मंगलवार, 5 मार्च 2019

वतन की पुकार


(अहमद नगर का राज्य। दरबार लगा हुआ है। चाँदबीबी अपने दरबारियों के साथ बैठी हुई हैं। उनके चेहरे पर शोक की छाया विद्यमान है। दरबारियों के सिर झुके हुए हैं। कुछ क्षणों के बाद वज़ीर उठकर बोलता है।)

वज़ीर   : बेगम साहिबा, हुज़ूरे-आला की जन्नत-परवाज़ के बाद सारी रिआया अफ़सोस में डूबी हुई है। अपने नेक, ईमानदार और इंसाफ़पसंद सुल्तान की याद में लोगों ने खाना-पीना तक छोड़ दिया है। सड़कों पर सन्नाटा छाया हुआ है। सब अंधेरे में बैठे आँसू बहा रहे हैं।
चाँदबीबी  : ख़ुदा की मरज़ी पर किसका बस चला है....! आदमी सपने सजाता है, उम्मीदें पालता है, पर क़िस्मत में क्या लिखा है यह तो ख़ुदा ही जानता है। (गहरी साँस लेते हुए एक पल  ठहरकर) ...लेकिन वह जो करता है, सही करता है। उसकी रज़ा में ही अपनी रज़ामंदी होनी चाहिए।
वज़ीर   : जी, बेगम साहिबा, आप दुरुस्त फ़रमाती हैं। पर इंसान है तो उसकी कमज़ोरियाँ भी रहेंगी। वह फ़रिश्ता नहीं हो सकता। अपने अज़ीज़ के बिछड़ने का रंज इतनी जल्दी दिल से नहीं निकाला जा सकता।
चाँदबीबी  : लेकिन दिल का रंज हमारी भूख पर क़बिज़ नहीं हो सकता। हमारी प्यास को नहीं मिटा सकता। दुनिया के कारोबार तो चलते ही रहते हैं। बीते हुए कल की याद में आने वाले कल को नहीं भुलाया जा सकता। राज्य में सब वैसे ही चलते रहना चाहिए, जैसे था। मैं ख़ुद भी रिआया से मिलूँगी।
वज़ीर  : जी, बेगम साहिबा, ऐसा ही होगा।
चाँदबीबी : सुल्तान के इंतक़ाल के बाद दुश्मनों की निगाहें हम पर लगी हुई हैं। वे सोचते हैं कि एक लाचार और बेवा औरत उनका मुक़ाबला क्या करेगी। पर वे यह नहीं जानते कि औरत में दुनिया को बदल देने की ताक़त है। हिम्मत और बहादुरी सिर्फ आदमियों की  पूँजी नहीं, ज़रूरत पड़ने पर औरत भी जान की बाज़ी लगाकर दुश्मनों के हौसले पस्त कर सकती है।
वज़ीर  : बज़ा फ़रमाती हैं, बेगम साहिबा।
चाँदबीबी : मुग़ल बादशाह अकबर हमसे नाराज़ चल रहे हैं। उनके बार-बार भेजे सुलह और समझौते के प्रस्ताव हमने ठुकरा दिए। हमें होशियार रहना होगा। कमज़ोर और अकेला समझकर वह कभी भी हमला कर सकते हैं। ताक़त के नशे में चूर मुग़ल बादशाह को लगता है कि वे पूरी दुनिया को अपने क़दमों में झुका सकते हैं। पर अभी उनका सामना अहमदनगर के वीरों से नहीं हुआ है। हमारे वीर सिर कटा सकते हैं, पर सिर झुका नहीं सकते।
(तभी सेनापति घबराया हुआ प्रवेश करता है। उसके कंधे झुके हुए हैं, चेहरे पर बदहवासी है। बाहर धीरे-धीरे कोलाहल बढ़ रहा है।)
सेनापति : (हाँफता हुआ) बेगम साहिबा, सलामत रहें। मुग़ल बादशाह की फ़ौज ने हम पर हमला कर दिया है। शहज़ादे मुराद की अगुआई में एक विशाल फ़ौज ने नगर में मार-काट शुरू  कर दी है। लोग बेरहमी से क़त्ल किए जा रहे हैं। घरों को आग के हवाले किया जा रहा है। नगर में अफरा-तफरी मची हुई है।
चाँदबीबी : या ख़ुदा...जिसका डर था, वही हुआ।
सेनापति : हमारे सिपाही अचानक हुए इस हमले से घबरा गए हैं। विशाल फ़ौज देखकर उन्होने हिम्मत छोड़ दी है।
चाँदबीबी : हिम्मत छोड़ दी है..? (क्रोध मिश्रित आश्चर्य से) सेनापति, यह मैं आपके मुँह से सुन रही हूँ? अहमदनगर का एक जाँबाज़ ऐसा कह रहा है? याद रखिए, ग़ुलामी की ज़िंदगी में  बार-बार मरने के मुक़ाबले, आज़ादी में एक बार मरना ज़्यादा अच्छा होता है। एक बहादुर मौत की आँखों में आँखें डालकर जीता है। (दरबारियों की ओर घूमकर) और फिर हम तो हक़ की राह पर हैं। इंसाफ़ और सच्चाई की जंग में तो फ़रिश्ते भी मदद को उतर आते हैं। फिर हम ना उम्मीद क्यों हों? अहमदनगर की इस धरती को हमने अपने लहू से सींचा है, पसीने से लहलहाया है। अपनी इस पाक सरज़मीन को क्या दुश्मन के पैरों तले यूँ ही रौंद जाने देंगे? क़सम खाइए कि जब तक हमारे जिस्म में लहू का एक भी क़तरा बाक़ी है, सीने में एक भी साँस बची है, हम अपनी आज़ादी के लिए लड़ते रहेंगे।
सेनापति  : (उत्साहित होकर) बेगम साहिबा, हम आपको वचन देते हैं कि सिर क़लम भले हो जाए, मैदाने-जंग से हमारे क़दम पीछे न हटेंगे।
 (दरबारी बेगम साहिबा ज़िंदाबाद!’, ‘अहमदनगर ज़िंदाबाद!के नारे लगाते हैं।)

दूसरा दृश्य
(चाँदबीबी सैनिकों की वेश-भूषा में टहल रही हैं। चेहरे पर बेचैनी के भाव हैं। नेपथ्य से चीख़-पुकार और धमाकों की आवाज़ें आ रही हैं।)
चाँदबीबी : इतनी बड़ी फौज! इतने सिपाही! आज तलवारों की चमक से आँखें चुँधियाती हैं। तीरों से आसमान ढँका जाता है। तोप के गोले कानों को बहरा किए दे रहे हैं। (व्यंग्य से हँसती है) एक छोटी-सी रियासत का इतना ख़ौफ़, कि मुग़ल बादशाह ने अपनी पूरी ताक़त लगा  दी? इतनी ना-उम्मीदी कि जिगर के टुकड़े शहज़ादे को ही जंग में झोंक दिया? (एकाएक चेहरे के भाव बदलते हैं) लेकिन मुग़ल बादशाह, यह मत भूलिए कि ज़िंदगी और मौत,  जीत और हार सब ख़ुदा के हाथ है। अपनी ताक़त का इतना घमंड न करिए। ख़ुदा ने  चाहा तो आप ही नहीं, इतिहास भी इस जंग से सबक़ हासिल करेगा।
 (तभी सेनापति घबराया हुआ प्रवेश करता है।)
सेनापति  : बेगम साहिबा...सलामत...रहें।
चाँदबीबी  : क्या हुआ आप इतने घबराए हुए क्यों हैं?
सेनापति  : बेगम साहिबा, ग़ज़ब हो गया। तोप के गोलों से क़िले की एक दीवार ढह गई है। अब हम दुश्मनों को ज़्यादा देर तक नहीं रोक सकते।
चाँदबीबी : (दृढ़ता से) कोई बात नहीं। क़िले की दीवार गिर गई तो क्या, उनके आगे सैनिकों की दीवार खड़ी कर दो। जी जान लगा दो। अगर हम उन्हें आज की जंग ख़त्म होने तक रोक सके, तो ख़ुदा ने चाहा हमारा कुछ नहीं बिगड़ेगा। इस बीच हमारे कारीगर नई दीवार खड़ी कर देंगे। नगर के सारे राजगीरों को काम पर लगा दीजिए।
सेनापति  : जो हुक्म, बेगम साहिबा। ऐसा ही होगा।
 (जाता है। उसके जाते ही वज़ीर घबराया हुआ प्रवेश करता है।)
चाँदबीबी  : क्या हुआ? आप इतने परेशान क्यों हैं?
वज़ीर   : बेगम साहिबा, शहज़ादे मुराद ने यह देखकर कि तीर-तलवारों से अहमदनगर के बहादुरों  का बाल भी बाँका नहीं किया जा सकता है, उसने नई चाल चली है।
चाँदबीबी  : (बेचैनी से) नई चाल! वह क्या?
वज़ीर   : उसने शिया और सुन्नियों को आपस में लड़ाकर सुन्नियों को अपने पक्ष में मिलाना शुरू कर दिया है।
चाँदबीबी : (चेहरे का तनाव ढीला पड़ता हुआ) फ़िक्र मत कीजिए, वज़ीरे-आला, यक़ीन रखिए अहमदनगर का बच्चा भी इस बहकावे में नहीं आनेवाला। वह जानता है कि जब वतन पर ख़तरे के बादल मँडरा रहे हों तो न कोई हिंदू रह जाता है, न मुसलमान; न शिया रह जाता है, न सुन्नी। वतन की पुकार पर धर्म और मज़हब के भेद मिट जाते हैं। इस वक़्त हमारी क़ौम, हमारा मज़हब सिर्फ एक है। आप शिया और सुन्नी उलेमाओं को बुलाइए। मैं उनको समझाती हूँ।
 (वज़ीर जाता है। दूसरी तरफ से सेनापति का प्रवेश)
सेनापति   : (प्रसन्नता से) बेगम साहिबा सलामत रहें।
चाँदबीबी   : (उत्सुकता से) क्या ख़बर है, सेनापति?
सेनापति   : मुग़ल सेना के पैर उखड़ने लगे हैं। उनके खेमे में बदहवासी फैल रही है। वे ना उम्मीद होने लगे हैं। अल्लाह ने चाहा तो जीत अब हमसे दूर नहीं है।
चाँदबीबी   : (दोनों हाथ ऊपर उठाकर) परवरदिगार, तूने आज एक बार फिर दिखा दिया कि दुनिया की बड़ी से बड़ी से ताक़त सच्चाई का सिर नहीं झुका सकती।
 (बाहर रानी बेगम ज़िंदाबाद’, ‘अहमदनगर ज़िदाबादका शोर धीरे-धीरे बढ़ता जाता है।)

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