Sunday, 23 June 2019

मियाँ मुनक्का की जासूसी


मियाँ मुनक्का रोज़ की तरह हकीम किशमिश के दवाख़ाने पहुँचे तो वह बेचैनी से टहलक़दमी कर रहे थे। मियाँ मुनक्का को देखते ही लपककर आए और दोनों कंधे थामते हुए बोले, ‘‘आ गए दोस्त! मैं बड़ी देर से तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहा था।’’
मियाँ मुनक्का हैरान रह गए। और दिनों में जब वह चाय पीने पहुँचते थे तो हकीम किशमिश के चेहरे की रंगत ऐसा बदलती थी मानो चाय पीने नहीं, ज़ायदाद में हिस्सा बँटाने आ गए हों। मियाँ मुनक्का हैरानी से अपनी कलाई घड़ी पर नज़र डालते हुए बोले, ‘‘पर आज तो मैं रोज़ के मुक़ाबले दस मिनट पहले हाज़िर हो गया।’’
‘‘सो तो ठीक है, पर आज तुम्हारे इंतज़ार में वक़्त पहाड़ हो गया।’’ हकीम किशमिश लंबी साँस लेते हुए बोले।
‘‘तो क्या आज चाय जल्दी बन गई?’’, मियाँ मुनक्का ने ख़ुश होकर पूछा।
हकीम किशमिश के चेहरे पर वही रोज़वाली रंगत की एक परत चढ़ गई। खीझकर बोले, ‘‘अमाँ, चाय को मारो गोली। आज तो मैं किसी और काम से याद कर रहा था।’’ फिर अपने नौकर जर्दालू को आवाज़ देकर बेरुख़ी से कहा, ‘‘अरे, जर्दू, चाय बना ला।’’
मियाँ मुनक्का के उत्साह पर ठंडा पानी पड़ गया। उन्हें लगा ज़रूर जड़ी-बूटियाँ लाने धौलपुर जाने को कहेंगे।

‘‘अब तुमसे क्या छिपाना, मुनक्का। तुम तो पुराने राज़दार ठहरे। और भला किससे कहूँ दिल की बात?’’ हकीम किशमिश के चेहरे पर पसीना छलछला आया था।
‘‘अब पहेलियाँ मत बुझाइए, हकीम साहब, साफ-साफ बताइए।’’ मियाँ मुनक्का ऊबते हुए बोले।
‘‘यार, मेरे पास परदादाओं के ज़माने के हकीमी नुस्ख़े की किताब थी। उसमें आज़माए हुए असली लुकमानी नुस्ख़े थे। न जाने कौन मनहूस मारा ले उड़ा। समझ नहीं आता क्या करूँ? जब से किताब ग़ायब हुई है खाना-पीना हराम हो गया है। आँखों की नींद, दिल का चैन उड़ गया है।’’
‘‘भला कोई फारसी की बोसीदा किताब का क्या करेगा? किसके पास इतना वक़्त होगा कि अपना सिर खपाए? घर में ही ढूँढिए। यहीं-कहीं रख दी होगी।’’ मियाँ मुनक्का ने बेफ़िक्री से जवाब दिया।
तब तक जर्दालू चाय लाकर रख गया था। मियाँ मुनक्का ने लपककर चाय उठा ली और सुड़सुड़ाने लगे। पर हकीम किशमिश ने चाय की तरफ देखा तक नहीं। वह चालू रहे, ‘‘अरे तुम नहीं जानते ऐसी पुरानी चीज़ों की क़ीमतें? लाखों में होती हैं लाखों में। पर मुझे उसकी क़ीमत की परवाह नहीं है। मुझे तो फ़िक्र इस बात की है कि अब मेरी हकीमी का क्या होगा। मुझे तो ख़ुद कुछ भी नहीं आता-जाता। मैं तो उसी से पढ़-पढ़कर हकीमी की गाड़ी घसीट रहा था।’’
‘‘ओह, तब तो बहुत बुरा हुआ। पर इसमें मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूँ?’’ मियाँ मुनक्का सिर खुजलाते हुए बोले।
‘‘दरअसल तुम ताक-झाँक करने में माहिर हो। इसलिए...’’
‘‘क्या...!’’ मियाँ मुनक्का की त्योरियाँ चढ़ गईं।
‘‘म...मेरा मतलब है कि तुम्हारे अंदर जासूसोंवाली क़ाबिलियत है।’’ हकीम किशमिश ने बात सँभालने की कोशिश की, ‘‘तुम्हारे लिए यह काम कोई मुश्किल नहीं है। तुम चुटकियों में चोर को ढूँढ निकालोगे। इतना मैं ज़रूर कह सकता हूँ कि चोरी करनेवाला कोई बाहर का आदमी नहीं है। नुस्ख़ा अंदर की अलमारी में रखा रहता था। वहाँ तक दोस्तों के अलावा किसी की पहुँच नहीं है।’’
अपनी तारीफ़ से मियाँ मुनक्का कचौड़ी की तरह फूल गए। बोले, ‘‘हकीम साहब, इत्मीनान रखिए। मैं अपनी एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दूँगा। ख़ुदा ने चाहा तो दो दिन के भीतर चोर आपके क़दमों में होगा।’’
‘‘तब तो चाय के साथ रोज़ का नाश्ता भी मुफ्त,’’ हकीम किशमिश ख़ुश होकर बोले।
मियाँ मुनक्का हकीम किशमिश की ड्योढ़ी से उतर आए। वह मन-ही-मन चोर को पकड़ने की तरकीबें सोचने लगे। पर उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि शुरुआत कहाँ से करें। अभी वह सोच ही रहे थे कि सामने लंबे-लंबे क़दम नापता चिरौंजी बनिया दिखा। मियाँ मुनक्का का जासूस मन कुलबुलाया। उन्होंने चिरौंजी को पुकारा, ‘‘अमाँ, चिरौंजी, चोरी-चोरी कहाँ भागे जा रहे हो?’’
आवाज़ सुनकर भी चिरौंजी नहीं पलटा। उसने लंबे-लंबे डग भरते हुए कहा, ‘‘अभी जल्दी में हूँ। बाद में मिलूँगा।’’
मियाँ मुनक्का का शक गाढ़ा होने लगा। फौरन चिरौंजी का रास्ता रोककर खड़े हो गए और भेदभरी निगाहों से तौलते हुए बोले, ‘‘रुको तो सही। यारों से बढ़कर कौन-सा काम हो सकता है भला?’’
चिरौंजी के माथे पर पसीना छलछलाने लगा। वह अटकते-अटकते बोला, ‘‘हर काम नहीं बताया जा सकता। बस, इस वक़्त मुझे जाने दो। वर्ना गड़बड़ हो जाएगी।’’
‘‘यह कहो न कि सच्चाई खुलने पर मुहल्लेवालों के सामने ऐसी की तैसी हो जाएगी।’’ मियाँ मुनक्का ने अंधेरे में तीर चलाया।
‘‘हाँ, कुछ ऐसा ही समझो...’’ चिरौंजी जाने को बेचैन हो रहा था पर मियाँ मुनक्का थे कि उसकी बाँह कसकर पकड़े हुए थे।
‘‘देखो, सच-सच बता दो। वादा करता हूँ। बात हमारे-तुम्हारे बीच रहेगी। हकीम साहब को भी नहीं बताऊँगा।’’
‘‘हकीम साहब के पास तो जाना ही पड़ेगा। पर अभी घर जाना ज़रूरी है। वर्ना, गड़बड़ हो जाएगी। मुहल्लेवालों के सामने मेरा तमाशा बन जाएगा।’’ चिरौंजी हाथ छुड़ाने के लिए तड़प रहा था।
‘‘तो फिर तुम्हारे साथ मैं भी चलूँगा। तुम कहीं भी जाओ, अब मैं तुम्हारा पीछा नहीं छोड़नेवाला।’’
‘‘पर वहाँ तुम्हें तो क्या किसी को भी साथ नहीं ले सकता।’’ चिरौंजी बेचैन था।
‘‘ऐसी कौन-सी जगह है आख़िर...? मैं भी तो जानूँ।’’ मियाँ मुनक्का को लग रहा था कि वह कामयाबी के नज़दीक पहुँच रहे हैं।
चिरौंजी गुड़गुड़ाता हुआ पेट पकड़कर बैठ गया और ऐंठता हुआ बोला, ‘‘अब घर जाने देते हो या यहीं गली में गंदगी फैला दूँ। कल रात ख़ुबानी मौसी के घर दावत में ढेर पूरियाँ ठूँसी थीं। अब पेट में ज्वार-भाटा उठ रहा है। दूकान नौकरों के हवाले करके भागा हूँ। अब जाने दो वर्ना सारी गड़बड़ यहीं हो जाएगी।’’
 सच्चाई जानकर मियाँ मुनक्का आसमान से गिरे। नाक पकड़कर ऐसा भागे कि दो गलियाँ पार करके रुके।
अभी वह अपनी साँसें सामान्य कर ही रहे थे कि बग़ल से चचा छुहारा की आवाज़ सुनाई दी। मियाँ मुनक्का के दिमाग़ में जासूसी का कीड़ा कुलबुला रहा था। उन्होंने अपने कान आवाज़ की तरफ लगा दिए। चचा छुहारा पिस्ता पहलवान को समझा रहे थे, ‘‘देखो मियाँ, काली तुलसी के बीज और असली अरकरा मिसरी में मिलाकर चूरन बना लो। रोज़ खाने से पहले खाओ। फिर देखो बाज़ुओं में कैसी ताक़त आती है। गामा पहलवान भी तुम्हारे आगे पानी भरेगा।’’
‘‘हे..हे...हे, चचा, तुम भी कहाँ-कहाँ की कौड़ी ले आते हो। ऐसा न हो तुम्हारे नुस्ख़े पर अमल करके सींकिया पहलवान रह जाऊँ।’’ पहलवान दाँत निकालता हुआ बोला।
‘‘अमाँ, तुमको मज़ाक़ लग रहा है। आज़माया हुआ असली लुकमानी नुस्ख़ा है। अमल करना फिर बताना।’’ चचा छुहारा ने तनकर कहा।
मियाँ मुनक्का के कान खड़े हो गए। हो न हो हकीम किशमिश का नुस्ख़ा चचा छुहारा ने ही चुराया है। वर्ना आज तक तो हकीमी पर लैक्चर झाड़ते उन्हें कभी न सुना। मियाँ मुनक्का दीवार की ओट में खड़े हो गए। चचा छुहारा और पहलवान पिस्ता थोड़ी देर बातें करने के बाद अपने-अपने रास्ते चले। पीछे-पीछे मियाँ मुनक्का भी।
हालाँकि मियाँ मुनक्का अपनी चाल में बिल्ली को मात दे रहे थे। पर अचानक चचा छुहारा पीछे पलट पड़े। मियाँ मुनक्का को देखा तो बोले, ‘‘अमाँ, तुम तो ऐसा चुपके-चुपके नज़र बचाकर चल रहे हो जैसे कहीं चोरी करके आए हो।’’
मियाँ मुनक्का हड़बड़ा गए। बोले, ‘‘नहीं, नहीं, ऐसी कोई बात नहीं। बस, आपको आवाज़ देने ही वाला था।’’
‘‘अब मिल ही गए हो तो चलो हकीम साहब की बैठक में चाय पीकर आते हैं।’’
मियाँ मुनक्का ने मन ही मन सोचा कि चचा छुहारा भी कितने शातिर चोर हैं। पहले तो हकीम साहब के नुस्ख़े पर हाथ साफ़ किया अब उनकी चाय गटकने जा रहे हैं। ज़रूर भेद लेने की फ़िराक़ में होंगे। मियाँ मुनक्का ने बहाना बनाते हुए कहा, ‘‘चचा, इस वक़्त थोड़ा काम है। वर्ना आपके साथ ज़रूर चलता।’’
चचा छुहारा हँसे। बोले, ‘‘काम और तुम्हें? चारपाई तोड़ने के अलावा भी तुम कोई काम करते हो यह आज पता चला। ख़ैर, कोई बात नहीं। मैं ही अकेला चला जाता हूँ।’’
चचा छुहारा आगे बढ़े तो मियाँ मुनक्का फिर उनके पीछे-पीछे हो लिए। पर इस बार ज़रा होशियारी से।
चचा छुहारा हकीम किशमिश की बैठक में घुसते ही बोले, ‘‘हकीम साहब, आज तो मज़ा ही आ गया। पहलवान पर अपने ज्ञान की ऐसी धौंस जमाई कि वह क़ायल हो गया।’’
‘‘अच्छा ऐसा क्या हुआ?’’ हकीम किशमिश ने पूछा।
‘‘मैंने ख़जूर मामू का पुराना नुस्ख़ा उसके आगे दुहरा दिया तो उसका मुँह खुला रह गया।’’
‘‘अच्छा, वही तुलसी और अकरकरा वाला। तुम्हारा वह नुस्ख़ा मैंने भी कई लोगों पर आज़माया है।’’
दीवार की ओट में खड़े मियाँ मुनक्का सारी बातें ध्यान से सुन रहे थे। हकीम किशमिश बात कान में पड़ते ही जासूसी का ख़ुमार उतर गया। इसका मतलब चचा छुहारा चोर नहीं हैं। उनका यह सुराग भी फेल हो गया। ख़ुद पर इतना ग़ुस्सा आया कि सीधे घर पहुँचे और टूटी-फूटी चारपाई में धँस गए।
शाम हो गई पर घर से न निकले। आख़िरकार रात हो गई और बेचैनी में नींद न पड़ी तो टहलने निकल पड़े। जब वह मिर्ज़ा चिलगोज़ा के घर के पास से गुज़र रहे थे तो घर के अंदर रोशनी दिखाई दी। खिड़की से झाँका तो देखा मिर्ज़ा चिलगोज़ा किताब खोले कुछ बुदबुदा रहे हैं। कान सटाया तो फुसफसाहट सुनाई दी--
क्यों पूछते हो कि कौन हूँ और क्या करता हूँ?
मैं चारागर हूँ मरीज़े इश्क़ का इलाज करता हूँ।
मियाँ मुनक्का के कान खड़े हो गए। जासूसी का नशा फिर से सिर पर सवार हो गया। उन्हें लगा ज़रूर हकीम साहब का नुस्ख़ा मिर्ज़ा चिलगोज़ा मार लाए, नहीं तो मरीज़ और इलाज की बातें क्यों करते।
बड़ी देर तक खड़े सोचते रहे कि मिर्ज़ा चिलगोज़ा को रंगे हाथ कैसे पकड़ा जाए। दस्तक देते तो वह फ़ौरन नुस्ख़ा छिपा देते। इधर-उधर नज़र दौड़ाने के बाद भी कोई रास्ता नज़र न आया तो उन्होंने अहाते की दीवार फाँदकर घुसने की सोची। लोगों की नज़रों से छिपकर, कुत्तों की भौं-भौं से बचकर किसी तरह दीवार फाँदकर अंदर पहुँचे। पर मिर्ज़ा चिलगोज़ा भी सयानेपन में कौए से आगे थे। ज़रा-सी आहट मिली कि किताब झट कुर्ते के भीतर। घूमकर देखा तो सामने मियाँ मुनक्का खड़े हुए हैं। हैरत से बोले, ‘‘अरे मियाँ इस वक़्त कैसे? और अंदर कैसे आए? दरवाज़ा तो बंद है?’’
‘‘वह सब बाद में पूछना। पहले यह बताओ तुमने कुर्ते के भीतर क्या छिपा रखा है?’’ मियाँ मुनक्का सख़्त होकर बोले।
मिर्ज़ा चिलगोज़ा एकदम लजा गए। बोले, ‘‘अमाँ, क्यों पोल-पट्टी खोलने पर तुले हो। दुनिया हँसेगी कि बुढ़ापे में यह क्या सूझा। यह सब छोड़ो, चलो, चाय पिलाता हूँ।’’
‘‘मुझे रिश्वत देने की कोशिश कर रहे हो?’’ मियाँ तेज़ होकर बोले।
‘‘हाँ, ऐसा ही समझो,’’ मिर्ज़ा चिलगोज़ा अंदर की ओर बढ़ने की कोशिश करने लगे।
मियाँ मुनक्का ने उन्हें लपक लिया और किताब निकालने की कोशिश करने लगे। मिर्ज़ा चिलगोज़ा ने भी पूरी ताक़त लगा दी। दोनों में थोड़ी देर छीन-झपट मचती रही। आखिरकार जब मिर्ज़ा चिलगोज़ा को लगा कि उनका इकलौता कुर्ता तार-तार हो जाएगा तो किताब निकालकर मियाँ मुनक्का के हवाले कर दी।
मियाँ मुनक्का ने किताब को उलट-पलटकर देखा तो उनका जासूसी का पारा एकदम से ज़ीरो पर आ गया। उस पुरानी डायरी में मिर्ज़ा चिलगोज़ा ने शेरो-शायरी लिख रखी थी।
‘‘अमाँ, किसी से कहियो मत, नहीं लोग कहेंगे कि बूढ़ा सठिया गया है। बुढ़ापे में इश्क़-माशूक़ की बातें करता है।’’ मिर्ज़ा चिलगोज़ा गिड़गिड़ाते हुए बोले।
जब मियाँ मुनक्का ने दीवार लाँघी थी तो कुहनियाँ छिल गई थीं। घुटने में चोट लगी थी। पर उससे उन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा था। लेकिन दिल पर लगी नाकामयाबी की चोट से उन्हें गश आ गया। मिर्ज़ा चिलगोज़ा रोकते रहे पर मियाँ मुनक्का न रुके। घर आकर निराशा से तकिए में मुँह छिपाकर पड़ रहे।
मियाँ मुनक्का रात भर उल्टे-सीधे ख़्वाबों की दुनिया में डूबते-उतराते रहे। सुबह उठे तो सिर भारी-भारी हो रहा था। आँखें ऐसी सूजी-सूजी लग रही थीं जैसे दो रातों से सोए न हों। दिल बुझ रहा था। चाय की तलब ज़ोर मार रही थी। पर समझ में नहीं आ रहा था कि हकीम किशमिश के पास कैसे जाएँ। वह नुस्ख़े के बारे में पूछेंगे तो क्या जवाब देंगे। जब मियाँ मुनक्का को कुछ न सूझा तो उन्होंने तय कर लिया कि अपने चचा के पास रामपुर चले जाएँगे।
फौरन हाथ-मुँह धोया और अलमारी पर रखा झोला जैसे ही कंधे पर लटकाया कि चौंक पड़े। झोला भारी लग रहा था। हैरानी से खोलकर देखा तो सिर घूम गया। लगा कि चक्कर खाकर गिर पड़ेंगे। झोले में हकीम साहब की किताब पड़ी हुई मुँह चिढ़ा रही थी। उन्हें तीन दिन पहले की घटना याद आ गई। जब हकीम किशमिश की नज़र बचाकर उनकी पुरानी किताब झोले में डाल लाए थे सोचा था कि रद्दीवाले को बेचकर दो पैसे पैदा कर लेंगे। उन्हें क्या पता था कि यही उनके पुश्तैनी हकीमी नुस्ख़ों की किताब है।
किताब ढूँढने की समस्या तो अब हल हो गई थी। पर मियाँ मुनक्का को यह नहीं समझ में आ रहा था कि हकीम किशमिश को वापस क्या कहकर लौटाएँ।

Sunday, 12 May 2019

मूर्खिस्तान--मूर्खों का स्वर्ग


एक बार मशहूर लेखक मूरखमल ‘अज्ञानी’ ने एक किताब लिखने की सोची, जिसमें दुनिया भर के मूर्खों के क़िस्से हों। वह बहुत दिनों से चाह रहे थे कि अपनी बिरादरीवालों के लिए कुछ ऐसा कर जाएँ, जिससे ज़माना याद करे। उन्होंने किताब का नाम भी सोच रखा था-‘मूर्खों की महागाथा’। दुनिया भर में चतुरों पर किताबें भरी पड़ी थीं, लेकिन मूर्ख बेचारों को किसी ने इस लायक़ ही न समझा था। इसलिए उन्होंने ठान लिया था कि मूर्खों की सच्चाई को दुनिया के सामने लाकर रहेंगे। उनका मानना था कि दुनिया सिर्फ बुद्धिमानों के ही भरोसे नहीं चल रही है, उसमें मूर्खों का भी गहरा योगदान है। वह मन ही मन पुलकित हो रहे थे कि इस किताब के छपते ही वह दुनिया में मशहूर हो जाएँगे। मूर्खों की बिरादरी उन्हें सिर-आँखों पर बिठा लेगी।

मूरखमल अपने दादा जड़बुद्धि के पास आशीर्वाद लेने गए। जड़बुद्धि सौ बरस पार कर चुके थे, पर देखने में साठ-सत्तर से ज़्यादा के नहीं लगते थे। जैसे-जैसे उनकी उम्र बढ़ती जा रही थी, वैसे-वैसे मूर्खता परवान चढ़ती जा रही थी। उनके दिमाग़ में मूर्खता के ऐसे नए-नए आइडिए आते थे कि बुद्धिमान भी क्या सोच पाते। मूरखमल की बात सुनकर वह बोले, ‘‘शाबाश बेटा, तुम तो मूर्खता में मुझसे भी दस क़दम आगे निकले। ईश्वर ने कामयाबी दी तो दुनिया में मूर्खों के नाम का डंका बज जाएगा। बुद्धिमान हमारे चरणों में गिर पड़ेंगे। बेटा जा, मूर्खिस्तान चला जा। वह मूर्खों का स्वर्ग है। तुझे वहाँ ऐसे-ऐसे क़िस्से मिलेंगे कि तेरी किताब चुटकियों में पूरी हो जाएगी।’’
जड़बुद्धि से आशीर्वाद लेकर मूरखमल मूर्खिस्तान की ओर चल पड़े। जैसे ही वह मूर्खिस्तान की सीमा पर पहुँचे कि उन्हें एक आदमी ज़मीन पर लोटता-पोटता दिखा। लोट-पोटकर उसने धूल का बवंडर खड़ा कर दिया था। मूरखमल ने सोचा क्यों पचड़े में पड़ें। अस्पताल लेकर जाएँगे तो बिना मतलब की झंझट होगी। समय अलग बर्बाद होगा। पुलिस-वुलिस का चक्कर हुआ तो और मुसीबत हो जाएगी। वह उसे अनदेखा करके आगे बढ़ चले।
पर मूरखमल ठहरे लेखक। वह लेखक भी क्या जो संवेदनशील न हो। आज की दुनिया में वैसे भी संवेदनशीलता सिर्फ मूर्खों में ही बची है। आखिरकार वह लौट आए और उस आदमी को सँभालते हुए बोले, ‘‘क्या हो गया भाई? इस तरह क्यों तड़प रहे हो? पेट में दर्द हो रहा है या किसी ने ज़हर खिला दिया?’’
मूरखमल की बात सुनते ही वह आदमी उठ बैठा और लगा उन्हें खरी-खरी सुनाने, ‘‘ज़हर-संखिया तुम्हें मिले। मैं भला क्यों खाऊँ? पेट दर्द तुम्हें हो। तुम्हारे बाल-बच्चों को हो। मुझे क्यों होने लगा?’’
मूरखमल को आदमी की बात पर बिल्कुल भी ग़ुस्सा न आया। बल्कि वह हैरानी से बोले, ‘‘भले मानस, क्षमा करो अगर कुछ ग़लत कहा। पर इतना तो बता दो कि इस तरह जल बिन मछली बने क्यों तड़प रहे थे?’’
‘‘वह तो अपनी अम्मा की भुलक्कड़ी भोग रहा हूँ।’’ आदमी ने खीझते हुए जवाब दिया।
‘‘अम्मा की भुलक्कड़ी?’’ मूरखमल हैरान रह गए, ‘‘ज़रा पूरी बात तो बताओ।’’
वह आदमी बताने लगा, ‘‘दरअसल अम्मा ने मुझे दूध पीने को दिया था। पर उसमें शकर मिलाना भूल गईं। फीका दूध पीने की मुझे आदत नहीं। इसलिए मैं शकर फाँककर लोट-पोट रहा था ताकि पेट में अच्छी तरह मिल जाए।’’
आदमी की बात सुनते ही मूरखमल की बाछें खिल गईं। उन्हें अपनी किताब के लिए पहला िक़स्सा मिल गया था। उन्होंने फौरन काग़ज़-क़लम निकाला और सारी बातें नोट कर लीं। फिर आगे बढ़ चले। सोच-सोचकर ख़ुश हो रहे थे कि चलो शुरूआत तो अच्छी हो गई।
थोड़ी दूर चलने के बाद उन्हें एक जगह भीड़ दिखाई दी। उनका लेखक मन जाग उठा। वह फौरन उधर लपक लिए। पास जाकर देखा तो एक कुएँ के पास लोग इकट्ठा होकर झाँक रहे थे। कुछ लोग बग़ल के पोखरे से पानी ला-लाकर उसमें भर रहे थे। आस-पास ख़ूब शोर मच रहा था। पानी गिरने से आस-पास ख़ूब किचकिच हो रही थी।
मूरखमल को कुछ भी समझ न आया। वह पास पहुँचकर बोले, ‘‘अरे भाई क्या हो गया? लोग कुएँ से पानी निकालते हैं, तुम उसमें बाल्टी उड़ेल रहे हो?’’
एक आदमी जो उनका मुखिया लग रहा था, पास आया और बोला, ‘‘हमारे बच्चे की फुटबॉल खेलते समय कुएँ में गिर गई है। हम लोग उसे निकालने की कोशिश में लगे हैं।’’
‘‘पर इस तरह पानी भरने से क्या होगा?’’
‘‘अजी, जब कुएँ में पानी ऊपर तक भर जाएगा तो फुटबॉल तैरकर अपने आप ऊपर आ जाएगी।’’ इतना बताकर वह आदमी कुएँ के पास चला गया और लोगों को जल्दी-जल्दी पानी भरने के लिए उकसाने लगा।
मूरखमल उनकी मूर्खता पर लाजवाब होकर सोचने लगे कि अब तक हम ख़ुद को सबसे बड़ा मूर्ख समझे हुए थे। ये लोग तो हमसे भी दस क़दम आगे हैं। उन्होंने कॉपी-क़लम निकाला। पूरा िक़स्सा नोट किया और गदगद होते हुए आगे बढ़ चले।
मूरखमल कुछ दूर और चले तो उन्हें भूख लग आई। सामने उन्हें एक होटल दिखा। हलवाई गरमा-गरम जलेबियाँ तल रहा था। मूरखमल के मुँह में पानी आने लगा। लपककर होटल पर पहुँचे और बोले, ‘‘अरे, भैया, फटाफट आधा किलो जलेबी तोल दो। भूख से पेट में मरोड़ उठ रही है।’’
हलवाई ने उनकी बात नहीं सुनी। वह जलेबियाँ तल-तलकर ढेर ऊँचा करता रहा। जब मूरखमल ने दोबारा पूछा तो उसने उचटती-सी निगाह डाली और बोला, ‘‘जलेबी नहीं है---।’’
मूरखमल हैरत में पड़ गए। थोड़ा ग़ुस्सा भी आया। बोले, ‘‘सामने जलेबियों का हिमालय खड़ा कर रखा है और कहते हो नहीं है?’’
‘‘है तो, पर ये तुम्हारे लिए नहीं है। ये जलेबियाँ मूर्खिस्तान के वैज्ञानिक मैडमैन हॉफविट की हैं।’’
मूरखमल अपनी भूख को दबाते हुए बुदबुदाए, ‘‘अच्छा, आर्डर की होगीं। चलो, कोई और दूकान देखता हूँ---।’’
‘‘कहीं नहीं मिलेंगी---’’ हलवाई उसी तरह जलेबियाँ तलता हुआ बोला, ‘‘मूर्खिस्तान की सारी जलेबियाँ मैडमैन की प्रयोगशाला में ही जाती हैं।’’
मूरखमल हैरत में पड़ गए। यह मैडमैन इंसान है या भूत? इतनी जलेबी इंसान तो खा नहीं सकता है? सच्चाई जानने वह वैज्ञानिक के घर की ओर चल दिए।
मैडमैन का घर पूछने की उन्हें ज़रूरत नहीं पड़ी। जिधर मक्खियों और मधुमक्खियों के झुंड जा रहे थे, उधर ही चल पड़े। मक्खियों की भन-भन के बीच जगह बनाते मूरखमल किसी तरह मैडमैन की प्रयोगशाला में पहुँचे। मैडमैन जलेबियों के ऊँचे-ऊँचे ढेरों के बीच अपना माइक्रोस्कोप लिए कुछ जाँच रहे थे। हर तरफ मिठास की चिप-चिप फैली हुई थी।
मूरखमल थोड़ी देर तक देखते रहे। मैडमैन को काम में मगन देख उन्होंने टोकना उचित नहीं समझा। पर जब मक्खियों और मधुमक्खियों ने उन्हें हेलीपैड बनाकर उन पर लैंडिंग शुरू कर दी तो उनसे न रहा गया। उन्होंने मक्खियों की भनभनाहट के बीच चिल्लाकर कहा, ‘‘वैज्ञानिक जी---! आप ये क्या कर रहे हैं?’’
मैडमैन ने एक नज़र उठाकर उनकी ओर देखा और चुप रहने का इशारा करते हुए बोले, ‘‘श---श---श---मैं बहुत महत्वपूर्ण खोज में लगा हूँ।’’
मूरखमल चुप न रहा गया। वह बोले, ‘‘पर आख़िर आप कर क्या रहे हैं?’’
मैडमैन ने अपना माइक्रोस्कोप रख दिया और हताशा से बोले, ‘‘मैं पिछले पंद्रह सालों से इस बात की खोज में लगा हूँ कि जलेबी के अंदर रस कहाँ से भरा जाता है? एक-एक जलेबी चेक कर डाली पर अब तक कोई कामयाबी नहीं मिली।’’
मूरखमल ख़ुश हो गए। उन्हें अपनी किताब के लिए ज़बरदस्त क़िस्सा मिला था। प्रयोगशाला से बाहर आए तो मधुमक्खियों ने उनका हुलिया भले ही बिगाड़ दिया था, पर वह बेहद ख़ुश थे। वह मक्खियों की भनभनाहट में अपनी गुन-गुन मिलाते हुए आगे बढ़ चले।
आगे उन्हें एक पेड़ के नीचे एक आदमी बैठा दिखा। कपड़े फटे, बाल बिखरे, दाढ़ी बढ़ी हुई। हाथ में एक पोथा थामे हुए आसमान की ओर निहार रहा था। बीच-बीच में पोथे में कुछ लिखता भी जाता।
मूरखमल ने सोचा हो-न-हो यह कोई पागल है। इससे उलझना ठीक नहीं। कहीं मारपीट न कर बैठे। पर थोड़ा आगे बढ़ते ही उनका मन कलबुलाने लगा। वह अपनी किताब के लिए हर ख़तरा मोल लेने को तैयार थे। वह वापस लौटे और डरते-डरते बोले, ‘‘भाई साहब, आप इस पोथे में क्या लिख रहे हैं?’’
वह आदमी इतनी ज़ोर से हँसा कि मूरखमल डर गए। उसने कहा, ‘‘मैं मूर्खिस्तान का सबसे विद्वान प्रोफेसर हूँ। आजकल मैं मूर्खिस्तान की डिक्शनरी तैयार कर रहा हूँ।’’
मूरखमल ने हैरानी से पूछा, ‘‘पर इस डिक्शनरी में नया क्या है?’’
वह आदमी फिर हँसा और बोला, ‘‘इसमें मैंने मूर्खिस्तान में प्रचलित सारे शब्दों को इकट्ठा किया है। इसमें मूर्ख का मतलब बुद्धिमान है, काले का मतलब सफेद है, रात का मतलब दिन है, उल्टा का मतलब सीधा है। और जल्द ही मेरा काम पूरा होनेवाला है।’’
मूरखमल ख़ुशी से फूल गए। उन्हें लगा कि इसी तरह क़िस्से मिलते रहे तो उनकी किताब जल्द ही पूरी हो जाएगी।
वह मस्ती से गुनगुनाते आगे बढ़ चले। कुछ दूर चलते ही देखा कि लोगों ने पेड़ों में रस्सियाँ बाँध रखी हैं और उन्हें हिलाने की कोशिश कर रहे हैं। छोटे-बड़े, बच्चे-बूढ़े सब उसमें शामिल हैं। लोग चिल्ला रहे हैं, ‘‘हाँ, हाँ और ज़ोर लगाओ! और तेज़ हिलाओ! अब थोड़ी-थोड़ी लग रही है।’’
भीड़ में जगह तलाशते मूरखमल किसी तरह पास पहुँचे और पूछा, ‘‘अरे भाई यह क्या हो रहा है? पेड़ों को इस तरह क्यों हिलाया जा रहा है?’’
एक बूढ़ा आदमी सामने आया और बोला, ‘‘आजकल गर्मी का मौसम है। पर हवा बिल्कुल नहीं चल रही है। हम लोग कोशिश में लगे हैं कि पेड़ों को हिलाकर किसी तरह हवा चलाई जाए।’’
मूरखमल लाजवाब हो गए। उन्हें समझ में आ गया कि दादा जड़बुद्धि ने मूर्खिस्तान को मूर्खों का स्वर्ग क्यों कहा था। उनका मन इतना रमा कि उन्होंने वहीं बसने का इरादा बना लिया।
बहरहाल, मूरखमल जी अब भी मूर्खिस्तान में जमे हुए हैं। उनकी किताब के कई हज़ार पृष्ठ भर चुके हैं। हम सब प्रार्थना करते हैं कि उनकी किताब जल्द पूरी हो और हमें मूर्खों के ढेर सारे क़िस्से पढ़ने को मिलें।