मंगलवार, 22 मार्च 2016

ऐसा रंग चढ़े


होली का दिन नज़दीक आता जा रहा था। मुहल्ले के बच्चों में काफी उत्साह था। नीरज, सलीम, मंजीत और डेविड सभी रोज़ शाम को नीरज के दादा जी के पास जा पहुँचते और होली के बारे में ढेर सारी बातें करते। दादा जी भी रस ले-लेकर उनकी बातें सुनते। नीरज और मंजीत ने पहले से ही रंग और पिचकारियाँ खरीद ली थीं और नए कपड़े सिलने को दे दिए थे। डेविड और सलीम ने भी धमाकेदार ढंग से होली मनाने की तैयारियाँ पूरी कर ली थीं।

शाम को जब चारों दादा जी के पास इकट्ठे होते तो बताते कि उन्होंने क्या-क्या तैयारियाँ कर रखी हैं। उनकी बातें सुनकर दादा जी गद्गद् हो उठते और उन्हें प्रोत्साहित करते। 
आज होलिका-दहन का दिन था। चारों सुबह से ही होलिका-दहन की सामग्री इकट्ठा करने के लिए लोगों की मंडली के साथ घूम रहे थे।
शाम होते ही चारों दादा जी के पास जा पहुँचे और होलिका-दहन पर चलने की ज़िद करने लगे। दादा जी फटाफट तैयार हो गए। कंधे पर शाल डालकर और हाथ में छड़ी लेकर वह उनके साथ चल दिए।
कुछ ही देर में सभी वहाँ जा पहुँचे। चौराहे के बीचों-बीच जलाने के लिए मोटी-मोटी लकड़ियाँ रखीं गई थीं। जब उनमें आग लगाई गई तो उसकी ऊँची-ऊँची लपटें उठने लगीं। यह देख सारे बच्चे ख़ुश होकर तालियाँ बजाने लगे।
तभी एक चिंगारी छिटककर पास ही खड़े एक लड़के के कपड़ों पर जा गिरी। देखते ही देखते कपड़ों ने आग पकड़ ली। चीख़-पुकार मच गई। किसी को समझ नहीं आ रहा था क्या करे।
तभी दादा जी ने अपना शाल उतारकर उस लड़के को चारों ओर से ढँक दिया। आग फौरन बुझ गई। लड़के के कपड़े थोड़े-बहुत जल गए थे, पर उसकी त्वचा को नुकसान नहीं पहुँचा था। फिर भी घबराहट के कारण वह रोए जा रहा था। उसके माता-पिता दादा जी को धन्यवाद देकर, उसे घर लेकर चलेे गए।
थोड़ी ही देर में वहाँ फिर से हँसी-ख़ुशी का माहौल बन गया।
लौटते समय दादा जी ने बच्चों को बताया, ‘‘बच्चो, ऐसे मौकों पर हमें सदैव सावधान रहना चाहिए। आग से काफी दूर खड़े होना चाहिए और रेशमी कपड़े तो बिल्कुल नहीं पहनने चाहिए। फिर भी अगर ऐसी दुर्घटना घट जाती है, तो हमें साहस खोकर चीख़ना-चिल्लाना नहीं चाहिए बल्कि उससे बचने का प्रयास करना चाहिए। मोटे कपड़े से ढँक देने से आग बुझ जाती है। यदि कपड़ा न मिले तो फौरन ज़मीन पर लेटकर लोटपोट लगाना चाहिए। इससे भी आग बुझ जाती है।’’
सुबह होली थी। रात में ही सभी ने रंग घोलकर रख लिया था और अपनी पिचकारियाँ भी अच्छी तरह जाँच ली थीं, ताकि समय पर धोखा न दे जाएँ। उस दिन खा-पीकर सब जल्दी ही सो गए, ताकि सुबह जल्दी उठ सकें।
सुबह तक टब में घुला रंग बर्फ-सा ठंडा हो गया था। जब शरीर पर पड़ता तो पल भर के लिए कँपकँपी बँध जाती। लेकिन उमंग और उत्साह के आगे यह नाकाफी था। चारों इधर से उधर उछलते-कूदते एक-दूसरे पर दनादन पिचकारियाँ छोड़ रहे थे।
ढोलक की थाप और झाँझ-मजीरों की झनकार में बड़े-बूढ़े भी झूम रहे थे।
जी भर होली खेलने के बाद चारों दादा जी के पास जा पहुँचे। उनके रंग-बिरंगे चेहरों से उल्लास टपक रहा था।
दादा जी उन्हें देखते ही बोले, ‘‘आओ-आओ, खेल आए होली? खूब मज़ा लूटा, क्यों डेविड?’’
‘‘जी, दादा जी! लेकिन मैं डेविड नहीं, मैं तो मंजीत हूँ।’’ यह कहकर मंजीत मुस्कराया तो उसके रंग-बिरंगे चेहरे पर सफेद दाँत बिजली जैसे चमक उठे।
‘‘और नीरज, तुम तो बिल्कुल लंगूर लग रहे हो !’’
‘‘लेकिन दादा जी, मैं तो सलीम हूँ।’’
दादा जी ठठाकर हँस पड़े, ‘‘तो तुम सबने चेहरे पर इतना रंग पोत रखा है कि मुझे पहचानने में ही भूल हो गई।’’  
पर अगले ही पल उनके चेहरे पर गंभीरता छा गई। वह बोले, ‘‘काश, ऐसा प्रेम का रंग हर भारतवासी के चेहरे पर चढ़ जाता जिसमंे उसका धर्म, उसकी जाति सब कुछ रंग जाती। उसकी पहचान सिर्फ हिंदुस्तानी के रूप में होती। सच, तब कितना अच्छा होता। मेरे बच्चो, तुम्हें देखकर यह विश्वास होता है कि ऐसा दिन ज़रूर आएगा।’’
भावावेश के कारण दादाजी ने उन सबको अपनी बाहों में भर लिया।

शुक्रवार, 8 जनवरी 2016

बुद्धू काका और मनफेर ताऊ

हमारे गाँव में बहुत से लोग थे। एक थे रहमत अली। नाम के बिल्कुल उल्टे। चेहरे पर ऐसा ताव जैसे हर वक़्त लड़ने को तैयार बैठे हों, और एक थे संतोषी काका, सपने में भी निन्यानबे के फेर में पड़े रहते थे। बहादुर कक्का ऐसे कि चूहे से भी डर जाएँ और बलवीर चाचा के लिए लाठी टेके बिना दो क़दम चलना मुहाल।
लेकिन दो लोग यथा नाम, तथा गुण थे--एक बुद्धू काका और दूसरे मनफेर ताऊ।
बुद्धू काका सचमुच के बुद्धू थे। कोई मज़ाक़ में भी कुछ कह दे तो सच मान बैठते थे। हमारे अहाते के एक कोने में बनी कोठरी में रहते थे। जब ज़मींदारी थी तो उनके पिता हमारे यहाँ चौकीदारी और सेवा-टहल किया करते थे। पिता गुज़र गए तो ज़िम्मेदारी बुद्धू काका ने संभाल ली। अब तो ज़मींदारी ख़त्म हुए ज़माना हो गया। अब्बा बताते हैं कि हमारे पास सैकड़ों बीघे ज़मीन, बाग़, तालाब और कई गाँव थे। पर समय के साथ धीरे-धीरे सब हाथ से निकल गए। लेकिन नहीं निकले तो बुद्धू काका। और निकलते भी क्यों? वे तो हमारे घर के एक सदस्य की भाँति थे। उनकी उम्र अब्बा से भी अधिक थी। अब्बा उनसे कभी कोई काम नहीं कहते थे। लेकिन बुद्धू काका ख़ुद सुबह-सुबह उठकर पूरा अहाता और दरवाज़ा बुहारते और बाज़ार से सौदा वगैरह ले आते थे। शेष समय वे बाहर बने कुँए की जगत पर सोए रहते थे। अगर किसी मसले पर वे अपनी राय दे देते तो अब्बा उसे पत्थर की लकीर की तरह मानते। अम्मा हमारी शरारतों की शिकायत रोज़ अब्बा से करतीं, पर वे कान न देते; लेकिन बुद्धू काका कभी कुछ कह देते तो हमारी शामत समझो।

बुद्धू काका अल्ला मियाँ की गाय थे। एकदम सीधे-सच्चे। बच्चे तक उन्हें बेवकू़फ बना जाते। गाँव के शरारती आकर झूठमूठ कह जाते, ‘‘काका, जल्दी जाओ, बाबू साहब बड़ी देर से तुम्हें याद कर रहे हैं।’’
बुद्धू काका कुएँ की जगत से उतरते और लाठी टेकते हुए अब्बा की बैठक में जाकर पूछते, ‘‘भैया, हमको बुलवाया क्या?’’
लोगों की शरारत समझकर अब्बा पूछते, ‘‘किसने भेजा है, आपको?’’
‘‘क..किसी ने नहीं। ऐसे ही चले आए कि शायद कोई काम हो।’’ और बुद्धू काका वापस आकर फिर से कुएँ की जगत पर लेट जाते।
एक बार किसी ने कह दिया कि बाबू साहब किसी बात पर बहुत नाराज़ हैं और तुम्हारा मुँह तक नहीं देखना चाहते। बस, बुद्धू काका भागकर भुसैले में जा छिपे और पूरा दिन नहीं निकले। शाम को ढुँढाई पड़ी तब कहीं आँखें सुजाए हुए पाए गए।
अब्बा अक्सर बरामदे में ही सो जाते थे। उन्हें देर तक पढ़ने की आदत थी। अम्मा को सोते समय रोशनी से चिढ़ होती थी। सो, अब्बा ने बरामदे में अपना अड्डा जमा लिया था। बरामदा यों तो खुला हुआ था, पर ख़स की टट्टियों पर फूलों की बेलें इस क़दर चढ़ी हुई थीं कि अहाते से अंदर का एक कोना ही दिखाई देता था। बुद्धू काका की आदत थी जब तक अब्बा कमरे की रोशनी बुझाकर लेट न जाते, वे अपनी कोठरी में बैठे जागते रहते।
एक रात अब्बा किसी काग़ज़ की तलाश करते-करते अल्मारियाँ साफ करने लग गए। अहाते से सिर्फ उनकी पीठ दिखाई दे रही थी। पता तो चल रहा था कि वे किसी काम में मशगूल हैं, पर बाहर से ठीक-ठीक दिखाई नहीं दे रहा था। बुद्धू काका का मन कर रहा था कि जाकर अब्बा मदद करें। पर रात को बिना बुलाए किसी के कमरे में जाना उन्होंने उचित न समझा। वे बेचैन होकर बैठे रहे। थोड़ी-थोड़ी देर बाद झाँकते तो हवा में लहराता कुर्ते का दामन दिख जाता। देर रात तक बरामदे से उठाने-रखने की आवाज़ें आती रहीं। कुछ समय बाद आवाज़ें तो आनी बंद हो गईं, पर लहराते कुर्ते का दामन दिखाई देता रहा जैसे अब्बा अब भी खड़े हों। रोशनी भी नहीं बुझी। बुद्धू काका पलंग पर बैठे-बैठे झपकी खाते रहे और रोशनी बुझने का इंतज़ार करते रहे। इसी इंतज़ार में सुबह हो गई।
सुबह अब्बा निकले तो बुद्धू काका ने पूछा, ‘‘भैया, रात भर सोए नहीं? काम था तो मुझे बुला लिया होता।’’
अब्बा हैरत से बोले, ‘‘नहीं तो, ख़ूब गहरी नींद सोया। और काम भी कोई ख़ास नहीं था। बस, काग़ज़ात दुरुस्त करके रख रहा था। फिर खूँटी पर कुर्ता टाँगकर सो गया। हाँ, रोशनी गुल करना ज़रूर भूल गया था।’’
बुद्धू काका बहुत खिसियाए। दरअसल, खूँटी पर टँगे कुर्ते को लहराता देखकर उन्होंने समझा कि अब्बा खड़े हैं। सारी बात जानकर अब्बा भावुक होकर बोले, ‘‘काका, तुम रात भर जागते रहे? इतनी तकलीफ सही? कम से कम आकर पूछ तो लिया होता।’’
‘‘तो क्या हुआ? वैसे भी मुझे नींद कहाँ आती है।’’ कहकर बुद्धू काका बाहर निकल गए।
ऐसे ही एक बार अब्बा उनके साथ खेतों की निगरानी के लिए निकले। रास्ते में अब्बा को एक ज़रूरी काम याद आ गया। वे बोले, ‘‘काका, तुम खेत पर पहुँचकर मेरा इंतज़ार करो, मैं ज़रा घर होकर आता हूँ।’’
अब्बा घर आकर काम में ऐसा फँसे कि खेत जाना ही भूल गए। शाम को आकर किसी ने बताया कि बुद्धू काका सुबह से ही खेत पर बैठे हुए हैं। कह रहे हैं, भैया आने को कह गए हैं।
अब्बा ने सुना तो सन्न रह गए। जिस हालत में थे वैसे ही भागे। पहुँचते ही उन्होंने बुद्धू काका को लिपटा लिया और माप़फी माँगने लगे। इस पर बुद्धू काका रो पड़े और कहने लगे ‘‘बस, यही दिन देखना रह गया था कि भैया हमसे माफी माँगें? भूल-चूक तो सबसे होती है।’’
ऐसे थे हमारे बुद्धू काका।

और एक थे हमारे मनफेर ताऊ। वे रहते तो हमारे साथ नहीं थे, पर उनका दिन हमारी कोठी में ही बीतता था। मनफेर ताऊ सचमुच के मनफिरे थे। किसी काम को करते-करते मन फिरता कि उसे छोड़कर दूसरा काम करने लगते। नुकसान की परवाह भी न करते। जा रहे होते तालाब की ओर और निकल पड़ते खेतों की ओर। बाज़ार जाते-जाते चार कोस दूर सड़क पर यह देखने पहुँच जाते कि तीन बजेवाली बस गई या नहीं?
गाँववाले भी उन्हें ख़ूब बहकाते। घास निराता देखकर कोई कह उठता, ‘‘अरे मनफेर ताऊ, इस बार नन्हू ने खीरे बोए हैं या फदीना?’’ बस, ताऊ खुरपी उठाते और चल पड़ते। राह चलते-चलते कोई यह पूछ लेता कि कल्लू की बकरी ने चार बच्चे दिए या तीन? तो आधे रास्ते से उधर पलट पड़ते।
एक बार तो बड़ी मज़ेदार बात हुई। गर्मियों के दिन थे। रात एक पहर से ज़्यादा बीत चुकी थी। अमावस का आसमान तारों से भरा हुआ था। पूरा गाँव गहरी नींद में सो रहा था। मनफेर ताऊ को नींद कम आती थी। उम्र का भी असर था। देर तक लेटे तारे गिना करते थे।
आज भी वह चारपाई पर लेटे करवटें बदल रहे थे। इधर-उधर की बातें सोचते-विचारते अचानक उन्हें नन्हे पहलवान का ख़्याल आ गया। नन्हे पहलवान अपनी नींद के लिए मशहूर थे। लोग उन्हें कुंभकरण कहते थे। जब वे साँस खींचते तो उनकी तोंद पहाड़ की तरह उठती और साँस छोड़ते तो गुब्बारे की तरह फुस्स हो जाती। खर्राटों के साथ उनकी लंबी-लंबी मूँछें उड़तीं तो देखनेवाले अपनी हँसी न रोक पाते। मनफेर ताऊ को याद आने भर की देर थी कि चल पड़े पहलवान के घर की ओर। अमावस की रात। घना अंधेरा। ताऊ को सूझता भी कम था। दिशा-भ्रम के कारण के कारण वे कल्लू कुम्हार के छप्पर में जा घुसे। छप्पर में एक के ऊपर एक मटके रखे हुए थे। ताऊ उनसे टकराए तो गाँव भर में धड़ाम-भड़ाम गूँज उठी। कुत्तों ने भौं-भौं करके आसमान सिर पर उठा लिया। अचानक आई आफत से कल्लू कुम्हार डर गया और, ‘चोर-चोरकहकर चिल्लाने लगा। गर्मियों के दिन थे। लोग चारपाइयाँ निकालकर दरवाज़े ही सोते थे। आवाज़ सुनते ही सब लाठियाँ लेकर दौड़ पड़े। यह तो कहो कि संकट को भाँपकर ताऊ चिल्ला उठे, वर्ना उनकी हड्डी पसली एक होकर रहती।
हमारी खेती-बारी की सारी ज़िम्मेदारी मनफेर ताऊ की ही थी। फसल की बुआई-कटाई से लेकर गन्ने को मिल तक पहुँचाना, चक्की ले जाकर धान दरवाना और सरसों का तेल निकलवाना, सब उनके ही ज़िम्मे था। शायद इसीलिए अब्बा बेफिक्र होकर पढ़ने-लिखने का वक़्त निकाल लेते थे। अब्बा को हकीमी की किताबें पढ़ने का बड़ा शौक़ था। हालाँकि अपनी हिकमत उन्होंने कभी किसी पर आज़माई नहीं। घर में कोई बीमार पड़ता तो पंडित राधेश्याम साइकिल पर किरमिच का पुराना-सा थैला लटकाए कोठी आते थे। खेती-किसानी के बारे में अब्बा को बहुत कम जानकारी थी। बुआई-कटाई का ठीक समय क्या होता है? पौधों में कब पानी पड़ना चाहिए और कब पानी पड़ने से नुकसान हो सकता है? इन सबके बारे में उनकी समझ अनाड़ियों जैसी थी। हालाँकि ऐसे मौकों पर वे कभी-कभी अपने किताबी ज्ञान का उपयोग करते थे। पर ताऊ के अनुभवों के आगे उनकी दलीलें न टिक पातीं।

एक बार की बात है। अक्तूबर का महीना बीत रहा था। खेत सुनहरे हो चले थे। सीवान नवेली दुल्हन के कंगनों की तरह खनक रहा था। फसल तैयार देखकर ताऊ ने कटाई करवा ली। खेतों में धान के गट्ठर बाँधकर डाल दिए गए। अब गट्ठरों को उठाकर खलिहान में रखना भर था। पर ताऊ के मन में जाने क्या आलस समाया कि अनाज के गट्ठर खलिहान तक न पहुँच पाए।
शाम को आसमान में बादल उमड़ते-घुमड़ते देख अब्बा ने ताऊ को बुलवाया और कहा, ‘‘मौसम का मिज़ाज ठीक नहीं मालूम पड़ता। धान के गट्ठर खलिहान की कोठरियों में पहुँचा देना सही रहेगा। वर्ना पानी बरस गया तो सारा अनाज चौपट हो जाएगा।’’
अब्बा की बात से सहमत होकर ताऊ चार आदमियों को इकट्ठा करके खेत की ओर चल दिए।
सूरज डूब चुका था। चारों तरफ हल्का-हल्का अंधेरा पसरने लगा था। पूरब की तरफ से बादल घुमड़ रहे थे। मंद-मंद गड़गड़ाहट के बीच रह-रहकर बिजली चमक उठती थी। ताऊ मज़दूरों को लेकर सीवान तक नहीं पहुँचे थे कि ठिठककर खड़े हो गए। फिर जाने क्या सूझा कि पलटकर वापस चल पड़े और मज़दूरों से कह दिया, ‘‘तुम लोग यहीं बीड़ी फूँको। मैं अभी आता हूँ।’’
जब वे दो घंटे बाद भी न लौटे तो मज़दूर गाँव वापस लौट आए।
उस रात ज़बर्दस्त बारिश हुई। ओले भी पड़े। खेतों में जैसे दूर-दूर तक सफेद चादर-सी बिछ गई। पेड़ों की हालत ऐसी हो गई जैसे किसी ने झिंझोड़कर सारे पत्ते गिरा दिए हों।
ताऊ की आदत से परिचित अब्बा की रात बड़ी बेचैनी से कटी। सुबह होते ही वे खेतों पर जा पहुँचे। वहाँ का दृश्य देखकर वे सन्न रह गए। धान के गट्ठर कीचड़ में लथपथ पड़े थे। सारी फसल बरबाद हो चुकी थी। अब्बा ग़ुस्से से थरथराते हुए वापस लौटे और ताऊ को बुलवा भेजा।
ताऊ को बुलाने गया आदमी थोड़ी देर बाद लौटकर आया बोला, ‘‘गाँववाले कह रहे हैं कि वे मुँह अंधेरे ही कहीं चले गए।’’
अब्बा के क्रोध पर जैसे पानी पड़ गया। चेहरे पर अपराध-बोध झलक आया। भरे गले से अटकते-अटकते बोले, ‘‘...इतनी बड़ी बात थोड़े ही हो गई थी...कि गाँव छोड़कर चले जाएँ।’’
फौरन आदमी दौड़ाए गए।
ताऊ शहर जानेवाली बस के इंतज़ार में सड़क पर बैठे पाए गए। रात भर रोने से उनकी आँखें सूजी हुई थीं। लौटकर आए तो चौखट के अंदर नहीं दाख़िल हुए। बाहर ही बैठकर रोने लगे। अब्बा ने लपककर उन्हें उठाया तो कहने लगे, ‘‘बाबू साहब, हमने बहुत बड़ा पाप किया है। अब हम यहाँ नहीं रहेंगे। लोग कहते हैं कि हमारे दिमाग़ में कमी है, तभी इधर-उधर की बातें सूझती हैं। अब हम शहर जाकर अपना इलाज कराएँगे। ठीक हुए तो लौटेंगे, नहीं तो वहीं मर-खप जाएँगे। पर दोबारा चेहरा नहीं दिखएँगे।’’
अब्बा की आँखें भीग गईं। उन्होंने ताऊ को भींच लिया और भर्राए गले से बोले, ‘‘ताऊ, बस...तुम्हें कहीं नहीं जाना है। ...तुम मेरे लिए ऐसे ही ठीक हो।’’
ताऊ फफक पड़े। वहाँ खड़े लोगों की आँखें भी भीग गईं।
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इन बातों को एक अरसा बीत गया है। अब न बुद्धू काका हैं, न मनफेर ताऊ। हम लोग भी गाँव छोड़कर शहर आ बसे हैं। गाँव की कोठी चौकीदार के हवाले वीरान पड़ी रहती है। कभी-कभी उन लोगों की याद आती है तो सोचता हूँ कि अच्छा हुआ वे लोग अपना वक़्त बिताकर चले गए। अगर आज की स्वार्थी और चालाक दुनिया में होते तो कैसे जी पाते?

मंगलवार, 13 जनवरी 2015

वीर रत्नावती


(जैसलमेर के राजा महारावल रत्नसिंह का दरबार। राजकुमारी रत्नावती मंत्री के साथ बैठी विचार-विमर्श कर रही हैं।)
रत्नावती      ःमंत्री जी, राज्य में सब कुशल तो है?

मंत्री        ःजी, राजकुमारी, आप की कृपा से सब कुशल है। सब प्रसन्न हैं। प्रजा के असंतोष को देखते हुए दक्षिण प्रांत में कर-वसूली का कार्य स्थगित कर दिया गया है।

रत्नावती      ःहाँ, इस बात का अवश्य ध्यान रखा जाए कि प्रजा कोई कष्ट न हो।

मंत्री          ःजी, राजकुमारी, राजस्व मंत्री उस क्षेत्र का सर्वेक्षण करा रहे हैं। जो लोग कर देने में सक्षम नहीं हैं उनका कर माफ कर दिया जाएगा।

रत्नावती    ःबहुत अच्छा। (जैसे अपने आप से कहती हैं) पिता श्री लंबी यात्रा पर हैं। उनकी अनुपस्थिति में प्रजा को कोई कष्ट नहीं होना चाहिए। उसे यह न लगे कि अपने न्यायप्रिय राजा की अनुपस्थिति में उस पर अत्याचार हो रहे हैं।

मंत्री        ःकदापि नहीं, राजकुमारी। प्रजा बहुत प्रसन्न है। सब ओर अमन-चैन है।

रत्नावती    ःप्रजा का अमन-चैन तो आप ही लोगों के सहयोग पर निर्भर है, मंत्री जी। इसके लिए आप सब बधाई के पात्र हैं।

(तभी बाहर की ओर कोलाहल सुनाई देता है। सैनिकों की आवाज़ें। सेनापति घबराया हुआ प्रवेश करता है।)

सेनापति    ः(हाँफता हुआ)..राजकुमारी..की जय हो..!

रत्नावती    ः(सशंकित होकर) क्या हुआ सेनापति जी? यह कोलाहल कैसा?

सेनापति    ःराजकुमारी जी, दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन ख़िलजी की सेना ने हम पर आक्रमण कर दिया है।

रत्नावती और मंत्रीः (एक साथ) आक्रमण..!

सेनापति    ःहाँ, राजकुमारी, यह जानकर कि हमारे वीर राजा राज्य के बाहर हैं, उसने एक विशाल सेना भेज दी है। हमारे क़िले को चारों ओर से घेर लिया गया है।

रत्नावती    ः(दृढ़ स्वर में) घबराइये नहीं, क़िले की दीवारें इतनी ऊँची और अभेद्य हैं कि उन्हें लाँघ पाना उनके बस की बात नहीं। क़िले की बुर्जियों पर तैनात सैनिक बाणों की वर्षा करके उन्हें रोके रहेंगे। इस बीच हमारे पास इतना समय होगा कि हम अपनी रणनीति तैयार कर सकें। लेकिन हमें शीघ्रता करनी होगी।

सेनापति    ःहाँ, राजकुमारी जी, हमें जल्द ही कोई रणनीति तैयार करनी होगी क्योंकि शत्रु-सेनापति बहुत विशाल सेना लेकर आया है, और क़िले में इस समय सैनिकों की संख्या बहुत कम है।

(तभी एक सैनिक का प्रवेश। वह बुरी तरह से घायल है। शरीर में जगह-जगह से रक्त बह रहा है।)

सैनिक      ः(कठिनाई से झुककर) राजकुमारी...की जय...हो।

रत्नावती    ःयह क्या वीर सैनिक? तुम्हारी यह दशा कैसे हुई?

सैनिक      ःक़िले की उत्तरी...दीवार पर शत्रु-सेना ने..चढ़ना आरंभ कर दिया है। ..बुर्जियों पर तैनात सैनिक...वीरगति को प्राप्त हो गए हैं। अगर शत्रु को...कुछ देर और न रोका गया तो...

(अचेत होकर गिर जाता है)

रत्नावती    ः(चेहरे पर क्षण भर चिंता की रेखाएँ उभरती हैं, पर अगले ही पल दृढ़ स्वर में) मंत्री जी, इस सैनिक को चिकित्सा-शिविर में भेजने का प्रबंध करिए।

(मंत्री अपने अनुचरों के साथ सैनिक को ले जाता है।)

सेनापति    ःमुझे भी आज्ञा दीजिए, राजकुमारी जी। मैं उत्तरी क्षेत्र का सैन्य-प्रबंध देखता हूँ।

रत्नावती    ःअवश्य! किंतु यह ध्यान रहे कि शत्रु शक्तिशाली है। सिर्फ तीर-तलवारों से उसका सामना नहीं किया जा सकता।

सेनापति    ःतो फिर क्या आज्ञा है?

रत्नावती    ःहमारा पहला कार्य क़िले की रक्षा है। अगर शत्रु-सैनिक क़िले में प्रवेश पा गए तो हमारी रणनीति विफल हो जाएगी। हमें किसी भी उपाय से उन्हें बाहर ही रोके रखना है। ऊपर से खौलता हुआ तेल उन पर गिराइए। इससे वे दीवारों के आस-पास नहीं फटकेंगे।

सेनापति    ःजैसी आज्ञा, राजकुमारी। (जाता है।)

(रत्नावती बेचैनी से इधर-उधर टहलती है और अपने आप से कहती है।)

रत्नावती    ःपिता श्री, बाहर हैं। अब राज्य की रक्षा का समस्त उत्तरदायित्व मुझ पर है। पिता श्री मेरी योग्यता पर पूरा भरोसा करते हैं। मुझे भी आज यह साबित कर दिखाना है कि उनकी बेटी पुरुषों से किसी भी प्रकार कम नहीं। अपने जीते जी जैसलमेर की पवित्र भूमि पर शत्रुओं के पैर नहीं पड़ने दूँगी, यह मेरा प्रण है।

(तभी क़िले के वृद्ध द्वारपाल का प्रवेश)

द्वारपाल    ःराजकुमारी की जय हो।

रत्नावती    ः(चौंककर) कौन? (पहचानते हुए) द्वारपाल तुम, इस समय यहाँ?

द्वारपाल    ःहाँ, राजकुमारी जी, आपको एक आवश्यक सूचना देनी थी।

रत्नावती    ःकहो, क्या कहना है।

(द्वारपाल आगे बढ़कर वस्त्रों में छिपाया धातु का एक पिंड सामने रख देता है।)

रत्नावती    ः(चौंककर) यह क्या? यह तो शुद्ध स्वर्ण है! तुम्हारे पास कहाँ से आया?

द्वारपाल    ःशत्रु के सेनापति ने भेंट-स्वरूप दिया है। क़िला फतह करने के बाद उसने और भी उपहार देने का वचन दिया है।

रत्नावती    ः(क्रोधित होकर) क्या बकते हो?

द्वारपाल    ः(घुटनों के बल झुकता हुआ) अपराध क्षमा करें, राजकुमारी। शत्रु-सेनापति ने मेरी गर्दन पर तलवार रखकर रात के अंधेरे में चुपके-से क़िले का द्वार खोल देने की धमकी दी। मैं अकेला था। मना करता तो वह मेरा सिर धड़ से अलग कर देता। मैंने अपने जान बचाने और उसकी करतूत आप तक पहुँचाने के लिए हाँकह दिया। मैं अपनी बात से मुकर न जाऊँ, इसलिए उसने मुझे स्वर्ण का प्रलोभन दिया।

(रत्नावती कुछ नहीं बोलती। उसके चेहरे पर भावों का उतार-चढ़ाव दिखाई देता है। कुछ क्षणों तक सन्नाटा छाया रहता है।)

रत्नावती    ःद्वारपाल, जब तुमने वचन दे ही दिया है तो नियत समय पर द्वार खोल देना।

द्वारपाल    ः(चौंककर) आप यह क्या कह रही हैं, राजकुमारी। मेरे हाथ भले ही कट जाएँ, जान भले ही चली जाए, पर यह कृतघ्नता मुझसे नहीं हो सकती। मैं एक राजपूत हूँ। अपने राज्य के प्रति कृतघ्न कैसे हो सकता हूँ?

रत्नावती    ःइसीलिए तो कह रही हूँ, द्वारपाल। झूठ ही सही, पर जो वचन दे दिया गया, उसे निभाना एक राजपूत का कर्तव्य है। तुम क़िले का द्वार खोलोगे, अवश्य खोलोगे, पर उनके लिए नहीं, हमारे लिए। हम छल का जवाब छल से देंगे।

द्वारपाल    ः(समझता हुआ प्रसन्नता से) जैसी आज्ञा राजकुमारी।

(जाता है।)

रत्नावती    ः(स्वयं से) मैं भी चलूँ। सेनापति जी से आवश्यक मंत्रणा करनी है।

                                   दूसरा दृश्य
(अर्द्ध रात्रि का समय। चारों तरफ अंधकार छाया हुआ है। द्वारपाल क़िले के फाटक के पास व्याकुलता से चहलक़दमी कर रहा है। ज़रा-सी आहट पर वह चौकन्ना होकर इधर उधर देखने लगता है। तभी सीटी बजने की-सी आवाज़ सुनाई देती है।)

द्वारपाल    ः(चौंककर) शत्रु-सेनापति का आगमन हो गया है। सीटी की ध्वनि उसी का संकेत है। मुझे भी प्रत्युत्तर देना चाहिए। (सीटी की ध्वनि निकालता है)

(द्वार के पास फुसफुसाहट का स्वर सुनाई देता है-पहरेदार, दरवाज़ा खोलो। हम आ गए हैं।द्वारपाल लपककर फाटक खोल देता है। सामने शत्रु-सेनापति अपने प्रशिक्षित सैनिकों की टुकड़ी लिए खड़ा है। चेहरे पर विजयी मुस्कान है।)

शत्रु-सेनापति ः(फुसफुसाता हुआ) हम तुमसे बहुत ख़ुश हैं द्वारपाल। तुमने अपना वादा निभाया। सुल्तान तुम्हें मालामाल कर देंगे। तुम्हारी बाक़ी ज़िंदगी ऐश के साथ गुज़रेगी। (इधर-उधर देखता है) यहाँ बहुत अंधेरा है। रास्ते भी कई दिख रहे हैं। अब तुम हमें उस रास्ते पर ले चलो, जिस पर तुम्हारे राजा का महल है।

(द्वारपाल कुछ नहीं बोलता। वह चुपचाप एक रास्ते पर बढ़ चलता है। पीछे-पीछे सेनापति और उसके सैनिक भी चल पड़ते हैं।)

शत्रु-सेनापति  ः(लड़खड़ाता हुआ) उफ! कितना घना अंधेरा है। कुछ दिखाई नहीं पड़ता और रास्ता भी कितना टेढा़-मेढ़ा है।

द्वारपाल    ःहुज़ूर क्षमा करें। अगर मशाल जलाई तो महाराज के चौकस सैनिकों की निगाहें हम पर पड़ जाएगी। हम सब संकट में पड़ जाएँगे।

शत्रु-सेनापति  ःठीक है, आगे बढ़ो। एक बार राजा के महल में दाख़िल हो जाएँ, बस। हमारे बाज़ुओं का लोहा तो सारी दुनिया मानती है। इस छोटी-सी रियासत की क्या मजाल? सूरज की पहली किरन फूटने से पहले जैसलमेर हमारे क़ब्ज़े में होगा। मेरे बाज़ू फड़क रहे हैं। तलवार ख़ून की प्यासी हो रही है। जल्दी करो, पहरेदार...

(द्वारपाल अंधेरे का लाभ उठाकर अचानक ग़ायब हो जाता है।)

शत्रु-सेनापति  ःयह कौन-सी जगह है? इतना अंधेरा है कि कुछ दिखाई नहीं देता। यह पहरेदार का बच्चा कहाँ मर गया?

(तभी चारों ओर मशालें जल उठती हैं और एक स्त्री-स्वर गूँजता है।)
स्त्री-स्वर    ःशत्रु-सेनापति , तुम चारों ओर से घिर चुके हो। अब यहाँ से तुम्हारा निकल पाना संभव नहीं है। उचित यही होगा कि अपने सैनिकों सहित आत्म-समर्पण कर दो।

(एक सिपाही आवाज़ की दिशा में तीर साधने का प्रयास करता है। पर तभी कहीं से एक तीर सनसनाता हुआ उसके सीने को बेध जाता है।)

स्त्री स्वर    ः इसी तरह तुम सब मारे जाओगे। जान प्यारी है तो अपने अस्त्र-शस्त्र नीचे रख दो और स्वयं को हमारे हवाले कर दो।

(शत्रु-सेनापति बेबस होकर इधर-उधर देखता है। कुछ क्षणों के असमंजस के बाद वह अपनी तलवार नीचे रख देता है। सिपाही भी अपने-अपने हथियार नीचे रख देते हैं। इस बीच रत्नावती के सैनिक निकलकर चारों ओर से उन्हें घेर लेते हैं।)

रत्नावती    ःअब सुल्तान को पता चलेगा कि राजपूतों से बिना कारण बैर लेने का क्या परिणाम होता है। उसने सोचा होगा कि भला एक स्त्री हमारा क्या मुक़ाबला करेगी। पर उसे नहीं पता कि स्त्री किसी भी स्तर पर पुरुषों से निर्बल नहीं है। वह मोम की पुतली नहीं, वज्र की तरह कठोर है। ठान ले तो बड़ी से बड़ी बाधाएँ भी उसके चरणों में लोट जाती हैं। (सेनापति की तरफ घूमकर) सेनापति जी, आप इन्हें कारागार में भेजने का प्रबंध करिए।

सेनापति    ः(असमंजस के स्वरों में) जी, राजकुमारी, जी।

(सेनापति के चेहरे पर ऊहापोह दिखाई देता है। वह चलने का उपक्रम करके भी वहीं खड़ा रह जाता है।)

रत्नावती    ःसेनापति जी, देखती हूँ कि आपके मन में कुछ संशय है। क्या आप इस विजय से प्रसन्न नहीं?

सेनापति    ःऐसा स्वप्न में न सोचें, राजकुमारी। किंतु....

रत्नावती    ःकिंतु क्या, सेनापति?

सेनापति    ःक़िले में खाद्य-सामग्री लगभग ख़त्म हो चली है। शत्रु-सेना ने हमें घेर रखा है। बाहर से सहायता मिल पाना संभव नहीं। हम लोग पहले ही मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। अब ऐसे में इतने युद्ध-बंदियों के भोजन का प्रबंध कैसे संभव हो पाएगा?

रत्नावती    ः(गहन विचार की मुद्रा में) ये हमारे शत्रु अवश्य हैं, पर शत्रुता मानवता से बढ़कर नहीं हो सकती। आज से हम सब एक समय उपवास रखेंगे। ध्यान रखिए सेनापति जीइन युद्ध-बंदियों को किसी प्रकार की कोई कमी न हो।

शत्रु-सेनापति  ः(एकाएक बोल पड़ता है) माफ़ करना शहज़ादी, ज़मीन के चंद टुकड़ों को हड़पने और सोने-चाँदी की हवस में मैं यह भूल गया था कि तलवार से मुल्कों को फ़तह किया जा सकता है, दिलों को नहीं। आज इंसानियत की ताक़त के आगे मेरी तलवार झुक गई है।

(तभी एक सैनिक दौड़ता हुआ आता है।)

सैनिक      ःराजकुमारी की जय हो, शत्रु-सेना के शिविर उखड़ने आरंभ हो गए हैं। उनकी सेनाएँ वापस लौटने लगीं हैं।

(सेनापति उत्साह से राजकुमारी की ओर देखते हैं। राजकुमारी संतोष की साँस लेकर आँखें बंद कर लेती हैं।)