातार बिना रुके चलना पड़ेगा। इसलिए मैं अभी सोने जा रहा हूँ, ताकि चलने के लिए ऊर्जा इकट्ठी कर सकूँ।’’



कुनकुन आगे बढ़ी। आगे उसे गिट्टू और नट्टू जिराफ दिखे।

दोनों बोले, ‘‘अभी तो हम सोने जा रहे हैं। पर तुम आधा घंटा रुको। आधे घंटे में हमारी नींद पूरी हो जाएगी। फिर हम तुम्हारे साथ खेलने चलेंगे।’’

यह कहकर दोनों ने एक-दूसरे की पीठ पर अपनी गर्दन रखी और सो गए।

‘‘मैं इनके जागने का इंतजार नहीं कर सकती।’’ कुनकुन ने कहा और आगे बढ़ चली।

चलते-चलते वह झील के किनारे पहुँची। पिद्दू ऊदबिलाव अपने परिवार के साथ झील की ओर जा रहा था। कुनकुन ने आवाज दी। पिद्दू ने उसे देखकर कहा, ‘‘माफ करना कुनकुन, मैं सोने जा रहा हूँ। अभी तुम्हारे साथ नहीं खेल सकता।’’

यह कहकर वह पानी में पीठ के बल तैर गया। सबने एक-दूसरे का हाथ पकड़ लिया और तैरते हुए सो गए।

तभी कुनकुन की नजर मछली पर पड़ी। उसने मछली से कहा, ‘‘तोया, सब तो सोने जा रहे हैं। तुम ही मुझसे बातें कर लो। मैं बहुत बोर हो रही हूँ।’’

तोया ने पानी के बुलबुले छोड़ते हुए उबासी ली, ‘‘ओह कितनी अच्छी नींद आ रही थी पर तुमने जगा दिया।’’

‘‘पर तुम्हारी आँखें तो खुली हुई हैं!’’ कुनकुन हैरानी से बोली।

‘‘मैं ऐसे ही सोती हूँ।’’ तोया ने कहा और फिर से सो गई।



कुनकुन उदासी से आगे बढ़ चली। आगे उसे हिनहिन घोड़ा दिखाई दिया। वह सिर झुकाए खड़ा था।

‘‘हिनहिन, चलो खेलते हैं।’’ कुनकुन खुशी से चिल्लाई।

हिनहिन ने सिर हिलाया और गर्दन झटककर बोला, ‘‘ओह कुनकुन, तुमने मेरी नींद तोड़ दी। लंबी दौड़ लगाकर आया था। थक गया था, इसलिए सो रहा था।’’

‘‘पर तुम तो खड़े थे।’’ कुनकुन हैरान होकर बोली।

‘‘मैं खड़े-खड़े सो सकता हूँ।’’ हिनहिन ने कहा और जम्हाई लेने लगा।



कुनकुन मुँह लटकाकर आगे बढ़ चली। आगे उसे लेजी स्लाथ दिखाई पड़ा। वह पेड़ की डाल पर चारों पैरों से लटका हुआ था।

‘‘इससे तो कुछ कहना ही बेकार है। यह तो दिन भर सोया रहता है।’’ कुनकुन ने कहा और आगे बढ़ चली।

देर से घूमते-घूमते कुनकुन भी थक गई थी। उसने अँगड़ाई ली और हाथ-पैर फैलाकर डाली से चिपक गई। आँखें बंद करते हुए उसने कहा, ‘‘अब तो मुझे भी नींद सताने लगी है। मैं भी सो जाती हूँ। हो सकता है सपनों में खूब सारे दोस्त मिलें। उनके साथ जमकर खेलूँगी।’’

और कुनकुन खर्राटे भरने लगी।




Thursday, 27 August 2026

दिल्लू का दलिया

 


दादी को दम-आलू अच्छा लगता है।

पापा को शाही पनीर बहुत पसंद है।

मम्मा के लिए राजमा-चावल के आगे सब बेकार।

पर दिल्लू को क्या पसंद है...?

कुछ नहीं।

दाल में मजा नहीं आता। गोभी अजीब लगती है। बैगन बेकार है। लौकी-कद्दू का तो कोई नाम भी न ले। पालक, परवल, भिंडी कुछ भी अच्छा नहीं लगता।



आज मम्मा को बुखार आ रहा है। सुबह से बिस्तर पर पड़ी हुई हैं। कामवाली बुआ गाँव गई हैं। उनकी बेटी की शादी है। पापा ड्यूटी गए हैं। घर पर अकेली दादी हैं।

तो फिर खाना कौन बनाएगा?

दिल्लू बेफिक्र है। दादी का व्रत है। इसलिए वह सिर्फ फल खाएँगी। फ्रिज में ढेर सारे फल पहले से रखे हैं। अपने लिए वह पिज्जा आर्डर कर लेगा।

लेकिन मम्मा...? वह क्या खाएँगी? डॉक्टर ने कहा है सिर्फ हल्का-फुल्का खाना दे सकते हैं--जैसे दलिया।



‘हाँ, यही ठीक रहेगा। मम्मा के लिए दलिया बना दूँगा। अपने लिए डबल चीज पिज्जा आर्डर कर देता हूँ।’ दिल्लू ने सोचा।

लेकिन दलिया बनाना तो उसे आता नहीं।

‘कोई बात नहीं दादी से पूछ लूँगा।’ सोचता हुआ दिल्लू किचन में जा पहुँचा।

‘‘सबसे पहले क्या करना होगा..?’’ उसने दादी से पूछा।

दादी मुश्किल से चलती हुई आईं। दिल्लू उनके बैठने के लिए कुर्सी ले आया।

‘‘सबसे पहले एक साफ पैन लेना होगा।’’ दादी बैठती हुई बोलीं।

‘‘फिर चूल्हा जलाना होगा...उफ, दादी ये सब तो मालूम है। उसके आगे बताइए।’’ दिल्लू चिढ़कर बोला।

‘‘तो फिर एक कटोरी दलिया लो और पैन में हल्की आँच पर भून लो।’’ उसके खीझने पर दादी हँसने लगीं।

दिल्लू दलिया भूनने लगा। बीच-बीच में पूछता--‘अब बस करूँ?’

दादी कहतीं--‘थोड़ा और, जब खुशबू आने लगे।’

‘‘अब आगे क्या करना है?’’ दलिया भूनने के बाद दिल्लू ने पूछा।

‘‘अब देसी घी की छौंक लगानी है।’’

‘‘लेकिन घी कहाँ रखा है?’’ दिल्लू ने पूछा।


‘‘ये तो मुझे भी नहीं पता,’’ दादी बोलीं, ‘‘मम्मा से क्यों नहीं पूछ लेते?’’

‘‘श..श..श..उन्हें सरप्राइज देना है।’’ दिल्लू ने होठों पर अँगुली रखकर कहा।

कई मर्तबानों के ढक्कन खोलने के बाद घी मिला। लौंग-इलायची ढूँढना इससे भी मुश्किल काम था। पर उसने ढूँढ निकाला। अब जरूरत थी दूध और शकर की। यह ढूँढना थोड़ा आसान था। दिल्लू दलिया बनाने में कसर नहीं छोड़ना चाहता था। ताकि मम्मा को भी पता लगे वह कितना अच्छा कुक है।

अखिरकार दलिया बनकर तैयार हो गया। लेकिन इतने से काम में दिल्लू के पसीने छूट गए। हाथ जलते-जलते बचा और कपड़े भी गंदे हुए। पर वह खुश था।

‘‘थोड़ा ठंडा हो जाने दो, फिर परोस देना।’’ दादी उसकी पीठ थपथपाती हुई कमरे में चली गईं।

मम्मा अभी सो रही थीं। दिल्लू ने सोचा क्यों न दलिया चखकर देखा जाए। पहली बार खुद से कोई चीज बनाई है। पता नहीं कैसा स्वाद हो। मम्मा को अच्छी लगे न लगे।



उसने कटोरे में दलिया निकाला। डरते-डरते एक चम्मच मुँह में रखा। स्वाद पाते ही उसका चेहरा खिल उठा। दलिया तो बहुत अच्छा बना था।

‘वाह क्या स्वाद है!’

एक चम्मच...दो चम्मच...तीन चम्मच...वह खाता ही रहा।



‘मम्मा के लिए दोबारा बना लूँगा।’ उसने सोचा।

दादी बाथरूम से लौट रही थीं। दिल्लू को देखकर बोलीं, ‘‘तुम तो कहते थे तुम्हें दलिया पसंद नहीं है।’’

‘‘पर आज से अच्छा लगने लगा है।’’ दिल्लू हँसकर बोला।

‘‘लेकिन तुमने पिज्जा ऑर्डर किया था। उसका क्या होगा?’’

‘‘वह ऑर्डर तो मैंने कैंसिल कर दिया।’’

दिल्लू ने कहा और पैन में बचा दलिया कटोरे में उड़ेल लिया।