बुधवार, 18 जून 2014

पानी-पानी रे !


कृष्णा कालोनी की दस मंजिला इमारत सूरज की पहली किरण के साथ जाग उठती थी। लोगों को ऑफिस जाने की जल्दी, बच्चों को स्कूल भागने की हड़बड़ी, दूधवाले और अखबार वाले की आवाजें--एक हलचल-सी पैदा कर देतीं जाती। लेकिन दस बजते-बजते कॉलोनी फिर सूनी हो जाती। सब अपने-अपने काम पर चले जाते। धूप के साथ-साथ सन्नाटा भी पसर जाता।
ऐसी ही एक सुनहरी सुबह थी। सब कुछ सामान्य ढंग से चल रहा था कि अचानक-
‘‘अरे, पानी किसने बंद कर दिया ?’’ बत्रा अंकल साबुन लगी आँखें मिचमिचाते हुए चिल्लाए।
‘‘पानी कौन बंद करेगा भला ?’’ आंटी किचन से बड़बड़ाईं। फिर उन्होंने बाहर आकर वाश-बेसिन का पाइप खोला तो हैरान रह गईं। पानी सचमुच चला गया था।
कालोनी में आए उन्हें पाँच साल हुए थे। इन पाँच सालों में कभी ऐसी घटना नहीं हुई थी। पानी की व्यवस्था बहुत अच्छी थी। हरखू मंडल बड़े सवेरे आकर पंप चला देता था। लोग खूब पानी बहाते। नहाते-धोते, पेड़-पौधे सींचते, घर की धुलाई करते, गाड़ियाँ धोते, अक्सर बाथरूम का नल खुला छोड़ देते; लेकिन पानी की कमी कभी नहीं होती थी। किसी को शिकायत नहीं थी।
‘‘अरे भाई, मैं लेट हो जाऊँगा,’’ बत्रा अंकल फिर चीखे।
पर इससे पहले कि आंटी कोई जवाब देतीं, दरवाजे पर मिसेज बहल की आवाज सुनाई दी, ‘‘दीदी, क्या आपके यहाँ पानी आ रहा है ?’’
आंटी का दिल धड़क गया। बाथरूम के अंदर बत्रा अंकल ने सुना तो अज्ञात आशंका से काँप उठे।
आंटी वस्तुस्थिति का जायजा लेने बालकनी की ओर बढ़ आईं। पंप-हाउस के पास भीड़ लगी थी।
‘‘क्या हुआ ?’’ पंप-हाउस की ओर इशारा करते हुए आंटी ने वाचमैन से चिल्लाकर पूछा।
वाचमैन सुन तो नहीं पाया पर इशारा भाँप गया। उसने इशारों में ही सारी बात समझाने की कोशिश की। पर आंटी कुछ समझ पातीं कि निचली मंजिल से डा0 रहमान की आवाज आई, ‘‘मैडम, पंप खराब हो गया है!’’
पंप खराब होने की खबर कालोनी में बाढ़ के पानी की तरह फैल गई। हर तरफ अफरा-तफरी-सी मच गई। सिंह साहब ने कार धोकर कार-वाश लगा रखा था। अब उसका झाग सूखकर दाग छोड़ने लगा था। कपड़ा लेकर झाग पोंछते हुए वह नौकर पर चीख रहे थे।
भंडारी अंकल शेविंग करते समय वाश-बेसिन का नल खुला रखते थे। अभी आधी शेव ही बनी थी कि पानी बूंद-बूंद टपकते हुए चुक गया।
माथुर अंकल आज साफ-सफाई के मूड में थे। सुबह-सुबह पूरे घर की झाड़-पोंछ की थी, जिससे हर कहीं धूल ही धूल हो गई थी। अब धुलाई के लिए हाथ में पाइप पकड़े खुद को कोस रहे थे।
हर कोई परेशान था। बिना नहाए उपाध्याय जी की पूजा छूटी जा रही थी, वर्मा आंटी के कपड़े बिना धुले रह गए थे, कब्बन बाबा का छोटे-से गमले में लगा बड़ा-सा एरीकेरिया सूखा जा रहा था, मिसेज टंडन के घर तो चाय बनाने भर को पानी नहीं था।
‘‘अरे, कालोनी के बाहर लगे हैंड-पाइप से पानी मंगवाओ,’’ बत्रा अंकल बेचारगी से चीखे, ‘‘पप्पू को भेजो! आज ऑफिसर का दौरा है। लेट हुआ तो मुश्किल में पड़ जाऊँगा!’’
बाहर हैंडपंप पर लोगों के साथ-साथ बाल्टियों, मटकों, पीपों और डिब्बे की कतार भी लगी हुई थी।

तभी मिसेज मल्होत्रा भीड़ को चीरती हुई आगे आईं और बोलीं, ‘‘हटो-हटो! लेडीज को पहले पानी लेने दो!’’
‘‘नहीं-नहीं, जरूरतें सबकी बराबर हैं। बिना लाइन में लगे किसी को पानी नहीं मिलेगा!’’ कोई चीखा।
‘‘हां-हां, बिल्कुल सही!’’ भीड़ ने जोरदार हाँमें हाँमिलाई।
भीड़ के हंगामे पर मिसेज मल्होत्रा सिटपिटा गईं। वह घबराकर सड़क के उस पार, लाइन के अंत में, जाकर लग गईं।
‘‘अरे, देखो-देखो! डा0 साहब दूसरी बाल्टी भर रहे हैं।’’ एक ने चिल्लाकर कहा।
 ‘‘अजी, सबको जल्दी है! काम पर सबको जाना है। जिसे एक बाल्टी से ज्यादा भरना हो वह दोबारा लाइन में लगे।’’ भीड़ में शोर मचने लगा।
डा0 रहमान दूसरी बाल्टी आधी खाली लेकर खिसियाते हुए हट गए।
गौतम अंकल अपना पीपा छोड़कर थोड़ी देर के लिए हटे ही थे कि उनकी जगह वर्मा जी आकर खड़े हो गए। गौतम अंकल की भौंहें तन गईं। बात बढ़ गई। तू-तड़ाक होने लगी। भीड़ शोर मचाने लगी। उन्हें रोकने के बजाए सब तमाशबीनों की तरह मजा लेने लगे। सयाने लोग लाइन तोड़कर नल की ओर भागे।
तभी शर्मा अंकल का लड़का राजेश, दस लीटर का पानी भरा पीपा मोटर सायकिल की हैंडिलों के बीच रखकर लाता दिखाई दिया। भीड़ उत्सुक हो उठी। ‘‘कहां से लाए ?’’, ‘‘कैसे मिला ?’’, ‘‘पास है कि दूर ?’’--तमाम तरह के सवाल उछलने लगे।
राजेश गर्व से सिर तानकर बोला, ‘‘रज्जब की नर्सरी में ट्यूबवेल चल रहा है। वहीं से लाया हूँ। यहाँ लाइन में भला कौन लगता ?’’
‘‘अरे, सिंह साहब, कार निकालिए,’’ सहाय अंकल बोले, ‘‘चलिए, हम लोग भी चलकर वहीं से ले आते हैं। वर्ना, आज तो अटेंडेंस-रजिस्टर पर लाल क्रास लगा जानिए।’’
‘‘नहीं भाई, जितने का पानी नहीं उससे ज्यादा का पेट्रोल फुँक जाएगा। मेरा नंबर तो वैसे भी आने वाला है।’’
‘‘मक्खीचूस!’’ सहाए अंकल बुदबुदाए। अगल-बगल के लोग मुस्करा दिए।
एक-एक करके लोग पानी भरते जा रहे थे, पर लाइन थी कि खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी।
‘‘‘‘सब गलती इस कमबख्त मंडल की है!’’ मिर्जा रशीद धोबी का गुस्सा गधे पर उतारते हुए बोले, ‘‘अभी तक पंप ही नहीं ठीक कर पाया!’’
‘‘हाँ-हाँ, बिल्कुल! इसे पहले से चेक करते रहना चाहिए था। गलती इसी की है।’’ भीड़ ने सुर में सुर मिलाया।
‘‘बिना सख्ती के यह ठीक नहीं होगा।’’
‘‘हां-हां, चलो, उसे दुरुस्त करते हैं।’’
भीड़ पंप-हाउस की ओर बढ़ चली। लोगों की चीख-चिल्लाहट सुनकर, हाथ में पेंचकस हथौड़ी लिए, तेल और कालिख में सना, हरखू मंडल बाहर आया और बोला, ‘‘आप लोग शांत हो जाइए। पंप ठीक हो गया है।’’
लोग खुशी से उछल पड़े। क्षण भर में खबर फैल गई। लोग तत्काल अपने फ्लैटों की ओर भागे।
थोड़ी ही देर में कालोनी में फिर से नियमित दिनचर्या शुरू हो गई। सिंह साहब ने कार को रगड़-रगड़कर साफ करना शुरू कर दिया। भंडारी अंकल ने वाश-बेसिन का पाइप पूरा खोल दिया और शेविंग करने लगे। माथुर अंकल फर्श पर भर-भर बाल्टी फेंकने लगे।
रुके हुए सारे काम फिर से शुरू हो गए।

उधर एक चिथड़े से अंगुलियों की कालिख पोंछते हुए हरखू सोच रहा था, ‘कालोनी का पंप खराब हुआ तो फिर से बन गया। पर कभी इस धरती का पंप खराब हो गया   तो...?’

7 टिप्‍पणियां:

  1. बेहद प्रभावी एवं रोचक रचना... पर कभी इस धरती का पम्प ख़राब हो गया तो अम्बर पानी देगा। मेरे पोते का ये जवाब है अशरद भाई... अब क्या कहे?

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    1. वाह, अच्छा सवाल है। आजकल के बच्चे बहुत होशियार हैं। आपके पोते को मेरा बहुत सा प्यार और ढेर सारी दुआएं। ...उससे कहिएगा कि अंबर भी तो पानी धरती से ही लेता है।

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन पथप्रदर्शक एवं प्रेरणापुंज डॉ० श्यामाप्रसाद मुखर्जी - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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