दोरजी एक पहाड़ी पर रहा करता था। वह अकेला था। बचपन में हुई एक दुर्घटना में उसने एक पैर गँवा दिया था। इसलिए कहीं आने-जाने में उसे बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ता था। वह अपने खेतों में साग-सब्जि़याँ उगाकर गुज़ारा करता था। उसकी झोपड़ी के ठीक सामने एक बड़ी-सी चट्टान पड़ी थी, जिसकी वजह से उसे अपने खेतों तक घूमकर जाना पड़ता था। इसमें उसका काफी समय बर्बाद होता था। वह अक्सर सोचता कि यह चट्टान न होती तो वह झोपड़ी में बैठे-बैठे अपने खेतों की निगरानी कर सकता था। पर उसे हटा पाना उसके बस की बात नहीं थी।
एक दिन दोरजी ने पानी भरे
बादल से कहा, ‘‘बादल, ओ बादल, क्या
तुम मेरी मदद कर सकते हो?’’
‘‘कैसी मदद?’’ बादल ने पूछा।
‘‘तुम अपनी ताक़त से
बड़ी-बड़ी चीज़ें बहा ले जाते हो। बिजली गिराकर बड़े-बड़े पहाड़ों को चकनाचूर कर
सकते हो। क्या तुम यह अदना-सी चट्टान बहाकर घाटी में नहीं फेंक सकते?’’
बादल हँस पड़ा। उसके हँसने पर
ऐसी गर्जना हुई कि पहाडि़याँ काँप उठीं। उसने कहा, ‘‘मैं तुम्हारी झोपड़ी को बहा सकता हूँ_ तुम्हारे खेतों को भी तहस-नहस कर सकता हूँ_ पर इस चट्टान को बहा पाना मेरे बस का नहीं।’’
दोरजी निराश नहीं हुआ। उसने
हवा को रोका।
‘‘हवा, ओ हवा, क्या
तुम मेरी मदद कर सकती हो?’’
‘‘कैसी मदद?’’ बड़े-बड़े पेड़ों को झुकाती जा रही हवा एकाएक ठहरकर बोली।
‘‘तुम अपनी ताक़त से धरती की गहराई में गड़े पेड़ों को उखाड़ देती हो, बड़ी-बड़ी चीज़ों को तिनके की तरह फूँक मारकर उड़ा सकती हो। क्या तुम इस चट्टान को उड़ाकर घाटी में नहीं फेंक सकतीं?’’
हवा ज़ोर से हँस पड़ी। उसके
हँसने से ऐसा बवंडर उठा कि आस-पास के पेड़-पौधे बेचैन हो उठे। उसने कहा, ‘‘मैं अपनी ताक़त से तुम्हारी झोपड़ी को उड़ा सकती हूँ, तुम्हारे खेतों के एक-एक पौधे को बर्बाद कर सकती हूँ_ पर इस चट्टान को उड़ा पाना मेरे बस का नहीं है।’’
अबकी दोरजी ने सूरज से कहा, ‘‘सूरज, ओ
सूरज,
क्या तुम मेरी मदद कर सकते हो?’’
‘‘कैसी मदद?’’ सूरज ने कहा।
‘‘तुम्हारे भीतर आग भरी
हुई है। इस आग से तुम सब कुछ खाक कर सकते हो। क्या तुम यह अदना-सी चट्टान अपने ताप
से नहीं पिघला सकते?’’
सूरज हँसा तो आग ऐसा लपलपाई
कि आस-पास उड़ रहे पक्षियों के पंख झुलस गए। उसने कहा, ‘‘प्यारे, मैं
अपनी आग से तुम्हारी झोंपड़ी तो जला सकता हूँ_ खेतों को बंजर बना सकता हूँ_ पर इस चट्टान को पिघला पाना मेरे बस का नहीं।’’
दोरजी आखि़री उम्मीद लेकर
धरती से बोला, ‘‘धरती, ओ धरती, क्या
तुम मेरी मदद कर सकती हो?’’
‘‘कैसी मदद?’’ धरती ने अलसाकर पूछा।
‘‘तुम्हें जब ग़ुस्सा आता
है तो बड़े-बड़े महलों को अपने भीतर समा लेती हो_ ऊँची-ऊँची मीनारें धूल में लोट जाती हैं_ क्या तुम इस अदना-सी चट्टान को अपने भीतर नहीं समा सकतीं?’’
धरती शांत रही। कुछ सोचने के बाद उसने कहा, ‘‘देखो, मैं अपने क्रोध से तुम्हारी झोपड़ी तो ग़र्क कर सकती हूँ_ खेतों को निगलकर तालाब बना सकती हूँ_ पर इस चट्टान को हटा पाना मेरे बस का नहीं।’’
हर कहीं से नाउम्मीद हो जाने
के बाद भी दोरजी निराश नहीं हुआ। बल्कि उसे अंदर ही अंदर ग़ुस्सा आ रहा था। वह
थोड़ी देर तक बैठा सोचता रहा। उसके नथुने फड़कते रहे और माथे पर लकीरें उभरती
रहीं। फिर एकाएक वह उठ खड़ा हुआ। उसने अपनी बैसाखी एक ओर फेंकी और चट्टान को पूरी
ताक़त लगाकर धकेलने लगा। उसका चेहरा लाल हो गया। बाहों की मछलियाँ फूल उठीं, पिंडलियों की नसें पुराने पेड़ के जड़ों-सी उभर आईं।
सूरज अपनी पूरी आग के साथ दहक
रहा था,
हवा थपेड़े मारकर बह रही थी, दूर कहीं बादल का टुकड़ा मंडरा रहा था। पर दोरजी इन सबसे
बेखबर धरती पर पैर जमाए चट्टान को धकेल रहा था।
दोरजी का साहस देखकर सूरज डर गया। उसने दोरजी की मदद के लिए अपना ताप बढ़ा दिया। उसके ताप से हवाएँ गर्म होकर थपेड़े मारने लगीं। हवाएँ चलीं तो बादल भी खिंचे चले आए। बादलों ने झमाझम बारिश शुरू कर दी। सबको देखकर धरती ने भी मदद करने की ठानी। वह थोड़ा-सा कसमसाई। नीचे की ज़मीन धसकते ही चट्टान डगमगा उठी।
अचानक चट्टान अपनी जगह से खिसकी। दोरजी ने और ताक़त लगाई। इस बार चट्टान और ज़्यादा खिसकी और असंतुलित होकर घाटी में लुढ़क चली। उसके टुकड़े टूट-टूटकर बिखरने लगे। नीचे तक पहुँचते-पहुँचते वह विशाल चट्टान रेत में तब्दील हो गई।
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बहुत बहुत शुक्रिया