Thursday, 28 September 2017

हज़ार हाथों वाला


इस बार मैंने सोच रखा था कि पूरी छुट्टी नानी के घर मौज-मस्ती में बिताऊँगा, पर क़िस्मत की ऐसी मार कि वहाँ जाते ही बीमार पड़ गया। बीमार भी ऐसा कि पूरा महीना बिस्तर पर गुज़रा। हकीम साहब ने बताया कि मियादी बुख़ार है। हकीम साहब यानी हमारे नाना। हालाँकि उनका नाम मौलवी हबीबुर्रहमान था, पर गाँव-जवार के लोग उन्हें हकीम साहब ही कहा करते थे। और यह नाम ऐसा चल पड़ा था कि वह हम लोगों के लिए भी हकीम साहब ही हो गए थे।

हकीमी उनका पेशा नहीं थी, यह काम वह शौकिया ही करते थे। शौक भी ऐसा कि किसी की बीमारी सुन लें तो फिर रात-दिन की परवाह नहीं करते थे। जड़ी-बूटियाँ तलाशने, उनकी कुटाई-पिसाई करने और दवाएँ बनाने में दिन के दिन लग जाते, रुपए खर्च होते; पर मजाल कि किसी से एक पैसा भी ले लें। हालाँकि लोग ठीक हो जाते तो बड़ी-बड़ी सौगातें लेकर आते, पर नाना मोहब्बत के साथ उन्हें मना कर देते।
नाना ने मेरी नब्ज़ टटोलकर स्पष्ट कर दिया कि मियादी बुख़ार है, पंद्रह-बीस दिनों से पहले नहीं जाएगा। मेरी सेहत तो वैसे भी माशाअल्लाह थी, बुख़ार ने चढ़ाई की तो सीधे बिस्तर पर आ गया।
मेरी चारपाई अम्मी के पास ज़नानख़ाने में लगा दी गई। मैं दिनभर वहीं पड़ा रहता। मामियाँ अफसोस जताते हुए कहतीं, ‘‘कैसा ज़ुल्म हुआ है, मासूम पर। कहाँ तो एक पल घर में क़दम न टिकते थे, और कहाँ बेचारा बेबस पड़ा हुआ है।’’
बात सही थी। मेरा पूरा दिन भाग-दौड़ और शैतानियों में बीतता था। इधर से उधर, उधर से इधर। बेमकसद की उछलकूद और ऊधमबाज़ी। डाँट पड़ी तो मासूम बन गए और नज़रें ओट हुईं तो फिर वही धमाचौकड़ी शुरू।
अब तो दिन भर बिस्तर पर पड़े-पड़े मैं ऊब जाता। लगता दुनिया से कटा हुआ हूँ। ज़नानख़ाने में घर के मर्द बेमौके कम ही आया करते थे। आते भी तो खाँस-खखारकर। नाना तो अंदर बहुत कम ही आते थे। ज़रूरत हुई तो आए और फौरन वापस हो लिए। पर जब नाना अंदर आते तो हलचल मच जाती। अलगनियों से कपड़े हटा लिए जाते। कूड़े की टोकरी पेड़ की ओट कर दी जाती। जहाँ कहीं भी फूल-पत्तियाँ बिखरी होतीं, फटाफट उन पर झाड़ू चलने लगती। सबके सिर पर दुपट्टे खिंच जाते। पूरा वातावरण एक अनोखे अनुशासन में बँध जाता।
बहुएँ ओट होकर नानी से सलाम पहुँचाने का इशारा करतीं। नानी हँसकर कहतीं, ‘‘हकीम साहब, इन लोगों की भी सुन लीजिए। बड़ी, मँझली, छोटी सब आपको सलाम कह रही हैं।’’
‘‘खुश रहें, जीती रहें, सलामत रहें...’’ और नाना की आँखें भीग जातीं। वह थोड़ी देर बैठते, सबका हाल-चाल पूछते और नानी के हाथ से एक गिलास पानी पीकर वापस चले जाते।
अंदर ज़नानख़ाने में पड़ा-पड़ा मैं ऊबता रहता। यह तो भला हो शद्दू का कि वह शाम को पास बैठकर दिन भर की कहानी सुना जाता। शद्दू मेरा ममेरा भाई था। हालाँकि महमूद, सिराज और अच्छन से भी मेरी ख़ूब पटती थी। पर अब वे बड़े हो गए थे और इधर कम आते थे। शद्दू छोटा था इसलिए दिन भर इधर से उधर करता रहता। नानी का तो वह सबसे दुलारा था।
एक दिन वह ढलती दोपहर में वह मेरे पास आया। गर्मी से तपकर उसका चेहरा सुर्ख़ हो रहा था। होठों के ऊपर पसीने की नन्हीं-नन्हीं बूँदें जमी हुई थीं और कुर्ता गीला होकर बदन से चिपक गया था।
वह बेवक़्त मिलने कभी नहीं आता था। मुझे बड़ी हैरानी हुई। गर्मी की ऊँघ भरी दोपहरी में उसका आना थोड़ा बुरा भी लगा। मैंने पूछा, ‘‘शद्दू इस वक्त कैसे ?’’
शद्दू पायताने बैठ गया। उसने मेरी बात का जवाब नहीं दिया। पर जाने किस नाराज़गी में और किसको कहा, ‘‘कमबख़्त...!’’
‘‘क्या हुआ ? किस पर गर्मी उतार रहे हो ?’’ मैंने पूछा।
‘‘अरे वही...जाने जिन्न है कि भूत। पतले से पतले पेड़ पर ऐसे सरसराते हुए चढ़ता है कि बंदर क्या चढ़ेगा। तुम्हें तो पता है कि तोतापरी कितना सीधा और लंबा है ?’’
‘‘हाँ, मगर कौन ?’’
‘‘अरे वही बदमाश...’’
‘‘शद्दू...!’’ तभी दूसरे कमरे से बड़ी मामी की आवाज गूँजी, ‘‘ऐसी बातें गंदे बच्चे करते हैं। बाहर धूप है। चलो, लेटकर आराम करो।’’
ज़नानख़ाने में बड़ी मामी का बहुत रोब चलता था। शद्दू डर के मारे कमरे से निकल भागा। मुझे कोई रास्ता न सूझा तो हड़बड़ाहट में आँखें बंद कर लीं और सोने का नाटक करने लगा।
शद्दू मेरे सामने एक पहेली छोड़ गया था। उन दिनों मैं बिस्तर पर पड़े-पड़े हलचल-विहीन दिन बिता रहा, इसलिए यह छोटी-सी बात भी मेरे लिए कौतूहल का विषय बन गई।
उस शाम शद्दू मेरे पास नहीं आया। हालाँकि मुझे पूरी उम्मीद थी कि वह चाहे एक मिनट के लिए आए, पर आएगा ज़रूर। लेकिन उसने झलक तक नहीं दिखाई।
सुबह के वक़्त मेरी चारपाई दालान में कर दी जाती थी। मैं दीवार की टेक लगाए आड़ू के पेड़ पर बुलबुल की उछल-कूद देख रहा था। तभी मुझे शद्दू दिखाई पड़ा। वह तेज़ी से बाहर की ओर भागा जा रहा था। मैंने पुकारा, ‘‘शद्दू...!’’
शद्दू लपककर आया और हाँफता हुआ बोला, ‘‘जा रहा हूँ। आज गुल्ली-डंडा का मैदान बदा है। देखना, आज उसे हराकर आऊँगा।’’
इससे पहले कि मैं कोई और सवाल करता, वह कमान से छूटा हुआ तीर हो चुका था।
शद्दू दोपहर बाद वापस आया। उसका चेहरा उतरा हुआ था। निगाहें झुकी हुई थीं।
मैंने पूछा, ‘‘क्या हुआ ? कौन जीता ?’’
‘‘वही, और कौन जीतेगा। मुझे उससे नफरत हो गई है।’’ शद्दू का चेहरा विकृत हो रहा था।
‘‘वो कौन...?’’ मैं झल्लाया।
‘‘रऊफ, जब्बार तेली का लड़का। जाने उसके पास कौन-सा मंतर है कि कभी हारता ही नहीं।’’
‘‘अच्छन भाई को साथ लिए गए होते।’’
‘‘वो भी गए थे, और महमूद भाईजान भी। पर उसने सबको हरा दिया।’’
‘‘अच्छा...!’’ मेरा मुँह हैरत से खुल गया, ‘‘वह इतना अच्छा खिलाड़ी है ?’’
शद्दू ने जैसे मेरी बात नहीं सुनी। वह इधर-उधर देख रहा था। उसकी निगाहों में इस वक़्त कैसा भाव था, बता नहीं सकता। आस-पास सन्नाटा देखकर उसने कमर से चाकू निकाला और फुसफुसाता हुआ बोला, ‘‘मैं उसे मार दूँगा।’’
उसके हाथ में अमिया काटने वाला चाकू देखकर मुझे हँसी आ गई।
‘‘यह तुम्हें कहाँ से मिला ?’’ मैंने उसे डाँटने के अंदाज़ में पूछा।
‘‘गाँव के लुहार से ढाई रुपए का लेकर आया हूँ।’’
‘‘बेवकूफ, यह भी कोई तरीक़ा हुआ ?’’ मैंने कहा, ‘‘यह तो कमज़ोर और बेइमान लोगों का ढंग है। तुम्हें अगर जीत हासिल करनी है तो उसे हराना सीखो। गुल्ली-डंडा न सही, दौड़ लगा लो। तुम तो बहुत तेज़ दौड़ते हो।’’
‘‘वह दौड़ में भी हरा चुका है।’’
‘‘तो...’’ मैंने सोचते हुए कहा, ‘‘लंबी कूद या तैराकी ?’’
‘‘उसे सब कुछ आता है।’’
‘‘बाप रे...’’ मेरे मुँह से एकाएक निकला। मैं सोचने लगा कि उसके अंदर ऐसी कौन-सी ख़ासियत छिपी है जो वह किसी खेल में हारता ही नहीं। अच्छन भाई तो ख़ासे मज़बूत हैं। उन्हें वह भला कैसे हरा देता है। इसका मतलब वह काफी ताक़तवर और लंबा-चौड़ा है।
इस बीच शद्दू अपना चाकू पलंग पर छोड़कर कब चला गया, पता ही न चला। मैं दिन भर उसी लड़के के बारे में सोचता रहा।
अगली सुबह सिराज भाई हाल पूछने आए तो मैंने उस लड़के के बारे में पूछा।
‘‘वह तो जादूगर है,’’ उनकी आवाज़ में प्रशंसा का भाव था, ‘‘तुम ठीक हो जाओ तो उससे मिलवाऊँगा। उससे मिलकर तुम्हें अच्छा लगेगा। ऐसा कौन-सा काम है जो वह न कर पाता हो। सचमुच, हैरत होती है। परसों उसने बब्बन चच्चा को साइकिल रेस में हरा दिया।’’
मैं सुनता रहा और उसके बारे में तरह-तरह की कल्पनाएँ करता रहा।
कुछ दिन की बात है। मैं थोड़ा-थोड़ा ठीक होने लगा था। आँगन में थोड़ा-बहुत टहल-घूम लेता था।
अचानक एक सुबह बाहर तेज़ शोरगुल सुनाई दिया। उस चीख़-पुकार में रोने की आवाजें़ भी शामिल थीं।
मर्दानख़ाने के सारे लोग बाहर की ओर लपके। शद्दू भी नाश्ता छोड़कर तीर की तरह बाहर की ओर दौड़ा। मैं भी हिम्मत करके बाहर निकला। चबूतरे पर खड़े होकर देखा तो सामने बने कुएँ की जगत पर भीड़ लगी थी। लोग कुएँ के अंदर झुके जा रहे थे। ‘रस्सी लाओ!,’ ‘बाल्टी लाओ!’ का शोर मच रहा था। एक तरफ माथे तक घूँघट काढ़े औरतों का झुंड खड़ा था। वे चीख़-पुकार मचा रही थीं। कुछ रो भी रही थीं।
अज्जू जुलाहा बदहवासी से इधर-उधर दौड़ रहा था। उसका दो साल का बच्चा खेलते-खेलते कुँए में गिर गया था। अज्जू चीख-चीखकर जान दिए दे रहा था। एक बार तो उसने ख़ुद भी कुएँ में कूदने की कोशिश की, पर लोगों ने थाम लिया।
तभी रस्सी और बाल्टी आ गई। फिर भी क़ामयाबी मिलने की उम्मीद कम थी, क्योंकि बच्चा छोटा था और डर के मारे निढाल हो चुका था।
तभी भीड़ को चीरता हुआ एक दुबला-पतला लड़का आया और इससे पहले कि कोई कुछ समझता वह कुएँ में कूद पड़ा। मैं उसे ठीक से देख न पाया। बस, उसकी मटमैली और बदरंग कमीज़ ही निगाह में आई। मैं सोचता रह गया कि यह जाँबाज़ भला कौन है।
तभी शोर उठा--‘‘रऊफ कुएँ में कूद गया!’’
मेरा हृदय उत्तेजना से धड़क उठा। मैंने आँखें गड़ा दीं। आज हर हाल में मैं उस लड़के को देख लेना चाहता था और मन की सारी जिज्ञासाओं को मिटा डालना चाहता था।
थोड़ी ही देर में रस्सी के सहारे एक लड़का कुएँ से ऊपर आता दिखा। लोग चिल्लाए--‘‘बच्चा बच गया! रऊफ ने बचा लिया!’’
बाहर आते ही लोगों ने रऊफ को कंधें पर उठा लिया। उसे देखकर मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा। यक़ीन न हुआ कि जो देख रहा हूँ वह सच है या झूठ। जिसे मैं लंबा-चौड़ा और ताक़तवर समझ रहा था वह उससे बिल्कुल उल्टा था। छोटे कद का दुबला-पतला साँवला-सा लड़का। और सबसे बड़ी बात, जिस पर मुझे ही नहीं किसी को भी हैरत होती, वह यह कि उसका एक हाथ बाजू के पास से कटा हुआ था। सचमुच, इससे बड़ा आश्चर्य मुझे ज़िंदगी में कभी नहीं हुआ।

मेरा मन उसके सम्मान में झुक गया। मुझे लगा कि हम लोग सही-सलामत और दो-दो हाथ वाले होकर भी बेकार हैं; और उसका एक हाथ भी हज़ार हाथों से बढ़कर है।

Sunday, 27 August 2017

मेरी बाल कहानियाँ : निक्की को न मत कहना

मेरी बाल कहानियाँ : निक्की को न मत कहना

निक्की को न मत कहना



‘‘पापा...कहाँ हैं आप?’’
निक्की की आवाज़ पाते ही पापा हड़बड़ा गए। पाँच मिनट पहले निक्की ने चाय का कप लाकर उनकी मेज़ पर रखा था। वह अब भी वैसे का वैसा रखा था। पापा की आदत ऐसी थी कि काम में उलझते तो होश न रहता। पर निक्की भी घर की दारोग़ा है। उसके रहते कुछ भी गड़बड़ नहीं हो सकती। घर में उसका सब पर रोब चलता है। मजाल है किसी की जो कमरे का पंखा चलता छोड़ दे, गीज़र बंद करना भूल जाए, ऊँची आवाज़ में टीवी चला ले। कब खाना खाया जाएगा, कब पढ़ाई होगी, कब टीवी देखा जाएगा यह सब निक्की ही तय करती है। दादी की शह पर उसके हौसले और भी बढ़े हुए हैं। घरवाले उसे हिटलर कहते हैं।
जब तक निक्की कमरे में आती-आती पापा लंबे घूँट से चाय का कप ख़ाली कर चुके थे।
‘‘मैं...मैं चाय पी चुका, ठंडी होने से पहले, सचमुच,’’ पापा हड़बड़ाते हुए बोले।
चोर की दाढ़ी में तिनका। वह कहने तो कुछ और आई थी, मगर पापा की हड़बड़ी ने सारा राज़ खोल दिया।
‘‘हूँ...,’’ निक्की ने सिर हिलाया, ‘‘पर मैं तो दूसरी शिकायत लेकर आई थी?’’
‘‘दूसरी? कौन-सी?’’ पापा हैरानी से बोले।
‘‘वॉशबेसिन का टैप किसने खुला छोड़ दिया था?’’
पापा लैपटॉप पर नज़र गड़ाए-गड़ाए थक जाते थे। उनकी आदत थी कि बीच-बीच में उठकर ठंडे पानी से आँखें धुल लिया करते थे।
‘‘नहीं-नहीं, मैंने तो बंद कर दिया था। कोई और रहा होगा। रजत होगा। चाहे पूछकर देख लो। सच कह रहा हूँ,’’ पापा अटक-अटककर बोले। उन्हें याद तो नहीं आ रहा था। पर इतना समझ गए थे कि निक्की कह रही है तो सही होगा।
‘‘और कोई नहीं सिर्फ आप थे। आपने बंद ज़रूर किया था, मगर पूरी तरह से नहीं।’’
‘‘पर यह तो बहुत छोटी-सी ग़लती है। इसके लिए...’’ पापा ने कहा।
‘‘छोटी-सी ग़लती?’’ इससे पहले कि पापा बात पूरी करते निक्की शुरू हो गई। और निक्की जब शुरू हो जाती है तो उसे रोकना आसान नहीं, ‘‘आपको पता है कि पानी हमारे जीवन के लिए कितना महत्वपूर्ण है? भले ही हमारी धरती का दो तिहाई हिस्सा पानी से ढका है, पर उस दो तिहाई हिस्से में पीने योग्य पानी का प्रतिशत सिर्फ 2.5 है। बाक़ी 97.5 प्रतिशत पानी खारा है, जो हमारे किसी काम का नहीं। इस 2.5 प्रतिशत में भी सिर्फ 1 प्रतिशत पानी तरल रूप में है, बाक़ी ग्लेशियरों में जमा है। आपको पता है कि पानी की बरबादी करके आप आने वाली पीढ़ियों के लिए कितना ग़लत कर रहे हैं?’’
पापा ने हाथ जोड़ लिए, ‘‘ठीक है, दादी अम्मा, आगे से ऐसा नहीं होगा।’’
निक्की लौटी तो लॉबी में बैठे चाचा अख़बार पढ़ रहे थे। लॉबी में ट्यूब लाइट की रोशनी फैली हुई थी। निक्की ने आगे बढ़कर लाइट ऑफ कर दी। चाचा नाराज़ होते हुए बोले, ‘‘निक्की...मैं पढ़ रहा हूँ न?’’
‘‘तो पढ़ने के लिए दिन में लाइट जलाने की ज़रूरत पड़ती है क्या?’’ कहते हुए निक्की ने खिड़की के पर्दे हटा दिए।
चाचा की नाराज़गी का गुब्बारा फुस्स हो गया। वह झेंपते हुए बोले, ‘‘सॉरी...’’
तभी उन दोनों की बातचीत सुनकर मम्मी वहाँ आ गईं। निक्की ने मम्मी की ओर देखते हुए शिकायती लहज़े में टोका, ‘‘मम्मी आप शायद कुछ भूल रही हैं...!’’
‘उफ...’ मम्मी उल्टे पैरों वापस दौड़ीं। उन्होंने कमरे का पंखा चलता छोड़ दिया था।
‘‘ओफ़्फ़ोह! आप लोगों को समझ में क्यों नहीं आता है कि बिजली बचाना कितना ज़रूरी है। हमारे पास पैसे हैं, हम बिल भरने में समर्थ हैं, तो इसका मतलब यह नहीं कि बिना ज़रूरत के बिजली फूँकें...’’
‘‘बस करो जी, बस करो। हमने मान ली अपनी ग़लती।’’ चाचा हाथ जोड़कर दुहरे होते हुए बोले।
निक्की हँस पड़ी।
तभी दादी ने प्रवेश किया। वह नाली में काग़ज़ और रैपर डालते बच्चों को डाँट पिलाकर आई थीं। कहने लगीं, ‘‘इस घर में कोई भुलक्कड़ है, कोई आलसी। कोई लापरवाह, कोई कामचोर। एक अकेली बेचारी बच्ची किस-किस को समझाए।’’
दादी को देखते ही निक्की उनसे लिपटकर बोली, ‘‘दादी, कल मेरे स्कूल में पेंटिंग का कॉम्पिटीशन है। मैंने पेंटिंग तो तैयार कर ली है। पर उसका फ्रेम बनाने के लिए कुछ सामान चाहिए। आप मेरे साथ बाज़ार चलेंगी?’’
‘‘क्यों नहीं मेरी बच्ची, बस अभी तैयार होकर आती हूँ।’’
निक्की दादी के साथ बाज़ार चली गई। टोका-टाकी करने में निक्की अपनी दादी से कम न थी, इसलिए दादी से उसकी ख़ूब बनती थी। दादी हमेशा उस पर अपना प्यार उड़ेलती रहती थीं।
निक्की के जाते ही मम्मी ने रजत को आवाज़ दी, ‘‘कहाँ हो बेटा? जल्दी-जल्दी होमवर्क निपटा लो। वर्ना, निक्की आते ही ख़बर लेगी।’’
मम्मी के दोबारा पुकारने पर रजत कमरे से निकला तो उसका चेहरा लटका हुआ था।
‘‘क्या हुआ?’’ मम्मी ने हैरानी से पूछा।
रजत कुछ न बोला। बस मम्मी का हाथ पकड़कर दीदी के कमरे की ओर ले गया। कमरे का दृश्य देखते ही मम्मी के होश उड़ गए। निक्की की पेंटिंग ज़मीन पर पड़ी थी और उस पर दूध का गिलास औंधा पड़ा था। पेंटिंग का रंग दूध में घुलकर पूरे कमरे में फैल रहा था।
मम्मी ने सिर पकड़ लिया, ‘‘हे भगवान! यह कैसे हुआ?’’
‘‘मुझसे गिर गया...’’ रजत सिसकता हुआ बोला।
‘‘निक्की ने कितनी मेहनत से यह पेंटिंग तैयार की थी। अब तो वह आते ही सारा घर आसमान पर उठा लेगी। अम्मा भी बहुत डाँट पिलाएँगी।’’ मम्मी की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें।
पापा और चाचा को पता चला तो वे भी बहुत घबराए। सबने रजत को ख़ूब डाँट पिलाई। पर रजत को डाँट लेना समस्या का हल नहीं था। आपस में सलाह-मशविरा हुआ। सबने तय किया कि सुबूत मिटाकर सारा इल्ज़ाम बिल्ली पर मढ़ दिया जाए। योजना के अनुसार सफाई अभियान शुरू हो गया।
पर जब कोई काम कम समय पर निपटाना हो तो घड़ी की सुइयाँ ऐसे भागती हैं जैसे टेबिल फैन। अभी पूरा काम निपटा भी नहीं था कि निक्की और दादी लौट आईं। सबके सब घबरा गए कि अब क्या होगा?
किसी को कुछ बताने की ज़रूरत नहीं पड़ी। घर में क़दम रखते ही निक्की को सारा माजरा समझ में आ गया। पेंटिंग की ऐसी हालत देखकर उसका पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया।
‘‘किसने किया यह सब?’’ वह चीख़ी।
एक पल को घर में सन्नाटा छा गया। हाथ में बाल्टी-वाइपर लिए और पैंट के पायचे समेटे खड़े पापा और चाचा जैसे स्टेच्यू हो गए। मम्मी की ज़ुबान तालू से लग गई। रजत के चेहरे का रंग उड़ गया।
‘‘सब काम ख़राब कर दिया। इस मूर्ख रजत के दिमाग़ में तो कोई बात घुसती ही नहीं। कितनी बार मना किया कि मेरे कमरे की ओर मत जाया करो। पर कोई बात कान से सुने तब न?’’ कहते-कहते निक्की मम्मी-पापा की ओर मुड़ी और कहने लगी, ‘‘पर आप लोग तो समझदार हैं न? आप लोगों ने भी नहीं सोचा?’’
‘‘वो, बेटा दरअसल...’’ पापा हकलाते हुए बोले।
‘‘दरअसल क्या पापा? आपको पता है फर्श साफ करने के लिए आप लोगों ने कितना पानी बरबाद कर दिया।’’
‘‘पानी...!’’ सबने हैरानी से एक-दूसरे की ओर देखा। मम्मी बोलीं, ‘‘पर बेटा तुम्हारी पेंटिंग...’’
‘‘उफ...’’ निक्की झुँझलाई, ‘‘आप लोगों को पेंटिंग की पड़ी है? पानी की जो बरबादी हुई उसकी कोई फिक्र ही नहीं। यही काम पोछा लगाकर भी तो हो सकता था। पेंटिंग तो दोबारा बन जाएगी। पर क्या पानी बनाया जा सकता है?’’
निक्की शुरू थी और सारे लोग सिर झुकाए उसकी बात सुन रहे थे।



Tuesday, 22 March 2016

ऐसा रंग चढ़े


होली का दिन नज़दीक आता जा रहा था। मुहल्ले के बच्चों में काफी उत्साह था। नीरज, सलीम, मंजीत और डेविड सभी रोज़ शाम को नीरज के दादा जी के पास जा पहुँचते और होली के बारे में ढेर सारी बातें करते। दादा जी भी रस ले-लेकर उनकी बातें सुनते। नीरज और मंजीत ने पहले से ही रंग और पिचकारियाँ खरीद ली थीं और नए कपड़े सिलने को दे दिए थे। डेविड और सलीम ने भी धमाकेदार ढंग से होली मनाने की तैयारियाँ पूरी कर ली थीं।

शाम को जब चारों दादा जी के पास इकट्ठे होते तो बताते कि उन्होंने क्या-क्या तैयारियाँ कर रखी हैं। उनकी बातें सुनकर दादा जी गद्गद् हो उठते और उन्हें प्रोत्साहित करते। 
आज होलिका-दहन का दिन था। चारों सुबह से ही होलिका-दहन की सामग्री इकट्ठा करने के लिए लोगों की मंडली के साथ घूम रहे थे।
शाम होते ही चारों दादा जी के पास जा पहुँचे और होलिका-दहन पर चलने की ज़िद करने लगे। दादा जी फटाफट तैयार हो गए। कंधे पर शाल डालकर और हाथ में छड़ी लेकर वह उनके साथ चल दिए।
कुछ ही देर में सभी वहाँ जा पहुँचे। चौराहे के बीचों-बीच जलाने के लिए मोटी-मोटी लकड़ियाँ रखीं गई थीं। जब उनमें आग लगाई गई तो उसकी ऊँची-ऊँची लपटें उठने लगीं। यह देख सारे बच्चे ख़ुश होकर तालियाँ बजाने लगे।
तभी एक चिंगारी छिटककर पास ही खड़े एक लड़के के कपड़ों पर जा गिरी। देखते ही देखते कपड़ों ने आग पकड़ ली। चीख़-पुकार मच गई। किसी को समझ नहीं आ रहा था क्या करे।
तभी दादा जी ने अपना शाल उतारकर उस लड़के को चारों ओर से ढँक दिया। आग फौरन बुझ गई। लड़के के कपड़े थोड़े-बहुत जल गए थे, पर उसकी त्वचा को नुकसान नहीं पहुँचा था। फिर भी घबराहट के कारण वह रोए जा रहा था। उसके माता-पिता दादा जी को धन्यवाद देकर, उसे घर लेकर चलेे गए।
थोड़ी ही देर में वहाँ फिर से हँसी-ख़ुशी का माहौल बन गया।
लौटते समय दादा जी ने बच्चों को बताया, ‘‘बच्चो, ऐसे मौकों पर हमें सदैव सावधान रहना चाहिए। आग से काफी दूर खड़े होना चाहिए और रेशमी कपड़े तो बिल्कुल नहीं पहनने चाहिए। फिर भी अगर ऐसी दुर्घटना घट जाती है, तो हमें साहस खोकर चीख़ना-चिल्लाना नहीं चाहिए बल्कि उससे बचने का प्रयास करना चाहिए। मोटे कपड़े से ढँक देने से आग बुझ जाती है। यदि कपड़ा न मिले तो फौरन ज़मीन पर लेटकर लोटपोट लगाना चाहिए। इससे भी आग बुझ जाती है।’’
सुबह होली थी। रात में ही सभी ने रंग घोलकर रख लिया था और अपनी पिचकारियाँ भी अच्छी तरह जाँच ली थीं, ताकि समय पर धोखा न दे जाएँ। उस दिन खा-पीकर सब जल्दी ही सो गए, ताकि सुबह जल्दी उठ सकें।
सुबह तक टब में घुला रंग बर्फ-सा ठंडा हो गया था। जब शरीर पर पड़ता तो पल भर के लिए कँपकँपी बँध जाती। लेकिन उमंग और उत्साह के आगे यह नाकाफी था। चारों इधर से उधर उछलते-कूदते एक-दूसरे पर दनादन पिचकारियाँ छोड़ रहे थे।
ढोलक की थाप और झाँझ-मजीरों की झनकार में बड़े-बूढ़े भी झूम रहे थे।
जी भर होली खेलने के बाद चारों दादा जी के पास जा पहुँचे। उनके रंग-बिरंगे चेहरों से उल्लास टपक रहा था।
दादा जी उन्हें देखते ही बोले, ‘‘आओ-आओ, खेल आए होली? खूब मज़ा लूटा, क्यों डेविड?’’
‘‘जी, दादा जी! लेकिन मैं डेविड नहीं, मैं तो मंजीत हूँ।’’ यह कहकर मंजीत मुस्कराया तो उसके रंग-बिरंगे चेहरे पर सफेद दाँत बिजली जैसे चमक उठे।
‘‘और नीरज, तुम तो बिल्कुल लंगूर लग रहे हो !’’
‘‘लेकिन दादा जी, मैं तो सलीम हूँ।’’
दादा जी ठठाकर हँस पड़े, ‘‘तो तुम सबने चेहरे पर इतना रंग पोत रखा है कि मुझे पहचानने में ही भूल हो गई।’’  
पर अगले ही पल उनके चेहरे पर गंभीरता छा गई। वह बोले, ‘‘काश, ऐसा प्रेम का रंग हर भारतवासी के चेहरे पर चढ़ जाता जिसमंे उसका धर्म, उसकी जाति सब कुछ रंग जाती। उसकी पहचान सिर्फ हिंदुस्तानी के रूप में होती। सच, तब कितना अच्छा होता। मेरे बच्चो, तुम्हें देखकर यह विश्वास होता है कि ऐसा दिन ज़रूर आएगा।’’
भावावेश के कारण दादाजी ने उन सबको अपनी बाहों में भर लिया।