चार व्यापारी थे। लालचंद, मालचंद, तालचंद, और बालचंद। चारों एक से बढ़कर एक बड़बोले। कोई एक गप्प छेड़ता तो दूसरा उससे दोगुनी गप्प हाँकने लगता।
एक बार चारों
व्यापारी बैलगड़ियों पर सामान लादकर व्यापार के लिए शहर चले। रास्ते में रात हो गई।
बारिश का मौसम था। आसमान में बादल छाए हुए थे। चारों ने एक पेड़ के नीचे रुककर रात
बिताने का विचार किया। उन्होंने साथ लाया भोजन किया और आग जलाकर बैठ गए।
उन दिनों चोर और ठग
भी घात लगाए घूमा करते थे। इसलिए व्यापारियों ने रात जागकर बिताने का इरादा किया।
लेकिन दिन भर थके होने के कारण वे जल्दी ही ऊँघने लगे। लालचंद, जो उन चारों में बड़ा और
अनुभवी था, सोचने लगा अगर सब सो गए तो चोरी होने का ख़तरा
रहेगा। आखिर इन सबको जगाए कैसे रखा जाए।
तभी हल्की-हल्की
बूँदें पड़ने लगीं। सब दौड़कर अपनी-अपनी गाड़ियाँ ढँकने लगे। लालचंद कुछ सोचकर कहने
लगा, ‘‘आज अगर मेरे परदादा
जीवित होते तो हमें भीगने की चिंता न करनी पड़ती।’’
बाकी व्यापारी उसकी
बात पर चौंक पड़े और बोले, ‘‘अच्छा...! वह कैसे?’’
लालचंद बोला, ‘‘उनके पास बहुत बड़ी छतरी
थी। इतनी बड़ी कि उसके नीचे हमारा पूरा गाँव भीगने से बच जाता था। न गलियों में
कीचड़ होता, न फिसलन। घनघोर बारिश में भी गाँववालों के काम
हमेशा की तरह चलते रहते थे।’’
मालचंद ने हँसकर कहा, ‘‘लेकिन तुम्हारे परदादा की छतरी से हमें कोई लाभ नहीं होनेवाला था। यहाँ चारों तरफ पेड़-पौधे और जंगल-झाड़ियाँ हैं। इसलिए छतरी खोलना मुश्किल हो जाता। कँटीली झाड़ियों में उलझकर छतरी फट जाती।’’
‘‘तो क्या तुम्हारे परदादा
के पास ऐसी कोई तरकीब थी, जिससे वे हमें बारिश से बचा सकते?’’
लालचंद ने उकसाते हुए पूछा।
‘‘हाँ, हाँ क्यों नहीं,’’ मालचंद कम बड़बोला नहीं था। उसने
बात बनाते हुए कहा, ‘‘मेरे परदादा बहुत बड़े पहलवान थे। उनकी
लंबाई 12 गज से थोड़ी ही कम रही होगी। मूँछें इतनी बड़ी-बड़ी
थीं कि उन पर दो आदमी झूला झूल लें। कुर्ता सिलने के लिए चार दज़ीर् लगते थे। पगड़ी
इतनी बड़ी कि उतारकर रख देते तो गाँव भर के बच्चे उसमें उछलते-कूदते थे। रोज सुबह
कसरत करते और चार बाल्टी ताज़ा दूध पीते थे। चलते तो धरती ‘धम्म-धम्म’
हिलती थी।’’
‘‘लेकिन बात तो बारिश की हो
रही थी।’’ लालचंद ने हँसकर कहा।
‘‘हाँ, हाँ, बता तो रहा हूँ,’’ मालचंद
बोला, ‘‘जब कभी बारिश होती तो मेरे परदादा ऐसी फूँक मारते कि
बादल तितर-बितर हो जाते। हमारे गाँव में तो कभी बारिश होती ही नहीं थी।’’
बालचंद हँस पड़ा, ‘‘तब तो तुम्हारे गाँव
में सूखा पड़ता रहा होगा। तुम्हारे परदादा गाँव में पानी गिरने ही न देते होंगे।’’
उसकी बात सुनकर सब
हँस दिए।
मालचंद बोला, ‘‘अरे नहीं, उनके पास एक लंबी छड़ी थी, जिससे वह बादलों को खींच लाते थे। एक बार ख़ूब गर्मी पड़ी। लोग पसीने से बेहाल हो गए। परदादा को आसमान में कहीं बादल का एक टुकड़ा दिख गया। बस उन्होंने उसे पकड़कर रस्सी से बाँध दिया। बेचारा हफ्ऱतों पतंग की तरह फड़फड़ाता रहा।’’
यह सुनकर तालचंद से
न रहा गया। बोला, ‘‘मेरे परदादा बारिश तो नहीं रुकवा सकते थे, पर थे ऐसे
कि उनकी चर्चा हर कहीं थी।’’
‘‘अच्छा, ऐसा क्या ख़ास था उनमें?’’ सब हैरानी से बोले।
‘‘उनके बाल इतने लंबे और
घने थे कि वे कभी बिस्तर नहीं बिछाते थे। अपने बालों का नरम गद्दा बिछाकर कहीं भी
लेट रहते थे। ओढ़ने के लिए कभी कंबल या रज़ाई की भी ज़रूरत नहीं पड़ती थी। दाढ़ी इतनी
लंबी और घनी थी कि पूरा शरीर ढक जाता था। बच्चे लुका-छिपी खेलते समय अक्सर उनकी
दाढ़ी या बालों के पीछे छिप जाते थे। पर एक बार किसी वजह से उन्हें दाढ़ी मुड़वानी
पड़ी। उनकी दाढ़ी में दो-चार किताबें, एक रेडियो, चार गिलास और एक चिड़िया का घोंसला निकला। काग़ज के टुकड़ों, पन्नियों और सूखे पत्तों की तो गिनती ही नहीं। गाँववाले कहने लगे कि
उन्हें बाल भी मुड़वाने चाहिए। पर वे इसके लिए तैयार नहीं हुए।’’
तालचंद की बात सुनकर सब हँसने लगे।
अब बारी बालचंद की
थी। वह भला पीछे कैसे रहता? उसने खाँस-खँखारकर कहना शुरू किया, ‘‘बात चली है तो
मैं कह देता हूँ। मेरे परदादा खाने-पीने के शौकीन थे। जब तक जागते रहते कुछ न कुछ
खाते ही रहते। पेट इतना बड़ा था कि आठ लोग हाथ फैलाकर नापें तो भी मुश्किल हो। हाथ
इतने भारी कि किसी के कंधे पर रख दें तो उसका राम-नाम सत्य हो जाए। वजन इतना कि
चलते तो धरती पर गड्ढे हो जाते। जब वे घूमने निकलते तो पूरी सड़क जाम हो जाती।
डुग्गी पिटवाकर लोगों के आने-जाने का रास्ता बदलवाना पड़ता। धूप से बचने के लिए
लोगों की भीड़ अक्सर उनकी छाया में घूमा करती थी। उन्हें नहलाना...बाप रे बाप! पूरी
मुसीबत थी। पूरा गाँव जुटता था। दो आदमी कंधे पर खड़े होकर बाल्टियाँ उलीचते थे।
चार लोग सीढ़ियाँ लगाकर पीठ मलते थे। दुकान का सारा साबुन शरीर मलने में ही खप जाता
था।’’
‘‘तब तो उन्हें तालाब जाकर
नहाना चाहिए था। तुम लोगों की मेहनत बचती।’’ लालचंद ने कहा।
‘‘अरे नहीं, एक बार वे तालाब में नहाने जा घुसे थे। तालाब का सारा पानी उछलकर गाँव में फैल गया। रास्ते किचकिच हो गए। गाँव की औरतें चिल्लाने लगीं। तब से उन्हें गाँव के बाहर मैदान में बैठकर नहलाया जाने लगा।’’
‘‘तुम्हारी परदादी तो
परेशान रहती होंगी। उनके लिए खाना बनाना तो बहुत मुश्किल काम रहा होगा?’’ लालचंद ने पूछा।
‘‘अब परदादी की याद दिला दी
है तो उनका कमाल भी सुन लो,’’ बालचंद बताने लगा, ‘‘मेरी परदादी के कान इतने निराले थे क्या बताऊँ। मंद से मंद आवाज़ भी सुन
लिया करते थे। जब परदादा बाहर से लौटते तो कोस भर पहले से क़दमों की आवाज़ सुन लिया
करती थीं। एक बार चार चोर जंगल में बैठे चोरी की योजना बना रहे थे कि परदादी ने
उनकी फुसफुसाहट सुन ली। फौरन कोतवाल को ख़बर कर दी। चारों पकड़े गए। परदादी का ख़ूब
नाम हुआ। उन्हें इनाम भी मिला।’’
‘‘ये तो कुछ भी नहीं,’’
लालचंद ने बात काटकर कहा, ‘‘मेरी परदादी की
आँखें इतनी तेज़ थी कि दीवार के पार भी देख लेती थीं। वह जमीन देखकर ही बता देतीं
कहाँ पानी आसानी से मिल सकता है? कुआँ कहाँ खुदवाना चाहिए?
उन्होंने ज़मीन में दबे अनेक खनिजों का पता सरकार को बताया। सरकार ने
उन्हें बुलाकर सम्मानित भी किया था।’’
तब मालचंद बोला, ‘‘मेरी परदादी की कहानी
भी कम मज़ेदार नहीं है। उनकी एक ख़ास बात थी कि वह सबके मन की बात जान लिया करती
थीं। आदमी ही नहीं वह पशु-पक्षियों के मन की बात भी पढ़ लेती थीं। लेकिन घर के बच्चे
बड़ा परेशान रहते थे। कभी कोई शरारत सोची नहीं कि वह छड़ी टेकती आ खड़ी होतीं।’’
तालचंद ने भी कहानी गढ़ी, ‘‘मेरी परदादी के पास एक जादुई डिबिया थी। उसमें जो कुछ भी डालो, वह उससे कई गुना होकर बाहर निकलती थी। दादा जी तब छोटे थे। एक बार डिबिया उनके हाथ लग गई। उन्होंने डिबिया खोलकर देखी तो उसमें धूल जमी थी। सोचा फूँक मारकर साफ कर दें। फूँक मारना था कि मुसीबत आ गई। हवा का ऐसा बवंडर उठा कि घर की सारी चीज़ें गोल-गोल नाचने लगीं। कोई दीवार से टकराया, कोई खंभे से। पूरे घर में धूल ही धूल। परदादी ने बड़ी मुश्किल से डिबिया बंद की, तब कहीं जाकर बवंडर थमा।’’
बातें चल ही रही थीं
कि लालचंद चहककर बोला, ‘‘अरे देखो, पूरब से उजाला फूटने लगा है। रात बीत चली
है। अब हम लोगों को आगे चलने की तैयारी करनी चाहिए।’’
सब अपनी-अपनी
गाड़ियाँ सँवारने लगे।
मालचंद बोला, ‘‘आज तो बड़ा मज़ा आया। रात
कैसे बीत गई पता ही नहीं चला।’’
‘‘पता कैसे चलता?’’ लालचंद हँसकर बोला, ‘‘सबकी गप्पें थी हीं इतनी
मज़ेदार।’’
लालचंद की बात समझकर सब हँस पड़े और ख़ुशी-ख़ुशी आगे की यात्र पर बढ़ चले।
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बहुत बहुत शुक्रिया