Saturday, 11 October 2014

ऐसे मनाई गई रामलीला


जब हर कहीं रामलीला समाप्त हो जाती है, तब बच्चों की असली रामलीला शुरू होती है। पतली कमची को मोड़कर दोनों सिरे धागे से बाँध लिए, धनुष तैयार हो गया। पतली-पतली सिरकियाँ ले लीं, बाण बन गए। बस, सेना लेकर निकल पड़े लंका-विजय के लिए।

यही हाल काशीपुर का था। इधर गाँव की रामलीला के मजीरे थमते, उधर बच्चों के आलाप शुरू हो जाते। गाँव भर से चंदा वसूला जाता। कहीं से तखत जुटाए जाते। वेश-भूषा का इंतजाम किया जाता। साज-सजावट इकट्ठा की जाती और चौपाल के चबूतरे पर सरेशाम रामलीला शुरू हो जाती।
संवाद तैयार करने का काम हरीराम और भगवान दास के जिम्मे था। सुरपती बिना बुलाए अपना हारमोनियम लेकर हाज़िर हो जाता। गाँव की रामलीला में उसे कोई पूछता नहीं था, इसलिए सारी इच्छा बच्चों की रामलीला में ही पूरी कर लेता था। आख़िर थी तो रामलीला यह भी।
हरीराम और भगवान दास इंटर में पढ़ते थे। रोज़ शहर का आना-जाना था। पढ़ने-लिखने में तेज़ थे। अध्यापकों की भी कृपा थी। दोनों मिलकर ऐसे संवाद लिखते कि सभी निहाल हो जाते।
गाँव के कुछ लोग जहाँ खुले हृदय से बच्चों के प्रयास की प्रशंसा करते, वहीं कुछ लोग भीतर ही भीतर कुढ़ते भी थे। सबसे बड़े विरोधी थे लच्छू पांडे, यानी पं0 लक्ष्मी नारायण पाँडे। जब बच्चों की रामलीला शुरू होती, तो उनका भी काम शुरू हो जाता। चौराहे पर, चाय के ढाबे पर या पान की गुमटी पर, जहाँ कहीं दो आदमी जुटते लच्छू पाँडे शुरू हो जाते, ‘‘कलयुग आ गया है, कलयुग। ये कल के लड़के, चले हैं भगवान् बनने। दिन में बीसों पाप करते हैं। सैकड़ों झूठ बोलते हैं। ये धरेंगे भगवान का भेस। नाश हो इनका।’’
लोग मुँह छिपाकर मुस्करा देते। कोई मसखरा हुआ तो कह बैठता, ‘‘पंडित जी, बच्चे तो भगवान का रूप कहे जाते हैं। उन्हें गालियाँ देकर नाहक नरक के भागी बनते हो।’’
लच्छू पांडे बिदक उठते जैसे बर्र ने काट खाया हो। त्योरियाँ तन जातीं। चुटिया लटकने-झटकने लगती। थुलथुल तोंद डोलने लगती। ऐसी-ऐसी मुद्राएँ बनाते कि देखने वाले लोटपोट हो जाते।
लच्छू पाँडे जितना चीखते, लोग उतना ही हँसते। उनकी करतूत लोगों से छिपी नहीं थी। सबको पता था कि आठ घंटे भगवत्-भजन करने वाले पांडे जी मंदिर के फर्श पर कोयले से गेहूँ-चावल की बोरियों का हिसाब करते हैं। पूजा-पाठ तो सिर्फ बहाना है।
दूसरी ओर गाँव के ही कुछ लोग बच्चों के काम से बहुत ख़ुश होते। इनमें थे प्राइमरी स्कूल के मास्टर दीनानाथ जी और होम्योपैथ के डाक्टर रफ़ीक़ुल्ला ख़ाँ साहब। तखत, कुर्सियाँ, पहनने-ओढ़ने की सामग्री आदि तो ये लोग तो देते ही थे, चंदा देने में भी सबसे आगे रहते। इन सब लोगों द्वारा रामलीला में रुचि लेने का कारण भी था। बच्चे अपनी रामलीला में कुछ ऐसी बातें शामिल कर लेते थे जो अनपढ़ गाँव वालों के लिए बहुत फायदे की साबित होती थीं। जैसे लक्ष्मण-मूर्च्छा के प्रसंग में राम का पार्ट अदा करने वाला हरीराम बड़ी कुशलता से चिकित्सा के फायदे गिना जाता जो झाड़-फूँक में फँसे गाँववालों के मन पर गहरा असर करतीं। इसी तरह कभी प्रधान जी की पोल खोली जाती, तो कभी पटवारी की। लच्छू पाँडे की गत तो हर साल बनती थी। गाँववाले देख-देखकर दोहरे हो जाते।
गाँव का हर आदमी चंदे में कुछ न कुछ ज़रूर देता था। चाहे एक कटोरी गेहूँ ही क्यों न हो। आगे-आगे कापी-क़लम लेकर हरीराम और भगवानदास रहते और पीछे-पीछे गाँव भर के बच्चों का झुंड। तीन साल के मैकू से लेकर पोलियो में एक टांग गँवा चुका परमू तक। पैसा मिलता तो भगवानदास अपने पास रख लेता और अनाज मिलता तो पट्टू, बिरजू, रमेसर आदि अपनी झोलियाँ आगे कर देते। हरीराम तत्परता से कापी में नोट करता जाता। गाँव भर चंदा देने में ख़ुशी महसूस करता। बस, जान सूखती तो सिर्फ लच्छू पांडे की। ज्यों ही लड़कों का झुंड देखते, चेहरे का रंग उड़ जाता। मना तो नहीं कर पाते, लेकिन जो भी देते बड़ी कठिनाई से; और तमाम बहानेबाज़ियों के बाद। और देते भी क्या, कभी एक कटोरा कंकड़ मिली दाल, कभी घुन लगा गेहूँ। पैसे तो शायद ही कभी दिए हों। लड़कों को जो मिल जाता उसी में संतोष करते। ऊपर से वे भले ही दस बातें पकड़ाते, पर अंदर ही अंदर अपनी जीत पर फूले न समाते।
इस बार भी रामलीला की तैयारियाँ ज़ोर-शोर से शुरू हो गईं थीं। सुबह से ही चौपाल के चबूतरे पर तखत डाल दिए गए थे। जिसके हाथ जो काम लगा उसी में जुटा हुआ था। कोई घड़ा भर-भरकर तखत धोए जा रहा था, तो कोई मैदान साफ करने के बहाने धूल का बवंडर उड़ा रहा था। कोई चौपाल के जाले साफ कर रहा था, तो कोई दीवारों पर से गोबर के ठप्पे छुड़ा रहा था। काम से ज़्यादा शोर मच रहा था। कोई टूटा-फूटा भजन गाए जा रहा था, कोई काम बिगड़ जाने से दूसरे पर अपनी खीझ उतार रहा था। छोटे बच्चों के लिए यह किसी खेल से कम न था। शोर मचाते, धूल उड़ाते सबके बीच से होकर दौड़े जा चले रहे थे।
हरखू चौकीदार की कोठरी सजने-सजाने का स्थान बनाई गई। पैसे ज़्यादा इकट्ठा हुए नहीं थे इसलिए पिसा कोयला, सिंदूर, गेरू और संजरावट जैसी चीजें ही श्रृंगार-साधन के रूप में जुटाई गई थीं। फिर भी लाल मुखवाली वानर-सेना और काले पुते चेहरोंवाले राक्षसों को देखकर बच्चे तो क्या बड़े भी खिल उठते थे। मास्टर दीनानाथ सधे हाथों से दफ्ती पर रावण के दस चेहरे बनाकर काट लेते थे। फिर बड़े करीने से उन्हें रावण के मुकुट से चिपका या बाँध दिया जाता था। देखने वालों को लगता कि सचमुच दशानन रावण चला आ रहा हो।
रावण का पार्ट भगवानदास अदा करता। उसका लंबा-तडंगा गठीला शरीर और गरजती आवाज लोगों को ख़ूब प्रभावित करती। राम का पार्ट हरीराम निभाता था। सीता का पार्ट बिरजवा अदा करता। एक तो उसकी आवाज बड़ी महीन थी, दूसरे उसकी मूँछें भी नहीं आईं थीं। ऊपर से अभिनय इतना अच्छा करता कि लोग तालियाँ बजाए बिना न रहते।
शाम होते-होते मंडली सज गई। भगवानदास हाथ को माइक जैसा बनाकर सबको शांत बैठने की प्रार्थना कर रहा था। महिलाओं की टोली थोड़ी दूर पर नीम के पेड़ के नीचे जुटी, जहाँ हल्का अँधेरा था। यह स्थान ऊँचा भी था। यहाँ बड़ी आराम से रामलीला दिखती थी। बस, बुधना चाची और रामदेई बुआ बार-बार अपना चश्मा सही कर रही थीं। उन्हें दिखाई कम पड़ता था, इसलिए समझ में भी कम आता था। बग़लवाली को बार-बार कोहनी मारकर पूछती रहतीं। यही कारण था कि वे या तो टोली के बिल्कुल आगे रहतीं या पीछे छूट जातीं। उनके बगल में बैठने का साहस कौन करता? उन्हें समझ में नहीं आता था, तो श्रद्धा से ही तृप्त हो जाती थीं, लेकिन दूसरा अपना आनंद धूल में क्यों मिलाता?
छोटे बच्चे और बुज़ुर्ग दरी पर सबसे आगे बैठे थे। कुछ लोगों के लिए कुर्सियाँ आईं थीं। कुछ लोग बैठने की जगह होने के बावजूद पीछे खड़े थे।
रामलीला शुरू हुई। सूत्रधार बना सुरपती। चेलों सहित साज-सामान लेकर आ बैठा। अपनी मोटी और बेताल आवाज़ में लगा स्वर आलापने। बीच-बीच में ‘‘हाँ भाइयो-बहनो, साँती से सुनिए!’’ कहता जाता था।
पहले दिन नारद-मोह, रावण-अत्याचार और पृथ्वी-व्यथा के प्रसंग खेले गए। शुरूआती दिनों में तो बहुत कुछ अटपटा-सा रहा, पर धीरे-धीरे गति आती गई। राम-जन्म, राम-जानकी मिलन, वन-गमन, दशरथ-मरण आदि प्रसंग जैसे-जैसे खेले जाते गए, लोगों की रुचि बढ़ती गई। बच्चों को ही नहीं बड़ों को भी अगले दिन का इंतज़ार रहने लगा।
 कुंभकरण और मेघनाथ-वध वाले दिन तो लोगों का खूब मनोरंजन हुआ। कुंभकरण न था, लच्छू पांडे का ही प्रतिरूप था। भगवानदास ने हाथ-पैर जोड़कर गरीबे चाचा को मनाया था कुंभकरण का पार्ट लेने के लिए। वैसी ही तोंद, वैसी ही मूँछें, वैसी ही चाल-ढाल और हरकतें देखकर लोगों का हँसते-हँसते बुरा हाल हो गया।
लच्छू पांडे बाहर आकर भले ही रामलीला नहीं देखते थे, पर खिड़की के पीछे से नज़र ज़रूर रखते थे। यह देखकर क्रोध के मारे उनका बुरा हाल था। कमरे में बौराए साँड-से फुँफकारते टहल रहे थे। लेकिन विवश थे, कुछ कर भी नहीं सकते थे। उधर लोग खुलकर ठहाके लगा रहे थे।
आख़िरी दिन रावण जलाया गया। रावण जलाते समय बड़े-बूढ़ों और महिलाओं की टोली तो नहीं थी, हाँ पड़ोसी गाँवों के बच्चे ज़रूर जुट आए थे। दो-एक गुब्बारे, चाट और रेवड़ी वाले भी आ धमके थे।
भरत-मिलाप और राजतिलक के लिए रथ की ज़रूरत आन पड़ी। युद्ध-भूमि में भले ही राम और रावण पैदल लड़े पर अब रथ ज़रूरी हो गया था। गाँव भर में शोभा-यात्रा जो निकलनी थी। लेकिन गाड़ी सिर्फ लच्छू पांडे के पास थी। वह गाड़ी से अनाज की बोरियाँ मंडी पहुँचाया करते थे। लड़के निराश हो गए कि लच्छू पांडे से तो गाड़ी मिलने से रही। लेकिन गाड़ी मिले बिना भी काम नहीं बननेवाला था।
अचानक हरीराम को एक उपाय सूझा। उसने झटपट जटाएँ बाँधीं, कंधे पर तरकश लटकाया, धनुष लिया और लच्छू पाँडे के घर की ओर कदम बढ़ा दिए। लड़कों का झुंड पीछे-पीछे साथ हो लिया।
दरवाजे पहुँचकर हरीराम ने आवाज लगाई, ‘‘विप्रवर, हमें दर्शन देकर धन्य करिए।’’
लच्छू पांडे त्योरियाँ चढ़ाए बाहर निकले। देखा तो सामने साक्षात् भगवान् राम खड़े हैं।
‘‘विप्रवर, एक आवश्यकता आन पड़ी है।’’
लच्छू पांडे का मुँह सूख गया कि चंदा तो ले गए थे अब कौन-सी आवश्यकता आ पड़ी।
‘‘हमें आपकी गाड़ी चाहिए।’’
लच्छू पांडे उछल पड़े, ‘‘नहीं मिलेगी, नहीं मिलेगी। बिल्कुल नहीं मिलेगी।’’
भगवानदास ग़ुस्सैल स्वाभाव का था। तनकर सामने आ गया। लड़कों के झुंड में भी खुसर-पुसर शुरू हो गई। स्थिति बदलते देख लच्छू पांडे ने फौरन अपना लहजा बदल दिया, ‘‘देखो भगवानदास बेटा, गाड़ी देने में कोई एतराज़ नहीं है। पर क्या है कि गाड़ी के पटरे थोड़ा कमज़ोर हैं। एक पहिया भी ढचर-ढचर करता है। अब बताओ भला, राम जी की सवारी निकले और बीच रास्ते में एक पहिया निकल जाए तो, कितना बुरा लगेगा। है कि नहीं हरीराम बेटा?’’
‘‘हम मरम्मत कर लेंगे। आप हाँ तो कहें, ’’ हरीराम बोला।
‘‘अरे, हाँ कैसे कहें बेटा! गाड़ी पर अनाज की बोरियाँ लदी हैं। उन्हें उतारना कोई आसान बात है क्या?’’ लच्छू पांडे ने बहाना गढ़ा।
‘‘उसकी चिंता मत करिए। वह हम लोग उतार लेंगे,’’ भगवानदास बोला।
‘‘अरे ऐसे कैसे उतार देंगे? पूरा हिसाब करके, नाप-तौल करके चढ़ाया गया है। सब इधर-उधर हो जाएगा कि नहीं।’’ अब तक अपने को संभाले लच्छू पांडे बिदक उठे।
‘‘तो इसका मतलब आप गाड़ी नहीं देंगे?’’ हरीराम की भौहें तन गईं।
‘‘नहीं देंगे...’’ लच्छू पांडे ने लगभग चीख़कर कहा।
‘‘तो जाओ, मैं तुम्हें शाप देता हूँ,’’ हरीराम ने क्रोधित होकर कहा, ‘‘जिन बैलों से तुम अपनी गाड़ियाँ खींचते हो उनकी सींगें गायब हो जाएँ।’’
‘‘हुँह...’’ लच्छू पांडे ने उपेक्षा से कहा और भीतर चले गए। लड़कों का झुंड वापस लौट गया।
लच्छू पांडे बड़बड़ा रहे थे, ‘‘बड़े आए शाप देने वाले। भेस बना लिया तो ख़ुद को भगवान ही समझने लगे। नाश हो इनका।’’
पर लच्छू पांडे थे कमज़ोर दिल के। अंदर ही अंदर डर रहे थे कि सचमुच बैलों की सींगें ग़ायब हो गए तो? गाँव भर में हँसी होगी। बड़ी देर तक असमंजस में फँसे चहलक़दमी करते रहे। आख़िरकार उनसे न रहा गया। दरवाज़ा खोलकर बाहर झाँका। साँझ का झुटपुटा घिरने लगा था। मैदान में सन्नाटा छाया हुआ था। गोठान में, जहाँ बैल बँधते थे, घना अँधेरा छा गया था। पर उनकी आदत थी। अंदाज़ से बैलों के पास पहुँच गए। बड़े प्यार से जैसे ही एक बैल के माथे पर हाथ फेरा कि जी धक् से रह गया। उसकी सींगें ग़ायब थीं। बदहवासी में दूसरे बैल के माथे पर हाथ फिराया। दूसरे की सींगें भी ग़ायब थीं। लच्छू पांडे चीख़ते हुए बाहर की ओर भागे। बाहर निकलकर सिर पीट-पीटकर चीख़ने लगे। गाँव भर इकट्ठा हो गया। लच्छू पांडे बेसुरी आवाज में चिल्लाए जा रहे थे, ‘‘अनर्थ हो गया, अनर्थ। मुझसे कितना बड़ा पाप हो गया। हे भगवान, अब मैं क्या करूँ। मुझे क्षमा करो भगवान...’’
सारी बात जानकर मास्टर दीनानाथ ने लच्छू पांडे को जाकर क्षमा माँगने का सुझाव दिया। लच्छू पांडे गाड़ी लेकर गिरते-पड़ते, हाँफते-थरथराते चौपाल तक जा पहुँचे। हरीराम उसी वेश-भूषा में चौपाल के चबूतरे पर बैठा था। लच्छू पाँडे उसके चरणों में गिर पड़े, ‘‘मैं पापी हूँ, नीच हूँ, अधमी हूँ भगवान। मुझे क्षमा करो। मुझसे भारी भूल हुई। मैं गाड़ी ले आया हूँ। मेरी भूल क्षमा करो, दयानाथ।’’
हरीराम ने उन्हें प्यार से उठाते हुए कहा, ‘‘सुबह का भूला अगर साँझ को वापस आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते।’’ हरीराम ने क्षण भर के लिए आँखें बंद कीं और पुनः कहा, ‘‘जाओ, तुम्हारी भूल क्षमा की जाती है। बैलों के सींग वापस आ जायेंगे।’’
लच्छू पांडे पुलकित हो गए। भगवान की चरण-धूलि लेकर सीधे गोठान की ओर भागे। अभी वह दस कदम दूर ही थे कि उन्होंने गोठान से दो गधों को भागते देखा। उनके पीछे-पीछे भगवानदास निकलता दिखाई दिया। उन्हें सारी बात समझते देर न लगी। क्रोध के मारे तन-बदन में आग लग गई। पर अब बाजी हाथ से जा चुकी थी। रथ सजाया जा रहा था।
लच्छू पांडे दरवाज़े पर बैठे देर तक लड़कों को कोसते रहे। उधर राम की शोभा-यात्रा ख़ूब धूमधाम से निकली। सारा गाँव शामिल हुआ, सिवा लच्छू पांडे के।

Friday, 26 September 2014

रावण और हनुमान

एक थे संकटा प्रसाद जी। गांव की रामलीला में वह हमेशा रावण का रोल करते थे। लंबा-चौड़ा शरीर, बड़ी-बड़ी आँखें, भरी-भरी मूँछें। जब उन्हें सजा-बनाकर खड़ा किया जाता तो वह सचमुच रावण से कम न लगते।

   संकटा प्रसाद जी थोड़े मंदबुद्धि के थे। बातों को थोड़ा देर से समझते थे। इसके कारण उन्हें अक्सर हँसी का पात्र बनना पड़ता था। अपने संवादों को वह खूब रटकर रखते थे, लेकिन अगर उसमें थोड़ा भी हेर-फेर हो जाए तो बात उनके सँभाले न सँभलती थी। बोलना चाहते कुछ और मुँह से निकलता कुछ। कभी-कभी तो ऐसी बातें बोल जाते कि सुनने वाले लोटपोट हो जाते।
   रामलीला के आयोजक उन्हें महीनों पहले संवादों के पुलिंदे थमा देते थे। पाँचवीं पास संकटा प्रसाद जी अटक-अटककर पढ़ते और दिन भर दुहरा-दुहराकर याद करते रहते। संवाद याद करने में वह इतने मगन हो जाते कि भूल जाते वह अपनी छोटी-सी दूकान में बैठे हैं। दूकान उनके लिए लंका बन जाती और वह लंकेश्वर।
   एक दिन संकटा प्रसाद जी अपने आप में डूबे संवाद याद कर रहे थे कि ससुराल से उनका नाई, जिसका नाम हनुमान था, आ पहुँचा। दीवाली नजदीक थी। सासू जी ने त्योहारी भिजवाई थी।
   नाई थोड़ी देर प्रतीक्षा में खड़ा रहा कि संकटा प्रसाद जी कुछ कहें। पर वह क्या कहते? वह तो आँखें बंद किए दूसरी ही दुनिया में खोए हुए थे। खाँसने-खँखारने से भी काम न चला तो नाई ने धीरे से आवाज दी, ‘‘दामाद जी!’’
   संकटा प्रसाद जी उस समय लंका कांड के संवाद याद कर रहे थे। हनुमान ने सारी अशोक वाटिका तहस-नहस कर दी थी और अब मेघनाथ उन्हें नागपाश में बांधकर दरबार में लाया था। रावण पूछ रहा था, ‘‘रे शठ! तू कौन है ?’’
नाई को कुछ समझ में न आया। वह बेचारा घबरा गया। कहाँ तो वह सोचकर आया था कि खूब खातिरदारी होगी, तर माल खाने को मिलेगा, भेंट-उपहार मिलेंगे, पर यहाँ तो सारा दृश्य ही बदला हुआ था। संकटा प्रसाद जी लाल-पीली आँखों से उसे घूर रहे थे और पूछ रहे थे, ‘‘रे शठ तू कौन है ?’’ नाई घबरा गया और हड़बड़ाकर बोला, ‘‘मैं हनुमान हूँ, सरकार!’’
   हनुमान का नाम सुनते ही जो कसर बची थी वह भी खत्म हो गई। संकटा प्रसाद जी पूरे के पूरे लंका नरेश हो गए। उन्होंने अट्टहास लगाकर कहा, ‘‘हे मेघनाथ, इस कपि को क्या दंड दिया जाए ?’’
   नाई ने समझा कि मेघनाथ इनके किसी नौकर का नाम है। जब नाम ही पहलवान जैसा है तो वह खुद कैसा होगा। नौकर होते भी बड़े निर्दयी हैं। पा गया तो बहुत धुलाई करेगा। यह सोचकर बेचारे नाई की हालत पतली हो गई।
   संकटा प्रसाद जी हवा में हाथ लहराते हुए चीखे, ‘‘कहाँ है मेरी तलवार, चंद्रहास ? अभी इस दुष्ट को खंड-खंड करता हूँ।’’
   अब तो नाई से न रहा गया। उसने पोटली उठाई और सिर पर पैर रखकर भाग निकला। संकटा प्रसाद जी ने उसे भागता देखा तो चीखे, ‘‘सैनिकों, पकड़ो इस धृष्ट को! भागने न पाए।
   लेकिन सैनिक तो थे नहीं जो उनके आदेश का पालन करते। वह खुद ही उसके पीछे-पीछे दौड़ पड़े। आगे-आगे नाई और पीछे-पीछे संकटा प्रसाद जी, हाथों में अदृश्य तलवार लहराते हुए।
   नाई को गाँव के गलियारों का अंदाजा तो था नहीं, वह भागता-भागता तालाब की ओर निकल आया। अब वह बुरा फँसा। जाए तो जाए कहाँ ? एक तरफ कुआँ तो दूसरी तरफ खाई। आगे कीचड़ और दलदल से भरा तालाब था तो पीछे संकटा प्रसाद जी दौड़े चले आ रहे थे। नाई को लगा बचना संभव नहीं है तो ‘अरे राम! अरे राम!’ कहता हुआ तालाब में कूद पड़ा।
   पीछे-पीछे संकटा प्रसाद जी भी दलदल में समाने वाले थे कि शोर सुनकर गाँववाले उधर आ निकले। उन लोगों ने संकटा प्रसाद जी को पकड़कर झिंझोड़ा तब कहीं उन्हें होश आया।
   गाँव वालों ने बड़ी मुश्किल से नाई को दलदल से बाहर निकाला। बाहर आते ही वह जोर-जोर से रोने लगा। लोगों ने पूछा तो कहने लगा, ‘‘मेरी पोटली तालाब में ही छूट गई।’’
   ‘‘पोटली में क्या था ?’’
   ‘‘मालकिन ने सौगात भिजवाई थी। दामाद जी के लिए कपड़े, मिठाइयाँ और जीजी के लिए गहने। हाय, अब मैं उन्हें क्या मुँह दिखाऊँगा।’’
   यह सुनते ही संकटा प्रसाद जी की सारी खुमारी हिरन हो गई। लेकिन अब हाथ मलकर पछताने के सिवा चारा ही क्या बचा था।   

Sunday, 14 September 2014

यह कहानी नहीं है

‘‘एक राक्षस था। ...लाल-लाल आँखें...बड़े-बड़े दाँत...बिखरे हुए बाल। सूरत ऐसी भयानक कि देखते ही आदमी का ख़ून सफेद हो जाए। एक दिन वह राक्षस नगर में घुस आया। चारों तरफ हाहाकार मच गया। लोग डर के मारे चिल्लाते हुए इधर-उधर भागने लगे। राक्षस सीधा राजमहल में जा घुसा और राजकुमारी को उठा ले गया...’’
‘‘फिर..!’’ हम लोग आश्चर्य से पूछते।
‘‘बालचंद..,’’ तभी अंदर से अब्बा की आवाज़ आती और काका उठ जाते और कहानी हमेशा की तरह अधूरी रह जाती।
बालचंद काका की उम्र सत्तर बरस की रही होगी। वे कहार थे और बचपन से हमारे यहाँ काम करते थे। अम्मी बताती हैं कि जब उन्हें या घर की औरतों को कहीं जाना होता था तो वे डोली उठाकर ले जाते थे।
हालाँकि घर की औरतों का कहीं निकलना कम ही होता था। कभी शादी-ब्याह का मौका हो या ग़मी का, तभी वे बाहर की दुनिया देखती थीं। सिर्फ उतनी ही, जितनी डोली के पर्दे से दिख जाती थी। अम्मी एक बार मख़दूम शाह बाबा का मेला देखने दादी के साथ गईं थीं। वे जब-तब उसके बारे में बताती रहती थीं। तब वे नई-नई ब्याहकर आई थीं। ख़ानदान की परंपरा थी कि घर में किसी का जन्म होता या नई बहू आती तो उसे बाबा की दरगाह पर हाज़िरी दिलाई जाती थी, ताकि उनके आशीर्वाद से उसका जीवन फले-फूले।
पहले जब सालाना उर्स होता था तो बहुत बड़ा मेला लगता था। मैंने ख़ुद अपने बचपन में देखा है। दूर-दूर से सर्कस, काला जादू, ऊँचे-ऊँचे झूले और बड़ी-बड़ी दूकानें आती थीं। लोगों को साल भर मेले का इंतज़ार रहता था।
अम्मी जब भी मेले के बारे में बतातीं तो लगता फिर उसी दुनिया में लौट गई हैं। जब भी उर्स आता और मेला लगता वे हम लोगों को अपनी कहानी सुनाने बैठ जातीं। हालाँकि जिस दौर की बात वे बताती थीं, उससे हमारी कल्पना का तालमेल नहीं बैठ पाता था क्योंकि अब बहुत कुछ बदल चुका था। जहाँ पहले मैदान हुआ करता था, वहाँ अब दूकानें और घर बन गए थे। अम्मी की बातें सुनकर लगता कि वे किसी दूसरी दुनिया की बातें कर रही हैं। उनकी बातों से हम बहुत ऊबते।
अम्मी कभी-कभार मायके जाती थीं। उनका मायका क़स्बे में ही था। बालचंद काका चार कहारों के साथ डोली लेकर जाते थे। अम्मी दिन भर रहतीं। शाम डूबने से पहले उनकी डोली फिर लौट आती।
पर ये बहुत पहले की बात है। ज़माना बदला तो डोली से आने-जाने का चलन ख़त्म हो गया। हमारे घर बुलेट मोटर साइकिल ख़रीदकर आ गई तो डोली एक किनारे रख दी गई। बालचंद काका का काम ख़त्म हो गया। पर उनकी ज़रूरत नहीं घटी। जब तक कुएँ का पानी इस्तेमाल होता रहा, तब तक वे सुबह-सुबह घर का पानी भरते रहे। लेकिन हैंडपंप लगने के बाद उससे भी फुरसत पा गए। अब वे बिल्कुल ख़ाली थे। हर वक़्त कोठी पर मौजूद रहने की मजबूरी भी ख़त्म हो गई। अब वे इधर-उधर आ-जा भी सकते थे। गाँव से बाहर तो शायद ही कभी गए हों। नातेदारी में भी गए उन्हें ज़माना हो गया था। पर वे कहीं नहीं गए। जा भी कहाँ सकते थे? जैसे बेकार हो चुके बूढ़े घोड़े को मुक्त कर देने पर भी वह गाँव-घर छोड़कर नहीं जाता, आस-पास ही मँडराया करता है, वैसे ही वर्षों की बेगारी से मुक्त होने के बाद भी बालचंद काका कहीं नहीं गए। आने-जाने की उनमें न तो इच्छा बची थी, न ही क्षमता। वह दिन भर कोठी के चबूतरे पर, नीम की घनी छाया में लेटे ऊँघते-जागते रहते। कोई मिल जाता तो घंटों उससे बतियाते। अब्बा को कभी छोटे-मोटे काम की ज़रूरत पड़ती तो बीच-बीच में फकार लिया करते। काम निपटाकर बालचंद काका वापस पहुँचते तो मिलनेवाला जा चुका होता। बची रह गई बात काका होठों ही होठों में बुदबुदाते और फिर से लेटकर ऊँघने लगते।
बालचंद काका का बस एक ही शौक था--तीतर पालने का। तीतरों की ‘किटिलों-किटिलों’  हमें बहुत अच्छी लगती। पर हमारी लाख कोशिशों के बाद भी वे बोलते तभी, जब उनकी मर्ज़ी होती। काका उन्हें सुबह-सुबह खेतों की सैर कराने ले जाते। खुली जगह पाकर वे बहुत ख़ुश होते और पंख फैला-फैलाकर भागते। अगर भाग-दौड़ में वे कहीं दूर निकल जाते तो काका ‘ल्हौं-ल्हौं’ कहकर पुकारते और ख़ाली पिंजरा दिखाते, बस वे दौड़े आते और पिंजरे के पीछे-पीछे पंक्ति बनाकर चल पड़ते। हमें बड़ा आश्चर्य होता कि काका ने अपने तीतरों को इतना कैसे सधा रखा है। मौका पाकर वे कहीं भाग क्यों नहीं जाते? काका हँसकर कहते, ‘‘बाबू, अब पिंजरा ही इनका घर है। इसे छोड़कर कहाँ जा सकते हैं भला? इस क़ैद को ही इन्होंने अपनी नियति मान ली है।’’
बालचंद काका की उम्र अधिक हो गई थी, इसलिए उनकी ज़िम्मेदारी अब गोविंद भैया ने संभाल ली थी। गोविंद भैया उनके बड़े बेटे थे। बालचंद काका के तीन लड़के थे। बीचवाले रामसूरत रिक्शा खींचते थे और सबसे छोटे रामदया होठों के ऊपर रेखाएँ फूटते-फूटते सूरत भाग गए थे और वहीं किसी कपड़े की मिल में काम करने लगे थे।
गोविंद भैया मुझे बहुत मानते थे। चूँकि मैं घर में सबसे छोटा था, इसलिए ‘छोटकए’ कहकर पुकारते थे। गोविंद भैया की आदत थी या ज़ुबान में ऐसी कमी कि वे ‘क’ अक्षर को उर्दू के ‘क़ाफ़’ के ढंग पर बोलते थे। हम लोग उनकी ख़ूब हँसी उड़ाते। अब्बा कभी-कभी लोगों से मज़ाक़ में कहा करते, ‘जनाब, हमारे यहाँ काम करनेवाले भी सलीस उर्दू बोलते हैं।’
...और बैठक में क़हक़हा फूट पड़ता।
गोविंद भैया अपना मज़ाक़ बनते देखकर भी गर्व का अनुभव करते। उन्हें लगता कि वे इतने महत्वपूर्ण हैं कि ख़ाँ साहब की बैठक में उनकी चर्चा होती है।
गोविंद भैया बड़े मेहनती थे। अब्बा ने उन्हें खेती-बाड़ी की देखभाल का काम सौंप रखा था। वे पूरी तत्परता के साथ अपना काम करते। सुबह-सवेरे खेतों पर निकल जाते और देर शाम तक लौटते। खेत-मज़दूर कहते कि गोविंद भैया बड़े सख़्त हैं। दम भी नहीं मारने देते। इतनी सख़्ती तो ख़ाँ साहब भी नहीं करते।
बालचंद काका को भी अब्बा ने कुछ खेती दे रखी थी। उसी के गल्ले से उनका खाना-पीना चलता था। आलू की फसल खुदती तो तीनों वक़्त उनके घर आलू ही बनते। चावल की फ़सल होती तो खिचड़ी-तहरी पर दिन कटते और मकई बोई जाती तो कभी भूनकर और कभी नमक में उबालकर वही उनका खाना बन जाती।
गोविंद भैया हमारे खेतों की देख-भाल में ही सारा समय काट देते थे। अपने खेत की उन्हें परवाह नहीं रहती थी। कभी ऐसा भी हुआ कि उनके खेत में पानी ही नहीं लग पाया और नहर चली गई। पर इसका उन्हें कभी अफसोस नहीं हुआ। उल्टे वे गर्व के साथ अब्बा को ये बात बताते। अगर अब्बा प्रसंशा के दो बोल कह देते तो उनका सीना चौड़ा हो जाता।
गोविंद भैया की उम्र बहुत नहीं थी। यही कोई पैंतीस-चालीस रही होगी। पर खाँसते ऐसा कि लगता कोई अस्सी बरस का बूढ़ा खाँस रहा हो। हम लोग बहुत हँसते। गोविंद भैया दम लेकर हाँफते-हाँफते कहते, ‘‘आधी से ज़्यादा उमर तो बीत गई। अब क्या हमेशा जवान ही बना रहूँगा?’’
हम लोग उनकी बात न समझते और कहते ‘भैया, एक बार और खाँसकर दिखा दो।’ गोविंद भैया झूठमूठ खाँसने की कोशिश करते। पर दो-एक बार झूठमूठ के खाँसने के बाद सचमुच उनकी खाँसी शुरू हो जाती।
गोविंद भैया की एक आदत बड़ी मज़ेदार थी। जब उन्हें अपने लिए कोई बात कहनी होती तो वे उसे मध्यम फरुष में कहते थे। कहना होता कि ‘मैं थक गया हूँ’ तो कहते, ‘तुम थक गए हो।’ जिस किसी को यह आदत न पता हो तो वह कुछ का कुछ समझ बैठता। एक बार उन्होंने अपने ठेठ अवधी अंदाज़ में मुझसे कहा, ‘‘छोटकए, अबकी तुम फगुनै मइहाँ बउरइहौ।’’ मैं घबरा गया और भागकर अम्मी के पास गया। रोते हुए बताया कि गोविंद भैया कह रहे हैं कि इस बार फागुन में मैं पागल हो जाऊँगा। अम्मी को बहुत बुरा लगा। उन्होंने गोविंद भैया को बुलवाया और पूछा। बेचारे गोविंद भैया कुछ नहीं समझ पाए। लेकिन बात का सिरा पकड़कर कहने लगे, ‘‘हाँ मलकिन, सोच रहे हैं अबकी फागुन में बड़े लड़के का गौना कर दें। लेकिन सोच-सोचकर जी बौरा रहा है कि सब इंतज़ाम कैसे होगा।’’ अम्मी को सारी बात समझ आ गई। उन्होंने फौरन बात घुमा दी। बाद में वह बहुत हँसी। उन्होंने कहा, ‘अच्छा हुआ गोविंद बात नहीं समझे, नहीं तो बड़ी शर्मिंदगी होती।’
मलकनिया गाँव की तरफ हमारा एक तालाब था। अब्बा ने सिंघाड़े उगाने के लिए उसे गोविंद भैया को दे रखा था। इससे तालाब की साफ-सफाई भी होती रहती थी और देखभाल भी। जाड़ों की शुरुआत होते ही हमारे घर में सिंघाड़े इफ़रात हो जाते थे। हम कभी-कभी तालाब जाते तो गोविंद भैया को सिंघाड़े तोड़ते देखकर बहुत मज़े लेते। घड़ों की बनी उनकी नाव देखकर हैरत भी होती। वे दो घड़ों के मुँह को अगल-बग़ल डंडे लगाकर बाँध देते और उलटकर तालाब में उतार देते। डंडों पर बैठकर वह बड़े मज़े से सिंघाड़े तोड़ते रहते।
गोविंद भैया के दो लड़के थे--गंगा और गनेश। गंगा बचपन से ही बीमार रहता था। जाने कौन-सी बीमारी थी कि उसकी टाँगों की हड्डियाँ बाहर की ओर घूमी हुई थीं। दो क़दम चलना भी उसे मुहाल होता था। जब वह नेकर पहनकर बैठता तो उसकी एक-एक पसली गिनी जा सकती थी। पर उसके मुक़ाबले गनेश मोटा-ताज़ा था। गोविंद भैया मज़दूरी करने उसे अपने साथ ले जाते थे। वह बड़ा ग़ुस्सैल था। अक्सर गाँव के लड़कों से मारपीट करता रहता।
थोड़ा और समय बीता तो मैं अपनी पढ़ाई के लिए शहर आ गया। और एक बार जब शहर आ गया तो उसी में रम गया। घर जाना कभी-कभार ही रहा। मैं ही नहीं गाँव भी अब बहुत बदल चुका था। बिजली के खंभे लग गए थे, गली-गली में खड़ंजा बिछ गया था, जगह-जगह हैंड पाइप लग गए थे। खेती-किसानी के तरीक़े भी बदल गए थे। लोग भी बदल गए थे।
पिछली बार जब ईद की छुट्टियों में घर गया तो गनेश से मुलाक़ात हुई। बालचंद काका पहले ही गुज़र गए थे। पिछले साल गोविंद भैया भी नहीं रहे। गंगा का नातेदारी में ही ब्याह हो गया था और वह ससुराल में रहने लगा था। उस झोपड़ी में अब गनेश ही अपने परिवार के साथ रहता था।
हालाँकि गनेश उम्र में मुझसे काफी छोटा था। पर शरीर से ही नहीं, अपने व्यवहार से भी वह उम्रदार दिखने लगा था। उसकी बातचीत और आँखों में भी दुनिया के लिए वह रस और जिजीविषा नहीं दिखती थी, जो इस उम्र के लड़कों में होनी चाहिए। मैं उससे देर तक बातचीत करना चाहता था, पर वह काम का बहाना बनाकर खिसक गया। शायद मुझसे बातें करने में उसे संकोच हो रहा था। अब वह कलीम ट्रकवाले के साथ रहकर पल्लेदारी का काम करता था। पीठ पर बोरे लादकर गोदाम में रखने में उसे सौ-पचास रुपए मिल जाते थे।
गनेश से मिलकर मैं घर की ओर चला तो सोच रहा था कितना बदल गया है गाँव। ख़ुद अपनी ही सोचता हूँ तो देखता हूँ कि ज़मींदारी ख़त्म हुई, कोठी पर बेगारों की फौज ख़त्म हो गई, कोठी भी ख़त्म हो गई, पर उसके बावजूद हम लगातार आगे बढ़ते रहे। जितना कुछ ज़मींदारी के दौर में नहीं था, वह अब है। चार भाई नौकरी करते हैं। दो का अपना व्यापार है। एकलौती बहन अच्छे घर में ब्याहकर ख़ुश है। पर दूसरी ओर बालचंद काका के कुनबे पर नज़र डालता हूँ तो लगता है जैसे वक़्त ठहर गया है। तीन पीढ़ियाँ गुज़र गईं, पर कहीं कोई बदलाव नहीं दिखता। बालचंद काका बेगारी करते थे, गोविंद भैया मज़दूर हो गए और अब गनेश पीठ पर अपनी ज़िंदगी ढो रहा है। तारीखें ज़रूर बदलीं, लोग बदले, चेहरे बदले। लेकिन चेहरों पर दुःख, उदासी और बेबसी के रंग नहीं बदले। मजबूरी, अभाव और दर्द ने अपनी चमक नहीं खोई। बीमारी, आपद-विपद सब कुछ आज भी वैसा ही है--उतना ही साफ और उतना ही चटख?
मैं आगे बढ़ता जा रहा था और सोचता जा रहा था--‘आख़िर कब बदलेगा ये सब? ...और कौन बदलेगा?’