जब से चिड़िया ने
स्लॉथ को अपनी सैर के क़िस्से सुनाए थे, तब से उसे एक ही जगह लटके रहने
में बोरियत होने लगी थी। उसने भी सैर पर जाने की सोची।
निकलने का मन बनाते-बनाते उसे कई दिन लग गए। एक दिन आख़िर वह निकल पड़ा। पर निकलते ही बारिश का मौसम आ गया। बारिश बीतने तक उसने आगे बढ़ने का इरादा फ़िलहाल टाल दिया। डाल पर लटके-लटके उसके गीले बालों में हरी काई जाम गई, जिससे उसका पूरा शरीर हरा दिखने लगा। उसके घने बालों में छोटे-छोटे पतंगों ने अपना आशियाना बना लिया। डालियों पर इतनी हरी पत्तियाँ थीं कि आगे बढ़ने का इरादा बदला जा सकता था, पर स्लॉथ का इरादा मन में कहीं अटका रहा।
बारिश बीतते ही उसने आगे बढ़ना शुरू किया। रास्ते में उसकी मुलाकात एक कीड़े से हुई, जो सरसराता हुआ तेज़ी से आगे निकल गया। वह किसी काम की जल्दी में रहा होगा—ऐसा स्लॉथ का मानना था। कुछ दिन बाद आगे उसे उसी कीड़े का खाली खोल मिला। उसे याद कर स्लॉथ को अफसोस हुआ।
स्लॉथ ने अपने इस
धीमे सफर में पेड़ों पर फूल खिलते और उन्हें बीज बनते देखा। चिड़ियों के अंडों से
बच्चे निकलते और उन्हें बड़े होकर उड़ते देखा। मौसम को धीरे-धीरे सर्दी की तरफ
सरकते हुए महसूस किया।
और इस तरह स्लॉथ का
एक जगह से दूसरी जगह तक का सफर पूरा हुआ।
यह किस्सा मुझे
चिड़िया ने सुनाया था। पर स्लॉथ का कहना है कि चिड़िया अपनी बात बढ़ा-चढ़ाकर बता
रही थी। उसे एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक पहुँचने में बस कुछ ही घंटे लगते हैं!
No comments:
Post a Comment
बहुत बहुत शुक्रिया