Sunday, 11 October 2026

कौए को काला रंग पसंद है

कौआ पेड़ की डाल पर चुपचाप बैठा था। उसके काले-चमकीले पंख धूप में चमक रहे थे। पर उसे अपने पंखों का काला रंग पसंद नहीं था। इसलिए वह उदास था।


तभी बग़ल की डाल पर एक गौरैया आकर बैठ गई। पहले तो कौए ने उधर ध्यान नहीं दिया। पर जब एकाएक उसकी नज़र गौरैया के पंखों पर पड़ी तो वह चौंक पड़ा। उसके पंखों में गुलाबी रंग लगा हुआ था। कौआ हँस पड़ा। 

‘‘अरे तुम्हारे पंखों को क्या हुआ?’’

गौरैया ने उदासी से मुँह लटका लिया।

कौआ उसके क़रीब सरक आया और हैरानी से बोला, ‘‘तुम इसे साफ क्यों नहीं कर लेतीं?’’

गौरैया उदासी से बोली, ‘‘मैंने बहुत कोशिश की। धूल में लोट-पोट मचाई। पोखर में छपछैया की। पर जाने कैसा रंग है, छूटता ही नहीं। अब तो इन पंखों के झड़ने का इंतज़ार कर रही हूँ, तभी इससे छुटकारा मिलेगा।’’

‘‘पर ये रंग लगा कैसे?’’


‘‘दरअसल---’’ गौरैया बताने लगी, ‘‘तुम्हें तो पता ही है कि मैं इंसानों के बीच रहना पसंद करती हूँ। एक दिन मैं एक घर की मुँडेर पर बैठी थी। मुझे आँगन में कुछ दाने पड़े दिखाई दिए। भूख तेज़ लगी थी। मैंने आव देखा न ताव और दानों पर झपट पड़ी। पर जैसे ही मैंने चोंच मारी कि ‘खट’ की आवाज़ हुई और चारों तरफ अँधेरा छा गया।’’

‘‘अरे---!’’ कौआ हैरानी से बोला।

‘‘हाँ, दरअसल कुछ शरारती बच्चों ने एक डलिया को लकड़ी के सहारे टिका रखा था और लकड़ी को रस्सी से बाँधकर छिप गए थे। मैं दानों के चक्कर में जैसे ही अंदर पहुँची कि उन्होंने रस्सी खींच ली और मैं डलिया के अंदर बंद हो गई। फिर वे मुझे पकड़कर बहुत देर खेलते रहे। जब मन भर गया तो मेरे पंखों पर रंग लगाकर छोड़ दिया।’’

‘‘पर उन्होंने ऐसा क्यों किया?’’ कौए ने हैरानी से पूछा।

‘‘वे कह रहे थे कि मैं जहाँ कहीं उड़ती दिखूँगी तो वे मुझे पहचान लेंगे।’’


गौरैया अपनी कहानी बताकर चली गई।

तभी दो कबूतर उड़कर उधर आ बैठे। उनमें एक के माथे पर नीला और दूसरे के लाल रंग का धब्बा लगा हुआ था। 

‘‘क्या तुम्हें भी शरारती बच्चों ने पकड़ लिया था?’’ कौए ने उत्सुकता से पूछा।

‘‘नहीं तो,’’ दोनों कबूतर एक साथ बोले।

‘‘तो फिर तुम्हारे माथे पर रंग कैसे लगा हुआ है?’’

‘‘यह तो हमारे मालिक ने लगाया है ताकि वे हमें पहचान सकें।’’ लाल धब्बेवाले कबूतर ने उदासी से बताया।

‘‘हम दोनों पक्के दोस्त हैं। पर बड़ी मुश्किल से मिल पाते हैं। हम दोनों के मालिक अलग हैं। वे हमें मिलने ही नहीं देते।’’ नीले धब्बेवाले कबूतर ने लंबी साँस लेते हुए कहा।

‘‘चलो, अब अपने दड़बे में वापस लौटने का समय हो गया है। वर्ना हमारे मालिक हमें ढूँढते हुए यहाँ भी आ पहुँचेंगे।’’


यह कहते हुए दोनों कबूतर अपने पंखों से ‘सन्-सन्-सन्’ आवाज़ें निकालते हुए वापस चले गए।

कबूतरों के जाते ही एक बगुला हाँफता हुआ उधर आ निकला। उसके पंखों पर कीचड़ और काई जमी हुई थी। 

कौए ने पुकारकर कहा, ‘‘बगुले भाई, तुम्हारे पंख कैसे गंदे हो गए?’’

बगुला उबासी लेता हुआ बोला, ‘‘मैं दिन भर काई भरे कीचड़-पानी में रहता हूँ। बिना हिले-डुले चुपचाप खड़े रहने से पंखों पर गंदगी चढ़ जाती है। इसीलिए मेरे पंख गंदे रहते हैं।’’

‘‘लेकिन पानी से धोने पर यह साफ भी तो हो सकती है।’’ कौए ने कहा।


‘‘हाँ, पर कीचड़ में घुसने पर फिर लग जाती है। इसलिए मैं इसे साफ करने की तरफ ध्यान ही नहीं देता।’’ कहकर बगुला उदासी से हँसा और वहाँ से चला गया।

कुछ ही देर में वहाँ सतभैये आकर चहचहाने लगे। कौए ने ध्यान से देखा तो एक का रंग बिल्कुल पीला हो रहा था। कौए ने सोचा शायद वह इन सबका लीडर होगा। 

लेकिन जब कौए ने पूछा तो उसने बताया, ‘‘एक बार हम लोग एक घर के आँगन में उछल-कूद मचा रहे थे। आँगन में खाने-पीने की चीजं़े सूखने को रखी थीं। हल्दी का पाउडर भी रखा था। अचानक एक बिल्ली हम पर झपट पड़ी। बिल्ली का हमला देखकर सब तो भाग लिए पर मैं हड़बड़ी में हल्दी के टोकरे में जा गिरा। वह दिन है और आज का दिन, पंखों से यह रंग उतरता ही नहीं।’’

उसकी बात पर चहचहा रहे सतभैये चुप हो गए। 


फिर उनमें से एक ने कौए के पंखों की ओर देखते हुए कहा, ‘‘लेकिन तुम्हारे पंखों का रंग सबसे अच्छा है। काले रंग पर कोई दूसरा रंग चढ़ ही नहीं सकता।’’

‘‘हाँ, मुझे अपना काला रंग पसंद है।’’

कौए ने कहा और ख़ुशी से अपने पंख फैला दिए। उसके पंखों पर सुनहरी धूप चमकने लगी।