सोमवार, 14 जुलाई 2014

जब मैं कहानी पढ़कर रोया था ('अपना बचपन'-भोपाल में प्रकाशित)

जब मैं कहानी पढ़कर रोया था
28 फरवरी 1976 की एक भोर। रात का अँधेरा अभी पूरी तरह से छटा न था। लेकिन दूर पूरब में, जहाँ धरती और आकाश मिल रहे थे, उजाले की हल्की-सी रेखा खिंचने लगी थी। अँधेरे के जमे हुए धब्बों जैसे लग रहे पेड़ों में हलचल होने लगी थी और चिड़ियों का समूह सरज के स्वागत-अभ्यास में जुट गया था।
बाराबंकी ज़िले के उधौली नामक छोटे से गाँव में अलग-थलग-से बने छः सरकारी क्वार्टरों में से एक में अचानक नवजात की किलकारियाँ गूँज उठीं। दरवाज़े से गुज़रते, हाथों में बेल-पत्र और लुटिया भर जल लिए राम प्यारे चाचा अचानक ठहर गए। वे शिव-मंदिर जा रहे थे। पिछले पहर की उनींदी आँखे लिए, दरवाज़े बैठे बच्चे के पिता से वह बोले, ‘‘बधाई हो, डॉक्टर साहब! आज शिवरात्रि का त्योहार है। भोलेबाबा का दिन है। यह संतान बहुत भाग्यशाली होगी।’’
और राम प्यारे चाचा आशीषें देते आगे बढ़ गए।
अम्मी आज भी मेरे जन्म की घटना सुनाती हैं तो राम प्यारे चाचा की यह बात बताना नहीं भूलतीं। उन्हें उनकी बात में सच्चाई भी नज़र आती है क्योंकि मेरे जन्म के साथ ही पिता श्री मोहम्मद यूसुफ़ ख़ान, जो वेटरीनरी डॉक्टर थे, की प्रोन्नति हो गई थी। हम छः भाइयों और एक बहन के परिवार में पिता जी की बढ़ी हुई तनख़्वाह बड़ा सहारा थी। मैं घर में सबसे छोटी संतान था। बाक़ी भाई-बहन सब पढ़ रहे थे। पिता के कंधों पर ज़िम्मेदारी का बड़ा बोझ था। तनख़्वाह भी कितनी? सिर्फ पचहत्तर रुपए। हालाँकि पचहत्तर रुपए भी उस दौर में कम नहीं थे। अनाज और खाने-पीने की चीज़ें बड़ी सस्ती थीं। मौसमी फल और सब्ज़ियाँ तो लोग सौगात में दे जाते थे। पर कुछ चीज़ें सचमुच बड़ी महँगी थीं। साइकिल, रेडियो और टी0वी0 जैसी चीज़ें कोई ले आता तो गाँव-गाँव में उसकी चर्चा होती। जब हम प्राइमरी पाठशाला में पढ़ रहे थे तो उस दौरान एक नए अध्यापक आए थे। नाम था प्रेम नारायण, पर कहते सब नए मास्टर थे। नए मास्टर साहब के घर टी0वी0 था। इतवार को जब फिल्म आती तो पूरा गाँव उनके घर जुटता था। अध्यापक होना उस दौर में सम्मान के लिए वैसे भी काफी था, किंतु टी0वी0 होना उनके प्रति कौतूहल का अतिरिक्त विषय था। लोग बाज़ारों में या जहाँ कहीं भी वे दिख जाते उनकी ओर इशारा करके कहते, ‘इन मास्टर साहब के घर टी0वी0 है।
लेकिन सस्ताई के उस दौर में भी नौ सदस्योंवाले बड़े परिवार को पालना कोई छोटा काम न था। ख़ास तौर पर तब, जब घर का मुखिया पैसे-लत्तों और कमाई के पीछे अनुरक्त न हो। पिता जी के इस विराग का कारण उनकी कोई धार्मिक या सन्यासी प्रवृत्ति नहीं थी। इसका कारण शुद्ध भौतिक-रूप था। बात यह थी कि वे आरामतलब क़िस्म के इंसान थे। लाख का नुकसान हो जाए, पर दोपहर की नींद न टूटे। जब से होश सँभाला है, याद नहीं पड़ता कि उन्होंने दोपहर में लेटकर आराम न किया हो। जिस गाँव में उनकी पोस्टिंग थी, वह वज्र देहात था। सिर्फ छः सरकारी क्वार्टरों का गाँव। एक तरफ लहलहाते धनहर खेत, तो दूसरी तरफ बेतरतीब फैला घना जंगल। जंगल भी ऐसा, जहाँ चिलबिल के एक बड़े-से पेड़ के नीचे लोग मुर्दे फूँकने आते थे। कभी किसी चीज़ की ज़रूरत पड़े तो दो किलोमीटर पैदल चलकर जाना पड़ता। लेकिन ऐसी जगह पर भी उन्होंने अपनी नौकरी के चौदह साल बिता दिए। अफसरों को सौगातें पहुँचाकर या सिफारिशें करके ट्रांसफर किसी न किसी तरह टालते रहे। वजह सिर्फ यही थी कि जिल़ा हेडक्वार्टर पर पहुँच गए तो काम ज़्यादा करना पड़ेगा। थे भी ऐसे ख़ानदान से जहाँ उन्होंने काम कराना सीखा था, करना नहीं।
पिता जी स्वभाव के बड़े सख़्त थे। कुछ कहें और फौरन काम पूरा न हो तो तमतमा उठते। जब वे दोपहर में सोते तो हम सब भाई बारी-बारी से बैठकर उनके पंखा झलते थे। यह बड़ी मुश्किल ड्यूटी थी। गर्मी की आलस भरी दोपहरी में वैसे भी ऊँघ आती थी। ऐसे में एक पल के लिए भी पंखा रुकता और पिता जी की नींद खुल जाती, तो उसी पंखे की डंडी से बेहिचक मारते थे, बिना सोचे कि चोट ठाँव लगेगी कि कुठाँव। लेकिन सबसे मुश्किल घड़ी वह होती जब ऐसी अलस दोपहरी में आँधी आती। सारे भाई और ईदू चाचा के लड़के सलीम और शम्मू मैदान में हाथ पकड़कर नाचते और गाते-‘‘आँधी-पानी आवत है, चिड़िया ढोल बजावत है।’’ और आम के टिकोरे बीनने निकल जाते। तब भीतर बैठकर पिता की पीठ पर पंखा करते हुए ऐसी विकलता का अनुभव होता था, कि पूछो मत। जैसे किसी तोते को पिंजरे में बंद कर दिया गया हो और उसके साथी आसमान के रंग-बिरंगे पर्दे पर अठखेलियाँ कर रहे हों।
इस व्याकुलता का एक कारण और भी होता था। दरअसल यही मौका होता था जब अस्पताल के प्रांगण में लगे आम हम पा सकते थे। वर्ना तो उन्हें पेड़ पर लटके देख-देखकर ही संतोष करना पड़ता था। जब तक आम पक न जाते राम प्यारे चाचा उन्हें हाथ न लगाने देते। पक जाने पर भी हमें पेड़ पर चढ़ने या ढेलेबाज़ी की इजाज़त नहीं थी। वह खंुची से ख़ुद ही तोड़-तोड़कर सबके घर पहुँचाते थे।
पेड़-पौधों से उन्हें इतना प्यार था कि पूछो मत। प्रकृति-प्रेम का पहला पाठ हमने उन्हीं से सीखा। वे थे तो बुल-अटेंडेंट, लेकिन काम माली का करते थे। अस्पताल को उन्होंने ऐसा सजा रखा था कि पूरे बाराबंकी ज़िले उसका मुक़ाबला नहीं था। अस्पताल के मुख्य-मार्ग के सामने आम का एक पेड़ था। उसके चारों ओर दूर तक गोलाई में रात-रानी के आदमक़द झाड़ लगे हुए थे। एक आकृति के, एक ऊँचाई में, करीने से कटे-छँटे। उस क्षेत्र को हम लोग गोलतारा (गोलद्वार) कहते थे। गर्मियों की चाँदनी में जब रात-रानी महकती तो लगता किसी दूसरी दुनिया में आ गए हैं। हमारे क्वार्टर के सामने भी रातरानी की झाड़ मखमली दीवार की तरह पर्दा बनकर खड़ी थी। दीवारें तो आँगन में भी नहीं थीं। उनकी जगह पर फूलों और झाड़ियों की ही ओट बनी हुई थी।
अस्पताल में फल-फूलों के इतने पेड़-पौधे थे, पर राम प्यारे चाचा की अनुपस्थिति में भी इतनी हिम्मत नहीं होती थी कि हम उन्हें डाली से तोड़कर जुदा करें। शायद वहीं से हमने सीखा था कि फूलों का असली सौंदर्य डाली से उनके लगे रहने में है, तोड़कर अलग करने में नहीं। आज भी किसी फूल को तोड़ने के लिए हाथ बढ़ाता हूँ तो चाचा की बरजती हुई आवाज़ जैसे कानों में आकर हाथ रोक लेती है। मेरी कई कहानियों में राम प्यारे चाचा एक जीवंत चरित्र के रूप में आए हैं।
जब चाँदनी रात आती तो हम लोग एक खेल खेलते। उस खेल में बच्चे ही नहीं, बड़े भी शामिल होते। रात को खा-पीकर सब टहलने निकलते थे। औरतें एक तरफ, आदमी सब एक तरफ। पिता जी दस पैसे का सिक्का उछाल देते और हम सब चाँदनी रात में उसे ढूँढते। जिसे मिल जाता, सिक्का उसका होता। इसी तरह और भी खेल थे जो हमारे अकेलेपन के साथी थे। हम लोग साइकिल-ट्यूब के पतले-पतले छल्ले काटकर उसे एक कपड़े के गोले पर चढ़ाकर गेंद बना लेते। बढ़ई से लकड़ी का एक बल्ला बनवा रखा था। जब क्रिकेट का खेल जमता तो पास के गाँव तुलसीपुर से भी लोग आ जुटते। इसी तरह का एक और खेल था, टूटकर गिर रही पत्तियों को कैच करने का। जब सूखी पत्तियाँ टूटकर हवा में लहराती-बलखाती हुई गिरतीं और हम उन्हें लपकने के लिए पीछे-पीछे भागते तो खेलनेवाले से ज़्यादा देखनेवाले को मज़ा आता।
अस्पताल से क़रीब एक-डेढ़ किलोमीटर दूर प्राइमरी पाठशाला थी। हम लोग सड़क के किनारे-किनारे पैदल ही पढ़ने जाया करते थे। रास्ता हँसी-खेल और एक-दूसरे से रेस में कैसे बीत जाता था, पता ही नहीं लगता था। मैं पढ़ाई के मामले में बचपन से तेज़ था, पर था दब्बू क़िस्म का। सही उत्तर आते हुए भी हाथ खड़ा करने में हिचकता था। सुननेवालों को हैरत होगी, पर यह सच है कि प्राइमरी पाठशाला में एक अध्यापक थे जिनके डाँटने से मुझे बुखार आ जाता था। पिता जी अम्मी के कहने पर एक बार शिकायत लेकर गए भी। पर मास्टर साहब से उन्होंने शिकायत की या नहीं, यह पता नहीं, क्योंकि दोनों लोग बड़ी देर तक चाय पीते और हँस-हँसकर बातें करते रहे।
मैं पहली कक्षा में कभी बैठा ही नहीं। बड़े भाई साजिद, जो कि स्वयं एक समर्थ बाल साहित्यकार हैं, उस समय कक्षा दो में पढ़ते थे। जब पहली बार मुझे कक्षा में ले जाकर बिठाया गया, तो मैं घबरा गया और आश्रय ढूँढते-ढूँढते बड़े भाई के बग़ल में आ बैठा। डर था कि अध्यापक कुछ कहेंगे, पर किसी ने कुछ नहीं कहा। डॉक्टर साहब के लड़के होने का कुछ फायदा तो था ही।
जब मैं स्कूल जाना शुरू हुआ तो नामकरण की बात सोची जाने लगी। इससे पहले सब मुझे भैयाकहकर ही पुकारते थे। आज भी घर-परिवार के लोग मुझे भैया के ही नाम से पुकारते हैं। जब मैं पहले दिन स्कूल पहुँचा और अध्यापक ने मेरा नाम पूछा तो मैं शर्म से ऐंठने लगा। बड़ी देर के बाद मेरे मुँह से निकला-‘‘भैया’’। सारी कक्षा हँस पड़ी। मुझे उन दो पलों का खड़ा रहना बड़ा भारी लगा। जब अध्यापक को लगा मैं रो दूँगा तो मुझे बिठाया। भाई से पूछा तो उन्होंने बताया कि मेरा कोई नाम ही नहीं है। तब अध्यापक ने दुलारकर पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम माजिद रख दिया जाए?’’ पहले आनुप्रासिक नाम बहुत चलते थे-साजिद, वाजिद, मजिद, राशिद आदि। शायद इसी आधार पर अध्यापक ने मेरा नाम सुझाया था। मना करने का तो सवाल ही नहीं उठता था। मैंने हाँमें सिर हिला दिया। हालाँकि बाद में घर आकर मैं बहुत रोया कि यह नाम मुझे पसंद नहीं। भाई ने बड़ी धौंस दी कि वहीं क्यों नहीं बोले? पर उन्हें क्या पता कि प्रेम से कही बातों को इंकार करना न तो मेरे लिए तब संभव था, न अब संभव है।
उस समय हम लोग शायद कक्षा तीन या चार में रहे होंगे, जब हमने बाल पत्रिकाएँ पढ़नी शुरू कर दी थीं। पहली बाल पत्रिका जो मैंने अपने जीवन में देखी, वह थी नंदन, जिसमें एक अजगर द्वारा सात भाइयों के निगल जाने की कथा थी। तब मेरे बड़े भाई मोहम्मद आमिल ख़ान की नौकरी सचिवालय, लखनऊ में लग गई थी। जब वे लखनऊ से आते तो हमारे लिए बाल पत्रिकाएँ ज़रूर लाते। शुरुआती दौर में हमने जो बाल पत्रिकाएँ पढ़ीं उनमें लोटपोट, चंपक, नंदन, पराग, बालक, मधुमुस्कान, चंदामामा आदि थीं। हम और बड़े भाई साजिद दोनों तकिए के नीचे किताबें रखकर सोते और सुबह नींद खुलते ही पढ़ना शुरू कर देते। उस दौर में पढ़ी गई किताबों का एक-एक पृष्ठ आज भी मष्तिष्क में अंकित है। नंदन में बहुतेरी कहानियाँ ऐसी हुआ करती थीं जिनमें किसी साधु के श्राप से कोई परी किसी पक्षी, तितली या किसी दूसरे रूप में बदल जाती थी। जब कोई लड़का उसकी जान बचाता था तो वह वापस परी के रूप में बदल जाती थी और उसकी दोस्त बन जाती थी। बचपन में में इन कहानियों को सच मानकर बहुत दिनों तक पानी में बह रही चींटी को बचा लेता रहा या किसी घायल तितली को वापस फूल पर बिठा देता रहा। इस आस में कि शायद वह कोई श्रापग्रस्त परी हो और बचने के बाद अपने असली रूप में आकर मुझे वरदान दे। पर बड़ा हुआ तो धीरे-धीरे समझ आ गई कि ऐसा सिर्फ कहानियों में ही सभंव होता है। लेकिन कीट-पतंगों और पशु-पक्षियों को बचाने की मेरी वह आदत न छूटी। आज बचपन की वह बात सोचकर हँसी आती है, पर यह ज़रूर लगता है कि उन कहानियों ने मन में संवेदनशीलता पैदा की। शायद वहीं से मैंने यह भी सीखा कि बच्चों की कहानियों में कल्पना का क्या महत्व होता है। मैंने अब तक एक भी परी कथा नहीं लिखी पर आज जब परी कथाओं के बारे में सुनता हूँ कि ये आउटउेटेड हो गई हैं तो यह बात नागवार लगती है। परी कथाएँ हों या इसी प्रकार कल्पना का सहारा लेकर आगे बढ़नेवाली दूसरी कहानियाँ, उनमें बच्चों की कल्पनाशीलता और संवेदना को जाग्रत करने की अद्भुत शक्ति होती है। बच्चे की कल्पना का जाग्रत होना उसके मानसिक विकास के लिए कितना आवश्यक होता है, यह बताने की आवश्यकता नहीं है।
अस्पताल में एक तरफ बुल-शेड था। उसकी इमारत बहुत पुरानी और दीवारें टूटी हुई थीं। हम लोगों ने एक बार उसमें से ईंटें निकालकर एक घर बनाया। वे गुलाबी जाड़ों के दिन थे। इस काम में बड़े भाइयों ने भी हमारी मदद की। लगभग ग़ज़ भर के दायरे में तीन-चार फुट ऊँची दीवारें उठाई गईं। छत पर नीम की पत्तियों का छप्पर डाला गया। ईदू चाचा की मदद से अस्पताल से मिट्टी का तेल लाया गया। बोतल से एक ढिबरी बनाई गई। रात हुई तो बड़े भाई साजिद, जो इन कामों के सूत्रधार हुआ करते थे, सलीम और शम्मू सहित हम अपने बनाए घर में बाल पत्रिकाएँ पढ़ने बैठे। अस्पताल में एक जमुनापरी बकरा भी पला हुआ था। वह बहुत मरखना था। घूमते-घामते कहीं वह उधर निकल आया। हम लोग डर के मारे घबराकर भागे कि कहीं सींगें मारकर वह हमारा घर धाराशायी न कर दे। इसके बाद हम उस घर में नहीं बैठे।
बाल पत्रिकाएँ पढ़ने की उस दौर में हमें ऐसी लत लगी थी कि गर्मी की दोपहरी में हम लोग जंगल की तरफ निकल जाते और किसी पेड़ की मोटी डाल पर बैठकर कहानियाँ पढ़ते। पढ़नेवाला बीच में बैठता और बाक़ी सब अगल-बग़ल। हमारे पास दो-चार पत्रिकाएँ ही थीं। इसलिए उन्हीं कहानियों को हम बार-बार पढ़ा करते थे।
एक बार मेरे बड़े भाई दरवाज़े बैठे अपनी पढ़ाई कर रहे थे। अपने को पढ़ाकू सिद्ध करने के लिए मैं भी उनके बग़ल में बैठा ज़ोर-ज़ोर से एंड्रोक्लीज़ की कथा पढ़ रहा था। कहानी अब ठीक से याद नहीं पर उसमें कुछ ऐसा था कि प्यार की भाषा जानवर भी समझते हैं। अगर उनसे प्रेम का व्यवहार किया जाए तो शेर जैसे प्राणी भी अपना हिंसक स्वभाव भूल जाते हैं। कहानी पढ़ना शुरू किया तो धीरे-धीरे मेरा गला भर्राने लगा। भाई ने अपनी पढ़ाई रोक दी और मुझे सुनने लगे। मुझ पर दबाव और बढ़ गया। मैं कहानी पढ़ता गया और मेरा गला रुँधता गया। आख़िर तक पहुँचते-पहुँचते मैं फूट-फूटकर रोने लगा। बाक़ी लोग मुझे देखकर हँस रहे थे। कहानी सुखांत थी पर उसने मेरे मन पर जाने कैसा असर किया था। उस बात को आज सोचता हूँ तो वह घटना मेरे लिए नए अर्थ-संदर्भ खोलती-सी लगती है। मुझे याद है कि बचपन में अगर कोई दुखांत कहानी पढ़ लेता था तो कई दिनों तक मन पर उसका असर रहता था। मन उस दुखांतता को अपने ढंग से सुखांत रूप दे लेता था। शायद वहीं से कहानी-लेखन के सूत्र मन में जड़ें जमाने लगे थे।
उधौली में मैंने बचपन के आठ वर्ष बिताए। तब हम कक्षा चार में थे कि पिता जी का ट्रांसफर गोंडा हो गया। इस बार पिता जी ने ट्रांसफर रुकवाने की कोशिश नहीं की। वजह यह थी कि इस बीच अस्पताल में ऐसी घटना घट गई थी जिसने हम सबके मन में भय व्याप्त कर दिया था। वे जाड़ों के दिन थे। मैं माँ-पिता जी के साथ दालान में लेटता था और भाई-बहन सब कमरे में। आधी रात का वक़्त था कि अचानक कुछ खटपट सुनाई दी। दीवार में बनी अल्मारियों में कोई कुछ टटोल रहा था। पिता जी ने पुकारा-‘‘आसिफ!’’ वे समझे कि मेरे बड़े भाई शायद कुछ ढूँढ रहे हैं। जवाब में उस परछाई ने उनकी आँखों पर जलती हुई टार्च रख दी। पिता जी ने क्रोध में आकर उसे धक्का दिया तो वह दूर जा गिरा। उसका साथी जो अब तक कहीं छिपा था, निकलकर भागा और फुसफुसाया ‘‘मार दे! मार दे! चला दे!’’ पिता जी जो उसे पकड़ने के लिए आगे बढ़ रहे थे, एकाएक ठिठक गए। यह सोचकर कि उनके पास हथियार होंगे। इस बीच वे परछाइयाँ आँगन की झाड़ियों को लाँघती हुई फरार हो गईं।
आस-पास के गाँवों में तो इस प्रकार की घटनाएँ अक्सर होती रहती थीं, पर अस्पताल के क्वार्टरों में ऐसी घटना पहली बार हुई थी। घनी अँधेरी रातों में तुलसीपुर, चोरही, अम्बौर जैसे गाँवों से आवाज़ें उठती रहतीं। चीख़-पुकार मचती रहती। लोगों के भागते हुए क़दम आस-पास गुज़रते सुनाई देते। हमें डर ज़रूर लगता, पर एक निश्चिंतता रहती कि हमें कुछ नहीं होगा। स्टॉकमैन का क्वार्टर तो हमेशा ख़ाली पड़ा रहता था। कोई देख-रेख करनेवाला नहीं था। पर कभी एक सामान इधर से उधर नहीं हुआ। इस घटना से हम लोग भयभीत हो गए। अँधेरा हमें डराने लगा। दालान में किवाड़ लगवा लिए गए। इस घटना का ज़िक्र डॉ0 मोहम्मद साजिद ख़ान ने अपनी कहानी दादी का संदूक़में किया है, जो बालवाटिका में प्रकाशित भी हो चुकी है।
इस घटना के बाद सपनों की उस नगरी से हमारा मन उचट गया। इसी बीच पिता जी को ट्रांसफर-आर्डर मिला और हमारा सामान बँधने लगा।
उधौली से विदाई की बात सोचता हूँ तो मन किरच-किरच हो जाता है। वे दिन प्रकृति से उन्मुक्त साहचर्य के दिन थे। हम दिन भर जंगलों में, खेतों में फिरते रहते थे। न भूख असर करती थी, न प्यास। कभी जामुन खाकर पेट भर लिया, कभी खजूरें, जंगल-जलेबी, कोकाबेली, गूलर या अंजीर खाकर। सबसे बड़ी बात तो यह थी कि इस साहचर्य में किसी की रोक-टोक न थी। माँ-पिता जी ने भी हमें कभी नहीं रोका। अब सोचता हूँ कि कुछ दिन वहाँ और रह गया होता तो शायद कुछ और सीख लिया होता। लेखन में कुछ और अनुभव और पैनापन आता।
ट्रांसफर की उस घटना को बड़े भाई साजिद ने ट्रांसफरकहानी में और मैंने उसकी उत्तर-कथा किराए का मकानमें व्यक्त करने का प्रयास किया है। ये दोनों कहानियाँ बालहंस में छपी थीं।
उधौली से उजड़कर हम लोग रुदौली आ गए। गाँव से क़स्बे में। यहाँ से मेरे जीवन का नया अध्याय शुरू हुआ। जब हम लोग अपना नया मकान बनाकर मंगल बाज़ार मुहल्ले में आए तो होठों के ऊपर रेखाएँ फूटने लगी थीं और गला भर्राने लगा था। अपनी किशोरावस्था में मैं बिल्कुल अकेला था। गाँव में था तो पेड़-पौधे, पशु-पक्षी सब साथी थे, पर यहाँ मेरा साथ देनेवाला कोई न था। दोस्त कोई बन न पाया था और न व्यक्तित्व ही ऐसा था कि लोग लपककर आते। मन में एक निचाट अकेलापन भरता चला गया। हालाँकि इस अकेलेपन का मेरे जीवन में बहुत योगदान है। इसने किताबों से मेरी दोस्ती बढ़ा दी। धीरे-धीरे कुछ लिखने भी लगा। पहली कहानी जो मैंने लिखी वह एक पढ़ी हुई कहानी को याद रखने का उपक्रम मात्र था। उसे लिखने के बाद लगा कि मैं ख़ुद भी तो लिख सकता हूँ। फिर थोड़ा-बहुत लिखने लगा।
मेरी पहली रचना एक कविता थी, जो उस समय के एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र स्वतंत्र भारतमें 8 अप्रैल 1990 को प्रकाशित हुई थी। शीर्षक था-गर्मी। तब मैं कक्षा 8 में था। यह मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी। इसलिए भी कि वह रचना बच्चों के कॉलम में न छपकर प्रतिष्ठित साहित्यकारों के साथ छपी थी। मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा। बड़ी बात तो यह कि मैंने वह कविता एक पोस्टकार्ड पर लिखकर भेजी थी। इसके बाद मैंने उत्साहित होकर पाँच-छः कविताएँ और रचीं और उम्र, कक्षा और स्कूल का पूरा हवाला देते हुए एक लिफाफे में डालकर भेज दी। लौटती डाक से जो उत्तर मिला, उससे मैं हतप्रभ रह गया। लिखा था, ‘‘कविताएँ मिलीं। किंतु ऐसा लगता है कि तुमने ये कविताएँ कहीं से पढ़कर लिखी हैं। अगर ऐसा है तो ये ग़लत है। भविष्य में इस प्रकार की रचनाएँ मत भेजना-तुम्हारी दीदी।’’ मैंने अपनी समझ के अनुसार उस पोस्टकार्ड का जवाब देते हुए लिखा-‘‘संपादिका जी, नमस्ते, ये रचनाएँ मैंने अपने मन से लिखी हैं। इन्हें कहीं से पढ़ा नहीं है। अगर चोरी साबित हो जाए तो आप मेरे ऊपर क़ानूनी कार्ररवाई कर सकती हैं।’’ फिर उस पत्र का जो जवाब मुझे मिला, वह मैं अपनी रचनाओं के लिए आज तक का सबसे बड़ा कॉम्प्लीमेंट मानता हूँ-‘‘प्रिय अरशद, यह तो बहुत अच्छी बात है तुम इतनी सुंदर कविताएँ लिखते हों। मैंने तो रचनाओं का स्तर और तुम्हारी उम्र देखते हुए सिर्फ संभावना प्रकट की थी। तुम्हारी रचनाएँ सुरक्षित हैं, समय पर छप जाएँगी-तुम्हारी दीदी।’’
इसके बाद स्वतंत्र भारतमें ही कई कविताएँ छपीं। इसी बीच उसमें बाल लेखन एवं रंग भरो प्रतियोगिताआरंभ हुई। इसमें दिए गए एक चित्र के आधार पर कविता एवं कहानी लिखना होता था और चित्र में रंग भरना होता था। सच कहा जाए तो प्रतियोगिता का ये समय मेरे लिए अभ्यास का दौर था। यह दौर दो-तीन वर्षों तक चला, जब तक कि मेरी उम्र 14 वर्ष की न हो गई। इस प्रतियोगिता में 14 वर्ष तक के ही बच्चे भाग ले सकते थे। पर लेखन का यह क्रम थमा नहीं। अब मैं प्रतियोगिता से अलग हटकर कविताएँ और कहानियाँ लिखने लगा। उस समय स्वतंत्र भारतने अपना कलेवर बदल लिया था। योगेन्द्र कुमार लल्ला के सम्पादन में प्रतिदिन आनेवाले उपहारपरिशिष्ट में अंतिम पूर्ण पृष्ठ बच्चों को ही समर्पित था। लल्ला जी के निष्पक्ष और निर्दयी सम्पादन ने लखनऊ में ही नहीं पूरे साहित्य जगत में अपना सम्मानपूर्ण स्थान बना रखा था। हालाँकि बाद में वे अमर उजाला’ (मेरठ) चले गए। उसी दौरान कानपुर से दैनिक जागरण का रविवारीय परिशिष्ट राजेन्द्र दुबे के संपादन में प्रकाशित होता था। जिसमें प्रकाशित होना लेखकों के लिए गौरव का विषय था। इन दोनों पत्रों में ख़ूब रचनाएँ भेजीं। हालाँकि छपनेवाली रचनाओं के मुक़ाबले वापस होनेवाली रचनाओं का प्रतिशत ज़्यादा रहता था।
इसी दौरान बालहंससे परिचय हुआ। बालहंसहर वर्ष जुलाई-द्वितीय अंक नव प्रतिभा विशेषांकके रूप में निकालता था। 1991 के विशेषांक में मेरी पहली रचना छपी राजू की माँ। प्रतियोगिताओं से हटकर मेरे लेखन का व्यवस्थित आरंभ यहीं से हुआ। अगर मेरा बाल साहित्यकार स्वतंत्र भारतकी उपज है तो उसे पल्लवित करने का सारा श्रेय बालहंसको है। श्री अनंत कुशवाहा और श्री योगेंद्र कुमार लल्ला का मेरे साहित्यिक जीवन में बड़ा आदरपूर्ण स्थान है। बालहंससे जुड़ाव बना तो कुशवाहा जी के संपादन काल तक बना रहा। इस दौरान मैंने बहुत कुछ लिखा और बहुत कुछ सीखा। उस दौर के संपादकों की बात सोचता हूँ तो मन श्रद्धा से भर जाता है। आदरणीय लल्ला जी तो बाक़ायदा अपने सुझाव भी देते थे। एक बार मैंने उन्हें एक कविता भेजी तो उन्होंने उसे वापस करते हुए लिखा कि कविता अच्छी है। तुक और मात्राएँ दुरुस्त करके भेज सकें तो प्रकाशन हेतु विचार किया जा सकता है।
मेरी पहली किताब रेल के डिब्बे मेंफरवरी 2001 में छपी। 20 कविताओं का यह संग्रह मैंने ख़ुद अपने पैसों से छपवाया था। चित्र भी ख़ुद ही बनाए। किताब छपकर आई तो ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। उठते-बैठते, सोते-जागते इसे उलट-पलटकर देखता था। दरअसल इस पुस्तिका को छपाने के पीछे भी एक वजह थी। बाल साहित्य समीक्षा’, जो आदरणीय राष्ट्रबंधु जी कानपुर से निकालते हैं, में एक सूचना प्रकाशित हुई कि एक साहित्यकार महोदय बाल कहानियों का एक संकलन प्रकाशित करने जा रहे हैं। उसके लिए उन्होंने लेखकों से कहानियाँ आमंत्रित की थीं। मैंने, भाई साजिद और मित्र फहीम अहमद ने उत्साहित होकर कहानियाँ भेज दीं। उधर से जवाब आया कि कहानियाँ तो आपकी अच्छी और प्रकाशन योग्य हैं, पर क्या आपकी कोई पुस्तक प्रकाशित हुई है? क्योंकि संग्रह में प्रकाशन की यह भी एक शर्त है। हम लोग हतप्रभ रह गए। सोचा गया कि किताब छपी होना ही विद्वता की निशानी है तो यह भी करके देख लेते हैं। सो, हम तीनों ने अपनी कविताओं की पुस्तिका छपवा डाली। इसी बीच आदरणीय राष्ट्रबंधु जी ने बाल कल्याण संस्थान के कार्यक्रम में हम लोगों को आमंत्रित किया। राष्ट्रबंधु जी ने हमें बहुत प्रेरणा दी। हमारे भीतर आत्मविश्वास जगाया और अच्छा लिखते रहने की प्रेरणा दी। कानपुर में ही हम तीनों की पुस्तिकाओं का विमोचन हुआ। मेरी पुस्तिका का विमोचन दिविक रमेश जी ने, बड़े भाई साजिद की पुस्तिका का विमोचन शंकुतला सिरोठिया जी ने और फहीम की किताब का विमोचन जय प्रकाश भारती जी ने किया। उस कार्यक्रम की याद करता हूँ तो मन आनंद से भर जाता है। वह कार्यक्रम बाल साहित्यकारों का महाकुंभ था। उसमें रमेश तैलंग, अश्वघोष, कृष्ण शलभ, शंभुनाथ तिवारी, नागेश पाण्डेय संजय’, शिवचरण चौहान, नयन राठी, इंदरमन साहू और तमाम बड़े-बड़े बाल साहित्यकार मौजूद थे। हमारे साथ रुदौली से ही देवेद्र शर्मा डनलपजी भी गए थे। हमने विमोचन के बाद पुस्तिका पर वहाँ मौजूद हर साहित्यकार के हस्ताक्षर लिए। वह प्रति आज भी हमारे पास एक धरोहर के रूप में सुरक्षित है। यह राष्ट्रबंधु जी का प्रेम ही था कि बाद में उन्होंने रुदौली के बाल साहित्यकारों पर बाल साहित्य समीक्षाका एक पूरा अंक केंद्रित किया।
तब तक मैं हिंदी से परास्नातक हो चुका था और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से जे0आर0एफ0 पाकर आदरणीय डॉ0 राजेश कुमार मल्ल जी के निर्देशन में शोध कर रहा था। उन दिनों को याद करता हूँ तो बड़ा अच्छा लगता है। उस दौरान रुदौली में कोई डिग्री कॉलेज नहीं था, इसलिए हम लोगों ने बाराबंकी के जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज में नाम लिखाया। बाराबंकी हमारे यहाँ से 60 किलोमीटर दूर था। हम लोग सुबह 6. 20 वाली पैसेंजर पकड़ते और शाम चार बजे तक वापस लौटते। यह बड़ा मुश्किल काम था। इसके बावजूद हम शायद ही कभी क्लास छोड़ते रहे हों। हम पढ़ने में भी अच्छे थे। बड़े भाई साजिद, फहीम और मेरे बीच ही कक्षा का पहला, दूसरा और तीसरा स्थान बना रहता। हमें अध्यापकों का स्नेह भी ख़ूब मिला। बी00 से लेकर एम00 तक पाँच सालों के दौरान याद नहीं पड़ता कि हमने कभी क्लास छोड़े हों। कुहरीली सर्दियों, चुहचुहाती गर्मियों और झमामझम बरसातों की भी हमने परवाह नहीं की। लोग हमारी साधना देखते-सुनते तो बड़ी दुआएँ देते। कहते-तुम लोग इतनी मेहनत करते हो ऊपरवाला तुम्हें ज़रूर कामयाबी देगा।तब यह सुनकर अच्छा तो लगता था, पर मन में प्रश्न भी जगता था कि इस प्रतियोगिता और रिश्वतख़ोरी के दौर में कामयाबी कैसे मिलेगी? पर अब सोचता हूँ तो लगता है कि लोगों की दुआएँ भी बहुत बड़ी चीज़ होती हैं, वर्ना मेहनत तो बहुत लोग करते हैं।
नवंबर 2002 में मेरी नौकरी लग गई और मैं रुदौली से शाहजहाँपुर आ गया। नौकरी में आने के बाद लगभग पाँच-छः सालों तक लेखन का साथ एकदम छूट गया। इस दौरान अवसाद का शिकार भी रहा। पर बाद में लगा कि यह सब लेखन से दूर रहने के कारण ही हुआ। लेखन फिर से शुरू किया। 5 सालों के अंतराल के बाद 2006 में दूसरी किताब आई किसी को बताना मत। इस कहानी संग्रह के प्रकाशन में देवेंद्र कुमार देवेशजी का योगदान था। किंतु इस किताब के बाद फिर एक लंबा अंतराल रहा। यह जड़ता पुनः पाँच वर्षों के बाद टूटी जब 2011 में शिशु कविताओं की एक पुस्तक बरसा ख़ूब झमाझम पानीछपी। अब सब बाधाएँ हार मान चुकी थीं। लेखन साँस की तरह शरीर में फिर से बहने लगा था। मन बाल साहित्य में पूरी तरह से रम चुका था। इसका परिणाम भी तत्काल देखने को मिला वर्ष 2012 में पाँच पुस्तकें प्रकाशित हुईं। पुस्तकें प्रकाशित होने से मन में एक आत्मविश्वास जागा और लिखने की प्रेरणा भी मिली। तब से यह क्रम निरंतर जारी है और ऊपरवाले से यही दुआ है कि मरते दम तक मुझे लिखने-पढ़ने की मुहलत देता रहे।



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