मम्मी रसोई में थीं। निकलकर आईं और बोलीं, ‘‘अच्छा...! मैं तो समझती थी किच्चू को सिर्फ गुस्सा करना आता है।’’
‘‘हाँ, मैं भी यही सोचती थी किच्चू को बस जिद करना आता है।’’ दादी ने भी कहा।
‘‘अरे, कहाँ, किच्चू को सिर्फ रूठना आता है।’’ चाचू हँसते हुए बोले।
‘‘नहीं-नहीं, किच्चू को तो बस रोना आता है। ऊँ...ऊँ...ऊँ’’ चिक्की ने चिढ़ाते हुए कहा।
‘‘मेरी बात का यकीन करो। किच्चू अच्छा जादूगर है।’’ पापा ने जोर देकर कहा।
‘‘लेकिन कैसे?’’ सबने हैरानी से पूछा।
पापा की बात पर किच्चू खुद हैरान था। उसे भी समझ में नहीं आ रहा था। उसने भला कौन-सा जादू कर दिखाया?
पापा बोले, ‘‘चिक्की, तुमने सुबह किच्चू को एक पेंसिल दी थी। सुनहरे रंगवाली। याद है न? किच्चू ने उसे दो पेंसिलों में बदल दिया।’’
पापा ने दोनों हाथ आगे किए। उनके पास सचमुच दो सुनहरी पेंसिलें थीं।
सब हैरत में पड़ गए।
‘‘पर किच्चू ने ये जादू कैसे किया?’’ दादा जी ने हैरान होकर पूछा।
‘‘ये तो किच्चू ही बता पाएगा।’’ पापा हँसते हुए बोले।
अब किच्चू को सारा मामला समझ में आया। थोड़ी देर पहले वह होमवर्क कर रहा था। बार-बार गलती हो रही थी। उसे गुस्सा आ गया। उसने गुस्से में पेंसिल के दो टुकड़े कर दिए। पापा यह देख रहे थे। उन्होंने दोनों टुकड़े शार्प कर दिए। दोनों टुकड़े छोटी-छोटी पेंसिलें बन गईं। पर यह बात सिर्फ किच्चू और पापा ही जान रहे थे।
तभी दादा जी बोले, ‘‘मुझे एक और चश्मे की जरूरत है। मैं अपना चश्मा इधर-उधर रखकर भूल जाता हूँ। मेरे पास दो चश्मे हो जाएँगे तो बढ़िया रहेगा। मैं किच्चू से एक चश्मे से दो करवा लेता हूँ।’’‘‘अरे, नहीं...मुझे जादू नहीं आता।’’ किच्चू शर्म से लाल हो गया और वहाँ से भाग गया।