Wednesday, 12 August 2026

अप्पू का पेड़

 अप्पू के लॉन में एक विशाल बरगद का पेड़ था, जो पूरे घर की रौनक था। उस पर कौओं का शोर, बंदरों की धमाचौकड़ी और दिन भर चिड़ियों का शोर मचा रहता था। हवा चलती, तो खिड़की से छनकर आती सूखी पत्तियों की सरसराहट कमरे में एक जादुई संगीत भर देती थी।


पर अप्पू के लिए यह शोर परेशानी का सबब था। पढ़ाई के बीच इस हलचल से परेशान होकर उसने पापा से जिद की, "पापा, यह पेड़ कटवा दीजिए। न यह शोर होगा, न ही ये पत्तियाँ मुझे परेशान करेंगी।" पापा ने काफी समझाया कि पेड़ हमारे मित्र हैं, पर अप्पू की जिद के आगे उन्हें झुकना पड़ा।

अगली दोपहर, अप्पू कमरे में पढ़ाई में डूबा था। तभी खिड़की पर खटखट की आवाज आई। उसने देखा, एक नन्ही चिड़िया अपने बच्चों के साथ उदास खड़ी थी। उसकी आँखों में नमी थी।

चिड़िया ने धीमी और काँपती आवाज में कहा, "अप्पू, हम हमेशा के लिए यह जगह छोड़कर जा रहे हैं। सुना है, हमारा इकलौता घरयह पेड़ कटने वाला है। बच्चे छोटे हैं, लंबी उड़ान नहीं भर सकते। रास्ते में चील-कौओं का खतरा है... पर करें भी क्या?" 

चिड़िया के जाते ही एक गिलहरी खिड़की की मुंडेर पर आई। वह फुदकने के बजाय भारी कदमों से चल रही थी। उसने दुखी होकर कहा, "अप्पू, तुम तो यहाँ रह लोगे, पर मेरा क्या? यह पेड़ ही मेरी दुनिया था।" और वह भी अपनी पूँछ लटकाकर ओझल हो गई।


तभी अप्पू ने देखा, चींटियों की एक पूरी कतार अपने अंडों को उठाए बदहवास सी भाग रही थी। उन्होंने बताया, "पेड़ की जड़ें ही हमारा घर थीं, पर अब यहाँ क्या बचा?"

तभी खिड़की से एक ठंडी हवा का झोंका अंदर आया। अप्पू ने राहत की सांस ली, "वाह! यह ठंडी हवा कितनी अच्छी है।"

हवा ठिठकी और बोली, "अप्पू, अब मैं यहाँ नहीं आऊँगी। मेरा पेड़ से रिश्ता था, इसी से मिलने मैं यहाँ रुकती थी। अब यहाँ मेरी बहन लू आया करेगी।" कहते ही अप्पू को गर्मी का एहसास होने लगा। तभी आसमान से एक बादल नीचे आया और बोला, "पेड़ ही तो मुझे बुलाता था, मैं अपनी फुहारों से उसे नहलाता था। अब यहाँ आकर मैं क्या करूँगा?" बादल भी विदा लेकर आसमान में ओझल हो गया।


अप्पू का मन काँप उठा। उसे एहसास हुआ कि उसने एक पेड़ नहीं, बल्कि एक पूरी जीवित दुनिया उजाड़ने का फैसला किया था। वह चिल्लाया, "नहीं! पेड़ नहीं कटेगा! पापा, रुक जाइए!"

"अप्पू! क्या हुआ बेटा?" मम्मी की आवाज सुनकर अप्पू की आँखें खुलीं। वह मेज पर ही किताब पर सिर रखकर सो गया था। माथे पर पसीने की बूंदें थीं और दिल तेजी से धड़क रहा था।

अप्पू ने लपककर झटके से खिड़की खोली। बाहर धूप में पेड़ धूप में मुस्कुरा रहा था। हवा के झोंकों के साथ उसकी पत्तियाँ एक प्यारा सा गीत गा रही थीं। अप्पू दौड़कर बाहर गया और पेड़ से कसकर लिपट गया।

 


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बहुत बहुत शुक्रिया