Sunday, 1 June 2014

सुल्तान पहलवान


जमुनिया बाग के मेले में दो ही चीजें खास होती थीं--एक, जुम्मन मुरादाबादी के बर्तनों की दूकान और दूसरी, दूर-दूर से इकट्ठा होनेवाले पहलवानों का दंगल। जुम्मन की दूकान जहाँ सिर्फ अमीरों और शौकीनों का ही ध्यान अपनी तरफ खींच पाती थी, वहीं दंगल देखने छोटे-बड़े, अमीर-गरीब सभी आ जुटते।
दंगल में दूर-दूर के पहलवान दाँव आजमाने आते थे। पहाड़-सी छाती और मजबूत भुजाओं वाले। जब वे बदन पर मालिश करके अखाड़े में उतरते तो देखने वालों की aभीड़ उमड़ पड़ती। पहलवान गर्व से मूँछें ऐंठकर और ताल ठोंककर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते। लोग वाह-वाह करते और तालियाँ बजाते न थकते।
जमुनिया बाग के दंगल में पिछले तीन सालों से एक ही नाम सबकी जुबान पर था--सुल्तान। इन तीन सालों में उसे कोई नहीं हरा पाया था। एक से एक बढ़कर ताकतवर आए, एक से एक बढ़कर दाँवबाज जुटे, पर उसके आगे कोई नहीं ठहर पाया। जब वह अखाड़े में उतरता तो उसका पहाड़ जैसा चट्टानी शरीर और दृढ़ निश्चय से भरी आँखें देखकर सामने वाला पहलवान यूँ ही दहल जाता।
सुल्तान ने पहलवानी किसी से नहीं सीखी थी। न तो वह आज तक किसी अखाड़े में गया था और न किसी ने उसे पहलवानी के गुर ही सिखाए थे। फिर भी तीन सालों से वह जीतता आ रहा था। लोग कामयाबी का राज पूछते तो तो हँसकर कहता, ‘‘जिंदगी से बड़ा कोई दंगल नहीं है। हालात ने मुझे सब कुछ सिखा दिया।’’
सचमुच, सुल्तान ने बड़ी मुसीबतें झेली थीं। बचपन में ही माँ-बाप का साया सिर से उठ गया था। दुख की घड़ी में सगे चच्चा रहमतुल्लाह ने भी आँखें फेर लीं। यही नहीं, भाई की जायदाद भी हड़प गए। सुल्तान दर-दर की ठोकरें खाने लगा। भूखा-प्यासा रहकर इधर-उधर भटकता रहा। लू के थपेड़ों में झुलसते, बारिश में गलते और सर्दी में ठिठुरते जब सुल्तान बड़ा हुआ, तो मुसीबतें झेल-झेलकर मजबूत हो चुका था। दो जून ठीक से रोटी न मिल पाने पर भी उसका शरीर ऐसा गठीला और मजबूत निकला था कि लोगों को आश्चर्य होता। किस्मत ने उसके हाथों से सब कुछ छीन लिया था, पर कसरत और पहलवानी का शौक उससे नहीं छूटा था। रोज सवेरे जमकर कसरत करना उसकी आदत बन गई थी।

सुल्तान जवान हुआ तो हर्रू चच्चा ने शादी करा दी। उसका जीवन हँसी-खुशी बीतने लगा। दो लड़के भी हुए। पर शायद उसके दुखों का अंत अभी नहीं हुआ था। पत्नी भी बच्चों को उसके सहारे छोड़कर चल बसी। सुल्तान का संसार ही उजड़ गया। लड़कों की देखभाल और दो जून की रोटी के इंतजाम में वह उलझकर रह गया।
इस बार भी मेले की तैयारियाँ शुरू हो गई थीं। दूर-दूर से दूकानदार आ गए थे और बाँस-बल्लियाँ गाड़कर अपनी दूकानें सजाने लगे थे। गाँव की शुरुआत से लेकर पीर बाबा की मजार तक बल्लियाँ गाड़ दी गई थीं। उन पर झंडियाँ और झालरें सजाई जा रही थीं। मुख्य सड़क से जुड़ने वाला खड़ंजा जैसे जाग उठा था। सामानों से लदे ट्रैक्टरों की धड़धड़ाहट, बैलगाड़ियों की चर्र-चूँ और हथठेलों की ‘हटो-बचो’ से सारा गाँव गूँज रहा था।
सबसे ज्यादा खुश लड़के थे। दिनभर में उनके बीसों चक्कर लग जाते। हर चक्कर में वे नई सूचना लेकर आते--‘बंगाल का काला जादू आ गया है,’ ‘इस बार सर्कस में तीन जोकर हैं,’ ‘अबकी चिड़ियाघर भी आया है’ आदि-आदि। घर की औरतें बड़ी रोचकता से उनकी बातें सुनतीं।
गाँव के नवयुवक काम निपटाकर अखाड़े की तरफ निकल जाते। अखाड़ा तैयार करने का काम जोर-शोर से चल रहा था। मिट्टी गोड़कर भुरभुरी की जा रही थी। आस-पास थोड़ी दूर तक बाँस गाड़कर घेरा बना लिया गया था ताकि जोश में भरी भीड़ को रोका जा सके और निर्णायक आदि भी सुविधापूर्वक अपना काम कर सकें।
अखाड़ा हमेशा मेले से थोड़ा हटकर बनाया जाता था। इस बार यह बुधई के आम के बाग के पास बनाया गया था। बुधई परेशान था। इस बार फसल अच्छी थी। आम के पेड़ों में टिकोरे आना शुरू हो गए थे। डालें लदर-बदर हो रही थीं। जो भी उधर आता , हाथ बढ़ाकर दो-एक टिकोरे तोड़ लेता। बस, बुधई बड़बड़ाते दम न लेता। चैबीसों घंटे लाठी लिए मेड़ पर अड़ा रहता। गाँव भर के शरारती लड़कों के लिए खेल हो गया था। छेड़-छेड़कर उन्होंने बुधई का गला बिठा दिया था। दरअसल, बाग के किनारे अखाड़ा बनवाने की योजना भी इन्हीं शरारतियों की थी। बात-बेबात बड़बड़ाने वाले बुधई को परेशान करने का उन्हें अच्छा तरीका मिला था।
इस बार लोगों में सुगबुगाहट थी कि मशहूर पहलवान दिलदार भी दंगल में आ रहा है। दिलदार अब तक एक भी दंगल हारा नहीं था। जहाँ चार लोग जुटते कि चर्चाएँ शुरू हो जातीं। कोई कहता कि इस बार सुल्तान का जीत पाना मुश्किल है, तो कोई उसके गुन गाते न थकता। जितने मुँह उतनी बातें।
सचमुच दूसरे ही दिन से गाँव में एलान होने लगा--‘‘भाइयो-बहनो, इस बार जमुनिया बाग के दंगल में पधार रहे हैं रुस्तमे हिंद, पहलवानों के शहंशाह, मशहूर पहलवान दिलदार-ए-हिंदोस्तान!’’
इस बार मुकाबला वाकई कठिन था। दिलदार अब तक एक भी दंगल नहीं हारा था। वह पूरे देश में घूमकर अपनी फतह के झंडे गाड़ चुका था। दबे मुँह यह बात भी कही जा रही थी कि बिसेसर ने काफी कोशिशें करके उसे बुलवाया है। पैसे और नजराने दिए हैं, नहीं तो भला इतना मशहूर पहलवान छोटे से गाँव में आता ?
दरअसल, पिछली बार सुल्तान से बिसेसर की, जो दंगल का आयोजन करता था, कुछ कहा-सुनी हो गई थी। बिसेसर ने तमतमाकर कहा था-‘‘देखता हूँ इस बार तुम कैसे जीतते हो !’’ तब इस बात पर किसी ने ध्यान नहीं दिया था, मगर अब यह साफ था कि दिलदार के आगमन का संबंध कहीं न कहीं उस घटना से अवश्य था।
मगर सुल्तान पर इसका कोई असर नहीं था। वह मुस्कराकर कहता, ‘‘भाई जिताना-हराना तो ऊपर वाले के हाथ है। वह चाहता है तो हार भी जीत में बदल जाती है, नहीं तो इंसान लाख कोशिश कर ले, उसके बस में भला क्या है ?’’ और अपनी पुरानी संदूक सायकिल में लगाकर काम पर निकल जाता। वह ताले-चाबियाँ बनाने और मरम्मत करने का काम करता था। लोग कहते थे कि तालों की मरम्मत करने वाला उससे अच्छा कारीगर आस-पास के इलाके में नहीं है। कैसा भी खराब ताला हो उसका हाथ लगते ही ठीक हो जाता है। ताले ही नहीं, टूटे छाते, बाल्टियाँ, बक्से, टीन के डिब्बे वगैरह की मरम्मत करने में भी वह गुनी था। पर कारोबार ऐसा था कि आमदनी बहुत कम हो पाती। गाँव में भला ताले कौन ठीक करवाता ?
 जहाँ भी जाता लोग कहते, ‘‘ सुल्तान भाई, हमें ताले की क्या जरूरत ? हमारे पास है ही क्या जिसे बंद करके रखेंगे ? हम तो रोज कुआँ खोदते हैं और रोज पानी पीते हैं।’’
सुल्तान  भला क्या जवाब देता। गाँवों की सच्चाई से वह अच्छी तरह परिचित था। गाँव वालों की किस्मत उससे अलग न थी। उसे बहुत पहले की याद आती जब वह एक चुनाव रैली में शहर ले जाया गया था। एक नेता जी रामराज्य का सपना दिखाते हुए कह रहे थे-‘‘भाइयो, हमारे देश में कुछ गाँव ऐसे भी हैं जहाँ घरों में ताले नहीं लगाए जाते। हमें संपूर्ण भारत को वैसा ही बनाना है।’’
तब वह इस जानकारी से बहुत चकित हुआ था। उसे खुशी हुई थी कि हिंदोस्तान में कहीं ऐसा भी है जहाँ के लोग इतने शरीफ और ईमानदार हैं। पर इस बात की असलियत तो बहुत बाद में समझ आई थी। सचमुच, गाँव के गरीब लोगों के पास है ही क्या जिसे वह ताले में बंद रखें। ताला तो उनकी किस्मत पर लगा है।
पर सुल्तान यह पेशा अपनाने के लिए मजबूर था। न तो उसके पास खेती थी और न ही इतनी पूँजी कि कोई रोजगार शुरू कर सके। हाँ, हर्रू चच्चा के पास बैठते-बैठते वह पेट पालने को यह काम जरूर सीख गया था। उसके बच्चे भी बदहाल थे। न तन पर ढंग के कपड़े, न पेट भर भोजन। गरीबी ने उनका बचपन छीन लिया था।
उसकी झोपड़ी में हर मौसम आकर पूरे समय ठहरता था। टूटे छप्पर में न तो गर्मी की लू-धूप और तपिश रुकती थी , न बारिश की बौछारें और न सर्द हवाएं। बस, सुल्तान अपने दोनों बच्चों के साथ किसी तरह जी रहा था।
इधर जब से बच्चों ने गाँव वालों को बातें करते सुना था कि इस बार अब्बा दंगल हार जाएंगे, मायूस थे। हर बार जब सुल्तान जीतता तो उन्हें मिठाइयाँ खाने को मिलती थीं, इनाम के पैसों से उनके कपड़े तैयार होते थे, कई दिनों तक भरपेट अच्छा खाना मिलता था। मगर इस बार नाउम्मीदी थी। किसी काम में उनका दिल नहीं लगता था। ऐसे तो वह मेले का साल भर इंतजार करते रहते थे, पर इस बार उन्हें सब कुछ फीका-फीका लग रहा था। दिन भर घर पर बैठे रहते। सुल्तान बाहर घूम आने के लिए कहता तो गली में जाकर खड़े हो जाते। यह देखकर सुल्तान का हृदय फट पड़ता। पल भर को उसके आत्मविश्वास का हिमालय डगमगा उठता, पर वह किसी तरह खुद को संभाल लेता।
आज का दिन सुल्तान के लिए बड़ा बेचैनी भरा बीता था। कल दिलदार से उसका मुकाबला होना था। सुल्तान के मन में यह विश्वास तो था कि कामयाबी उसे ही मिलेगी, पर लोगों की बातें सुनकर और बच्चों की मायूस सूरतें देखकर डगमगा उठता।
दंगल से एक दिन पहले की बात है। रात का वक्त था। सुल्तान झोपड़ी के बाहर खाट पर बैठा था। कल दिलदार से उसका मुकाबला होना था। दूसरी खाट पर बच्चे सो रहे थे। तेज पुरवाई की वजह से चिराग बुझ गया था। पर दूर मेले की जगमगाहट से हल्का-हल्का रहस्यमयी उजाला फैला हुआ था। सुल्तान की आँखों में नींद नहीं थी। वह अंधेरे में बैठा जाने क्या सोच रहा था। तभी सामने से एक परछाई उसकी ओर बढ़ती दिखाई दी। उसने कड़ककर पूछा, ‘‘कौन है वहाँ ?’’
‘‘शऽऽऽ....’’ चुप रहने का इशारा करती वह परछाई बिल्कुल करीब आ गई।
‘‘दिलदार भाई आप....!’’ सुल्तान की आँखें अचरज से फैल गईं।
दिलदार ने होठों पर उंगली रखकर चुप रहने का संकेत किया और इधर-उधर चैकन्नी निगाहों से देखता हुआ फुसफुसाया, ‘‘सुल्तान भाई.. एक जरूरी बात करनी थी।’’
‘‘हाँ-हाँ, कहिए,’’ उसे परेशान देखकर सुल्तान ने कहा, ‘‘आस-पास कोई नहीं है। बच्चे सो रहे हैं।’’
दिलदार कुछ संयत हुआ। अंगोछे से माथे का पसीना पोछा और लंबी साँस लेकर बोला, ‘‘माफ करना भाई, तुम्हें इस वक्त परेशान किया। दरअसल...’’
‘‘हाँ-हाँ, कहो,’’ सुल्तान ने उत्साहित किया।
‘‘दरअसल...मैं चाहता हूँ... तुम कल का मुकाबला हार जाओ।’’
पल भर को सुल्तान हतप्रभ रह गया। पर अगले ही क्षण सँभलते हुए बोला, ‘‘मगर तुमने यह कैसे मान लिया कि कल के मुकाबले में मेरी ही जीत होगी।’’
अब तक दिलदार व्यवस्थित हो चुका था। बोला, ‘‘कल की कुश्ती में एक पहलवान से भिड़ते देखकर ही मैं समझ गया था कि तुम्हारी जोड़ का दूसरा पहलवान नहीं। तुम्हारी आँखों में जाने ऐसा क्या है जो सामने वाले को कमजोर कर देता है। नजरें मिलते ही लगता है कि सारी ताकत किसी ने सोख ली हो। मैं पूरा हिंदोस्तान घूमा हूँ, पर ऐसा मेरे साथ कभी नहीं हुआ। जाने क्यों लगता है कि तुम्हारे सामने आकर मैं हार जाऊँगा।’’
‘‘इसका फैसला तो कल ही हो सकेगा।’’ सुल्तान ने उपेक्षा से कहा।
‘‘ सुल्तान भाई,’’ दिलदार ने उसके दोनों हाथ थाम लिए, ‘‘तुम चाहो तो मुझे बेइज्जती से बचा सकते हो। मुझे सारा हिंदोस्तान जानता है। अगर हार गया तो बड़ी बदनामी होगी। लोग कहेंगे पूरे हिंदोस्तान को झुकाने वाला पहलवान एक बेनाम इसान के आगे धूल चाट गया।’’ यह कहते-कहते दिलदार ने उसके हाथों में कोई चीज थमा दी।
‘‘ सुल्तान भाई...’’ भारी-भरकम काले पहाड़-सा शरीर सुल्तान के कदमों में पड़ा गिड़गिड़ा रहा था, ‘‘छोटी-सी भेंट है, सुल्तान भाई। रख लो सौ-सौ के दस हैं।’’
‘‘अरे-अरे!’’ सुल्तान चीख पड़ा, ‘‘यह क्या कर रहे हो ? अपने पैसे उठाकर फौरन यहाँ से चले जाओ। वर्ना मैं भूल जाऊँगा कि तुम मेरे दरवाजे खड़े मेहमान हो।’’
‘‘चला जाऊँगा, सुल्तान भाई,’’ दिलदार ने सिर झुका लिया, ‘‘मगर एक हजार रुपए कम नहीं होते। खुद की नहीं तो कम से कम बच्चों की तो परवाह करो। बिसेसर ने मुझे तुम्हारे बारे में सब कुछ बता दिया है। अगर इनकी माँ जिंदा होती तो क्या इन्हें इस हालत में देख पाती। बेचारी ने क्या-क्या सपने सजाए होंगे--बच्चे पढें-लिखेंगे, स्कूल जाएंगे, बड़े आदमी बनेंगे। तुम दे पाए इन्हें ये सब ? न तन पर साबुत कपड़े, न भरपेट खाना, लाचारी और दुखों के सिवा क्या दिया तुमने इन्हें ? क्यों बरबाद कर रहे हो इनकी जिंदगी ? अपने हिस्से की बदकिस्मती क्यों इन पर थोप रहे हो ? कुछ इनके बारे में भी सोचो ?’’ दिलदार थोड़ा ठहरा, ‘‘मैं जा रहा हूँ। रुपए यहीं रखे हैं। अपने फैसले पर फिर से सोच लेना।’’
सुल्तान सिर झुकाए खड़ा रहा। उसकी आँखों में आँसू तैर रहे थे। उसने एक बार बच्चों की ओर देखा। टूटी खाट पर दोनों गड्ड-मड्ड सो रहे थे। पुरवाई की शीतलता से वे सिमटे हुए थे। हवा झोंके मार रही थी। छप्पर के फूस उजड़-उजड़कर हवा में तैर रहे थे। सुल्तान भरी आँखों से बड़ी देर तक ठंड से सिमटते बच्चों, उजड़ते छप्पर और टूटे घर को देखता रहा। फिर जाने क्या सोचकर आँसू पोंछे और पैसे उठाकर झोपड़ी में चला गया।

अगले दिन मेले में बड़ी भीड़ थी। दूर-दूर से लोग बैलगाड़ियों, ट्रैक्टरों में भर-भरकर आ रहे थे। भीड़ इतनी बढ़ गई थी कि कंधे छिल रहे थे। एक शोर-सा मच रहा था। लोग तेज धूप की परवाह न करके आगे जगह पाने के लिए बड़ी देर से अड़े थे। बांसों की बाड़, मालूम देता था अब टूटी कि तब। कहीं कोई झगड़ रहा था, कहीं कोई ठट्ठे मार रहा था। तरह-तरह के शोर से वातावरण गूँज रहा था।

आखिरकार इंतजार की घड़ियाँ खत्म हुईं। बिसेसर अखाड़े में आकर बोला, ‘‘भाइयो, शांत हो जाएं।’’
सारी आवाजें एकाएक थम गईं। जैसे किसी ने जादू की छड़ी फेर दी हो।
‘‘अब आपके सामने शुरू होने वाला है...दिलदारे हिंद और सुल्तान के बीच जोरदार मुकाबला। तैयार हो जाइए..., देखना है इस बार का मुकाबला कौन जीतता है।’’
तालियों की गड़गड़ाहट के बीच दोनों पहलवान अखाड़े में उतर पड़े। दिलदार उत्साह से भरा था और अखाड़े के चारों ओर घूम-घूमकर अपनी मांसपेशियां दिखा रहा था। पर सुल्तान भीड़ से बेखबर अपने आप में खोया हुआ खड़ा था, जैसे उसे किसी से मतलब ही न हो।
आखिरकार मुकाबला शुरू हुआ। दिलदार शुरुआत से ही भारी पड़ रहा था। उसके दाँव-पेंचों में सुल्तान उलझकर रह जाता। लोगों की तालियों और ‘वाह-वाह’ से उसका उत्साह और बढ़ा हुआ था। सुल्तान मौका पाकर जो भी दाँव चलता, दिलदार उसकी काट तैयार कर लेता।
काफी वक्त हो गया। दोनों पहलवान डटे रहे। बार-बार लगता कि दिलदार अबकी सुल्तान को चित कर देगा। पर अंतिम क्षणों में सुल्तान अपने को बचा ले जाता।
लोग दम साधे देख रहे थे। जोश से उनकी मुट्ठियाँ कसी हुई थीं।
वक्त लगता देख दिलदार ने सुल्तान के कान में फुसफुसाकर कहा, ‘‘बस...अब खत्म करो, सुल्तान भाई!’’
पर आश्चर्य! सुल्तान ने जैसे सुना ही न हो। थोड़ी देर बाद मौका पाकर दिलदार ने उसे फिर चेताया। इस बार सुल्तान ने साफ-साफ सुना, मगर उस पर कोई फर्क न पड़ा। अब तक उत्साह से लड़ने वाले दिलदार के पैर लड़खड़ा उठे। अचानक उसकी आँखें सुल्तान की आँखों से मिलीं। सुल्तान की आँखें विजय के दृढ़ निश्चय से दीप्त हो रही थीं। दिलदार पस्त हो गया। लगा उसकी ताकत किसी ने सोख ली हो। दिल बैठने लगा। हाथ-पैर बेजान हो गए। अगले ही क्षण वह ‘धप्प’ से गिरकर चित हो गया।
‘‘माफ करना दिलदार भाई,’’ सुल्तान बोला, ‘‘मैंने अपनी आत्मा को समझाने की बहुत कोशिश की पर कामयाब न हुआ। मैं जैसा भी हूँ, ठीक हूँ। मुझे अपनी गरीबी प्यारी है। हजार तो क्या लाख रुपए में भी मैं अपनी आत्मा का सौदा नहीं कर सकता। तुम्हारे रुपए तुम्हें मुबारक हों।’’
दिलदार फटी-फटी आँखों से सुल्तान को देख रहा था।
भीड़ बेकाबू हो रही थी। बाँसों की बाड़ करकरा कर टूट गई। ‘ सुल्तान जिंदाबाद’ के नारों से आकाश गूँज उठा। सुल्तान की आँखें खुशी से भीगी हुई थीं। बच्चे भी खुशी से उछल रहे थे।

Tuesday, 20 May 2014

मियाँ चिलगोज़ा की दौड़


...और मियाँ चिलगोज़ा लड़कों से उलझ गए।
हुआ यह था कि वह बजरंगी की गुमटी पर पान खाने रुके थे। आदत थी कि पान लगवाते तो कत्था, चूना, ज़र्दा, इलायची, नारियल, क़िवाम--इतनी चीज़ें डलवाते कि बजरंगी को कहना पड़ जाता, ‘हकीम साहब, जो दो रुपए दिए हैं, कहिए तो वह भी डाल दूँ।’
आज भी जब वे पान खाने रुके तो दो रुपए वसूल करने के चक्कर में ज़र्दा ज़्यादा डलवा लिया। ज़र्दा था भी ऐसा असरदार कि उनकी कनपटियों से पसीना चू गया। उन्हें बेचैनी से सीना सहलाते देख एक मसखरे ने कहा, ‘‘हकीम साहब, ज़र्दा ज़रूर खाइए पर सेहत का भी ख्याल रखिए, ऐसा न हो कि गश खाकर गिरें तो सहारा देना पड़े।’’
बस, पाँच फुट के मियाँ चिलगोज़ा ताव खाकर दस फुट उछल गए।
‘‘बर्ख़ुरदार, पान खाना हमारा ख़ानदानी शौक़ रहा है। ज़ाफ़रान और केसर से मुअत्तर क़िवाम और ख़मीरे तुम सबने देखे भी नहीं होंगे। मियाँ, अगर महक भी ले लेते तो पाँच दिन होश न रहता। बड़े आए बातें करनेवाले!’’
‘‘कहाँ बीते ज़माने की बातें कर रहे हैं, हकीम साहब।’’ दूसरे मसखरे ने उनके ताव पर सान चढ़ाई, ‘‘जंगल में मोर नाचा किसने देखा? आज की बात करिए। आज का मुक़ाबला न तो पुराना ज़माना कर सकता है और न पुराने लोग।’’
‘‘क्या कहा...?’’ मियाँ चिलगोज़ा एक दम तवा हो गए, ‘‘अमाँ मुक़ाबला कर लो। चाहे ताक़त में, चाहे अक़्ल में, पार न पाओगे। तुम जैसों की तरह मिलावटी चीज़ें खाकर नहीं पला हूँ।’’
अब तक लोगों का मजमा इकट्ठा हो गया था। सब मज़े ले रहे थे। भीड़ में से किसी ने कहा, ‘‘हकीम साहब, ये आज के लड़के ऐसे नहीं मानेंगे। आपको ज़रूर कुछ करके दिखाना होगा।’’ 
‘‘हाँ-हाँ, अगले हफ्ते ‘क्रास-कंट्री’ दौड़ होने जा रही है। यह अच्छा मौका है। चैम्पियन बनकर सबके होश उड़ा दीजिए।’’ एक और आवाज़ आई।
‘‘हाँ-हाँ, सही कहा, यही ठीक है।’’ भीड़ ने शोर मचाया।
जोश में अच्छे-अच्छे होश खो बैठते हैं, मियाँ चिलगोज़ा तो वैसे भी बड़बोले थे। बात की बात में तय हो गया कि अगले हफ्ते होनेवाली रेस में हिस्सा लेकर और अव्वल नंबर आकर सबका मुँह बंद कर देंगे।
भीड़ अपने रास्ते चली, मियाँ चिलगोज़ा अपने रास्ते। घर तक पहुँचते-पहुँचते मियाँ चिलगोज़ा की ख़ुमारी उतर गई। अब जाकर उन्हें अहसास हुआ कि वो जोश में क्या गज़ब कर बैठे। रेस का ख़्याल आते ही टाँगें थरथराने लगीं। हालत पतली हो गई। पर लोगों के सामने ज़बान दे चुके थे, अब पीछे पलटना मुमकिन न था।
अँधेरा हुआ तो मियाँ चिलगोज़ा कंबल ओढ़कर छिपते-छिपाते हकीम बंदा मेहंदी के दवाख़ाने जा पहुँचे। हकीम साहब के बारे में लोग कहते थे कि उनके पास ऐसे-ऐसे माजून और ख़मीरे हैं कि एक हड्डी का आदमी भी दारा सिंह बन जाए। क़स्बे में जगह-जगह उनके दवाख़ाने के पोस्टर चिपके हुए थे जिनमें एक ओर दुबला-पतला, कमज़ोर और बीमार आदमी बना रहता था तो दूसरी ओर कसरती बदनवाला हट्टा-कट्टा पहलवान।
इसी उम्मीद और जादुई कायापलट की आस लेकर मियाँ चिलगोज़ा उनके दरवाज़े पहुँच गए।
सहन में किसी की आहट पाकर लालटेन की रोशनी ऊँची करते हुए हकीम साहब बोले, ‘‘वहाँ कौन है?’’
मियाँ चिलगोज़ा कंबल ओढ़े हाँफते-काँपते हकीम साहब के सामने आ खड़े हुए।
‘‘अमाँ मियाँ, इतनी गर्मी में कंबल ओढ़कर निकले हो, तबीयत तो ठीक है? मलेरिया-वलेरिया तो नहीं हो गया?’’ हकीम साहब चौंकते बोले।
‘‘ऐसा ही समझो, हकीम साहब। अपनी तो जान पर बन आई है।’’ मियाँ चिलगोज़ा ने गिड़गिड़ाते हुए सारा क़िस्सा कह सुनाया।
हकीम साहब ध्यान से सारी बात सुनते रहे। फिर उलाहना देते हुए बोले, ‘‘अमाँ, ऐसी बात कहने की ज़रूरत ही क्या थी? ये उमर और बच्चों जैसी नादानी!’’
‘‘पर अब तो जो कहना था कह दिया। किसी तरह नाक कटने से बचाइए। कभी दो क़दम तेज़ चाल से चला भी नहीं हूँ, कहाँ ये दस किलोमीटर की दौड़।’’ मियाँ चिलगोज़ा ने हाथ जोड़ लिए।
‘‘पर मियाँ, ऐसी कोई दवा भी तो नहीं है, जो रातों-रात तुम्हें मिल्खा सिंह बना सके।’’ हकीम साहब ने सिर खुजलाते हुए कहा।
‘‘तो जगह-जगह जो पोस्टर लगा रखे हैं, क्या वो सब झूठ हैं?’’ मियाँ चिलगोज़ा गरम होकर बोले।
‘‘अमाँ वे तो हाथी के दाँत हैं--ग्राहकों को फँसाने के तरीक़े।’’ हकीम साहब खिसियाकर बोले, ‘‘और हकीम तो तुम भी कहलाते हो; अपने लिए ख़ुद कोई नुसख़ा तैयार क्यों नहीं कर लेते?’’
‘‘अमाँ, मेरी जान पर बनी है और तुम्हें मज़ाक़ सूझा है।’’ मियाँ चिलगोज़ा खिसियाते हुए बोले, ‘‘मेरी हिकमत के बारे में तुम्हें तो अच्छी तरह पता है। मेरे नाम के साथ हकीम वैसे ही जुड़ा है, जैसे आजकल के लड़कों के नाम के साथ ग्रेजुएट।’’
  ‘‘वो तो ठीक है मियाँ पर इस उम्र में तुम्हें ताक़त की कोई दवा दी भी तो नहीं दी जा सकती। कमज़ोर हाज़मे के लिए वह जुलाब साबित होगी।’’ हकीम साहब सिर खुजलाते हुए बोले।
‘‘पर कुछ तो करो हकीम साहब, वर्ना मैं कहीं मुँह दिखाने के क़ाबिल नहीं रहूँगा।’’
‘‘एक रास्ता है...तुम अपने चचा के पास रामपुर चले जाओ।’’
‘‘अमाँ, ये उपाय है कि हँसी उड़वाने का माकूल इंतज़ाम? लौटकर आऊँगा तो लोग ताने दे-देकर जान नहीं ले-लेंगे।’’
‘‘मियाँ, पूरी बात तो सुनो...’’ हकीम साहब बताने लगे, ‘‘सुबह के ग्यारह बजे जब पान की गुमटी पर सबसे ज़्यादा भीड़ होती है, मैं तुम्हारा चचा बनकर बजरंगी के पास फोन करूँगा कि तबीयत बहुत ख़राब है। बस आज-कल का मेहमान हूँ। आ जाओ तुम्हारे दीदार में ही रुह अटकी है।’’
‘‘वाह-वाह, क्या आइडिया है! मेरे फोन तो वैसे भी बजरंगी के ही पास आते हैं। इस तरह लोगों को शक भी नहीं होगा।’’ मियाँ चिलगोज़ा ख़ुशी से उछल पड़े।
दूसरे दिन सुबह से ही मियाँ चिलगोज़ा पान की दूकान पर जा बैठे। वे पहुँचे तो भीड़ भी आ जुटी। हँसी-ठट्ठा मचने लगा।
अभी साढ़े दस ही बजा था कि बजरंगी पानवाले का मोबाइल टिनमिनाने लगा। कान से सटाकर ‘हलो’ कहते ही बजरंगी सिटपिटा गया और फोन मियाँ चिलगोज़ा को थमाता हुआ फुसफुसाया, ‘‘आपके चचाजान हैं, रामपुर से..’’
मियाँ चिलगोज़ा का मन बल्लियों उछल पड़ा। भीतर ही भीतर पफूलते हुए फोन कान से लगाया तो उधर से आवाज़ आई--‘‘अमाँ मियाँ, क्या हाल-चाल हैं? सुनने में आया है कि तुमने दस किलोमीटर की दौड़ में हिस्सा लेने का फैसला किया है। ये बहुत अच्छी बात है। तुम मेरे असली भतीजे हो। मैं कल सुबह की गाड़ी से आ रहा हूँ, तुम्हें दौड़ की बारीकियाँ सिखाने।’’
अरे, बाप रे! ये तो सचमुच चचा थे। दौड़ में भाग लेने की ख़बर उन तक भी जा पहुँची थी। मियाँ चिलगोज़ा को लगा कि हार्ट-फेल हो जाएगा। फोन फेंककर सीधे हकीम साहब के घर जा पहुँचे।
सारी बात जानकर हकीम साहब भी सकते में आ गए। मियाँ चिलगोज़ा उनके बचपन के दोस्त थे, उनकी दुख-तकलीफ में वे हमेशा बराबर के शरीक रहे थे। उन्हें भी नहीं समझ में आ रहा था कि करें तो क्या करें। एक रास्ता था, वह भी हाथ से निकल गया। 
मियाँ चिलगोज़ा मायूस होते हुए बोले, ‘‘हकीम साहब, आपकी दवाएँ बीमारी ठीक करती हैं। पर कोई ऐसी नहीं है जो बीमार कर दे? कम से कम इसी बहाने बच जाऊँ।’’
‘‘लेकिन बुखार और दस्त से भी क्या होगा?’’ हकीम साहब दाढ़ी खुजलाते हुए बोले, ‘‘लोग समझेंगे बहाना बना रहे हैं। काम तो तब बनेगा जब कोई ज़ाहिरी बात हो, जैसे--टाँग टूट जाए, चोट लग जाए...’’
सुनते-सुनते मियाँ चिलगोज़ा अचानक उठ खड़े हुए और घर की ओर चल पड़े। उनका चेहरा तमतमाया हुआ था। वह मन ही मन कोई निर्णय ले चुके थे।
घर पहुँचकर मियाँ चिलगोज़ा ने आव देखा न ताव, सीधे छत पर पहुँचे और आँख बंद करके, हिम्मत जुटाकर नीचे कूद पड़े।
हवा में अरा...रा...रा... ‘ध्म्म’ होते ही मियाँ चिलगोज़ा लगे चिल्लाने, ‘‘हाय मर गया, मर गया, टाँग टूट गई। बचाओ।’’
पर उनकी आवाज़ के साथ-साथ एक और आवाज़ सुनाई दी, उनसे भी ज़्यादा तेज़, ‘‘हाय मर गया, मर गया, कमर टूट गई। बचाओ।’’
मियाँ चिलगोज़ा ने नीचे देखा तो पता चला कि वो जिस गद्दे पर गिरे थे और सोच रहे थे लोग नाहक ही गिरने से डरते हैं, वह और कोई नहीं कल्लन था, जो दीवार की टेक लेकर आराम फ़रमाने बैठा था। मियाँ चिलगोज़ा को तो कुछ नहीं हुआ पर कल्लन की पीठ दोहरी हो गई। यह आइडिया भी फेल हो गया। मियाँ चिलगोज़ा मुँह लटकाए फिर हकीम साहब के पास जा पहुँचे और लगे बिसूरने।
हकीम साहब बड़ी देर तक ख़ामोश रहे, फिर बोले, ‘‘अब तो बस एक ही सूरत नज़र आती है। कल दौड़ में नाम लिखाने की आख़िरी तारीख़ है। तुम घर पर चादर तानकर सो जाना। कोई पूछे तो कह देना याद ही नहीं रहा।’’
अगले दिन मियाँ चिलगोज़ा की नींद हालाँकि अलस्सुबह उचट गई, पर वे दम साधकर पड़े रहे। सूरज सिर पर आ गया, सड़कों पर चहल-पहल शुरू हो गई, पर मियाँ चिलगोज़ा न जागे। किसी तरह दोपहर दो बजे तक तो उन्हें सोना ही था।
ख़ुदा-ख़ुदा करके दो बजे। वह चादर फेंककर उठने ही वाले थे कि दरवाज़े पर दस्तक हुई। मियाँ चिलगोज़ा ने आँखें मिचमिचाते और झूठी जम्हाइयाँ लेते हुए दरवाज़ा खोला तो सामने रब्बू खड़ा था।
 ‘‘मियाँ साहब, आज नाम लिखाने की आख़िरी तारीख़ थी। आप नहीं पहुँचे तो चेयरमैन साहब ने अपने पास से फीस जमा करके आपका नाम लिखा दिया।’’ रब्बू ने बताया।
मियाँ चिलगोज़ा को लगा अभी गश खाकर गिर पड़ेंगे। न रोते बन रहा था, न हँसते। इतनी मेहनत की, जान की बाज़ी लगाई, पर सब बेकार। अब तो दौड़ में हिस्सा लेना ही था।
आख़िरकार दौड़ का दिन आ गया। सब लोग नगर पालिका के मैदान में इकट्ठा हो गए। मियाँ चिलगोज़ा सबसे किनारे जाकर खड़े हो गए। ख़ूब हँसी-मज़ाक़ हो रहा था। दौड़नेवाले खिलाड़ी जोश में उछल रहे थे। लोग चिल्ला-चिल्लाकर उनका हौसला बढ़ा रहे थे।
दौड़ शुरू हुई। सब भाग चले। मियाँ चिलगोज़ा भी दौड़ पड़े। अब तो उनके सामने एक ही रास्ता बचा था--करो या मरो। थोड़ी ही देर में उनकी साँसें धौंकनी की तरह चलने लगीं, कान की लवें लाल हो गईं, सीने पर जैसे कोई हथौड़े मारने लगा। पर रुक रहना अब उनके बस में नहीं था।
मियाँ चिलगोज़ा दौड़ते रहे-दौड़ते रहे। जाने कितनी देर तक दौड़ते रहे। जब फिनिशि-लाइन पर पहुँचे तो धुँधलाती आँखों से इतना ही दिखा कि बाक़ी सब खिलाड़ी पहुँचकर उनका ही इंतज़ार देख रहे हैं।
फिनिशि-लाइन पार करते-करते मियाँ चिलगोज़ा ढह गए।
तभी उनके कानों में उद्घोषक की आवाज़ पहुँची। वह कह रहा था, ‘‘आज की दौड़-प्रतियोगिता में एक सबसे ख़ास पुरस्कार दिया जा रहा है, जिसके विजेता हैं- हकीम चिलगोज़ा। और यह पुरस्कार है--रेस में सबसे पीछे रहने का पुरस्कार।’’
मियाँ चिलगोज़ा ने तालियों की गड़गड़ाहट सुनी तो फूलकर कुप्पा हो गए। पर होश खोने से पहले उन्होंने उद्घोषक की आख़िरी लाइन नहीं सुनी।


Sunday, 4 May 2014

वह कौन था ?

जियांग बड़ी देर से चट्टान की ओट में खड़ा बारिश रुकने का इंतज़ार कर रहा था। अभी एक घंटा पहले आसमान बिल्कुल साफ था। जियांग को उम्मीद थी कि अँधेरा होते-होते वह घर पहुँच जाएगा। पर बादल ऐसे घिरे कि दो क़दम चलना मुश्किल हो गया। वह बार-बार आसमान की ओर लाचार दृष्टि से ताककर ईश्वर से प्रार्थना कर रहा था। उसे पता था कि घंटा भर पानी और न थमा तो वापस जाना असंभव हो जाएगा। फिसलन भरे पहाड़ी रास्तों पर अँधेरे में चढ़ना काल को दावत देना होगा। जियांग था भी डरपोक। अँधेरे में जाते उसकी जान निकलती थी। इस समय वह बुरी तरह घबराया हुआ था।
आज बहुत दिनों के बाद जियांग मैदानी क्षेत्र में लगने वाले बाज़ार आया था। आते समय बच्चों ने मिठाइयाँ और खिलौने लाने की ज़िद की थी और पत्नी ने कोई अच्छा-सा तोहफ़ा लाने को कहा था। उसने बच्चों के लिए खेल-खिलौने तो ले लिए थे, लेकिन पत्नी के लिए क्या लेकर जाए, समझ नहीं आ रहा था। पूरा बाज़ार छानकर भी उसे कोई ऐसी चीज़ नहीं मिल पा रही थी जिसे पाकर पत्नी ख़ुश हो जाए। जो मिल रही थीं, वह उसके सामर्थ्य के बाहर थीं। जियांग परेशान था कि लौटकर पत्नी को क्या जवाब देगा। वह बेचारी दुखी हो जाएगी।
वैसे, वह सुखी ही कब थी ?
जैसे-जैसे अँधेरा गहरा रहा था, जियांग की घबराहट बढ़ती जा रही थी। बूँदें अभी भी पड़ रही थीं। अब यह तो तय ही हो गया था कि जियांग को रात उसी चट्टान की आड़ में गुज़ारनी है। हारकर वह चुपचाप बैठ गया। वह उस घड़ी को कोस रहा था, जब घर से निकलना हुआ था। उसे बार-बार अपने प्यारे घर की याद आ रही थी, जहाँ वह इस समय लेटकर बच्चों को कहानियाँ सुना रहा होता था।
एक तो भूख, दूसरे ठंडक, ऊपर से डरावनी रात--जियांग की हालत ख़राब हो रही थी। वह एक कोने में सिमटा पड़ा भगवान का नाम ले रहा था। ज़रा-सी खटपट पर अँधेरे में नज़रें फाड़कर देखने लगता।
                बैठे-बैठे जियांग ऊँघने लगा। नींद का झोंका आने ही वाला था कि अचानक किसी के खखारने की आवाज़ से उसकी आँखें खुल गईं। अँधेरे में आँखें फाड़-फाड़कर देखने पर भी उसे कुछ नहीं सूझा। इधर -उधर  नज़रें दौड़ाते हुए जब उसने बाईं ओर देखा तो सफेद पड़ गया। चट्टान पर एक धुँधली आकृति बैठी भीग रही थी। एकदम शांत, निश्चल। न तो उस पर बारिश का असर था और न ही ठंडी हवाओं का। जियांग की तो जान ही निकल गई। वह डर के मारे थरथरा उठा। मन में तरह-तरह के ख़्याल आने लगे। उसने हिम्मत करके काँपती हुई आवाज़ में पूछा, ‘‘क...कौन है वहाँ?’’
उधर  से कोई उत्तर न आया। बस, उसकी ही आवाज़ गहरी घटियों में गूँजकर वापस लौट आई।
जियांग अँधेरे में और सिमट गया। उसे दोरमी की बात याद आने लगी, जिसने बताया था कि ऐसी ही बारिश में रग्गी नाम के बूढ़े की घटियों में गिरकर मृत्यु हो गई थी। अब उसकी आत्मा रात के अँधेरे में रास्तों पर भटका करती है। बहुत से लोगों ने उसे देखा भी है। यह ख़्याल आते ही जियांग सिर से पैर तक थरथरा गया। वह हाथ जोड़कर भगवान से प्रार्थना करने लगा। उसे बार-बार अपने प्यारे बच्चों और पत्नी की याद आ रही थी।
जियांग ने एक बार फिर डरते हुए उस धुँधली आकृति की ओर देखा। उसे लगा कि यह सचमुच रग्गी की आत्मा है। वैसा ही घुटा सिर, वैसी ही झुकी हुई कमर। जियांग ने डर के मारे आँखें बंद कर लीं और भगवान को याद करने लगा। इसी उहापोह में कब उसकी आँख लग गई पता ही न चला।
सुबह सूरज की किरणों से जियांग की नींद टूटी। आसमान बिल्कुल साफ था। लगता ही नहीं था कि रात भर घनघोर बारिश हुई हो। हड़बड़ाकर उठते हुए उसने सबसे पहले उधर  ही निगाह दौड़ाई, जिधर वह आकृति बैठी थी। वहाँ जो कुछ भी था उसे देखकर पहली बार उसे अपने डरपोक स्वभाव पर हँसी आई। वहाँ कुछ और नहीं सिर्फ एक चट्टान पड़ी थी, जो दूर से देखने पर झुककर बैठे आदमी की तरह लगती थी।
जियांग उसके पास गया। उसे छूकर देखा। सचमुच, जिसे भूत समझकर वह रात भर डरता रहा, वह बाहर कहीं नहीं उसके मन में ही बैठा था। जियांग अपने आप पर हँस पड़ा। उसने उसी क्षण तय कर लिया कि आगे से वह कभी नहीं डरेगा और मन में बैठे भय को दूर भगा देगा।

                जियांग एक पहाड़ी गीत गाता हुआ घर वापस लौट चला।  अब वह पहले वाला डरपोक जियांग नहीं रहा था। उसने मन में बैठे डर को दूर भगा दिया था। पत्नी ने कोई अच्छा-सा तोहफ़ा लाने को कहा था। अब वह बदले हुए जियांग के रूप में सचमुच एक अच्छा-सा तोहफ़ा लेकर लौट रहा था।