Friday, 16 August 2019

आसमान का रंग लाल - पत्ती का रंग पीला



‘‘भैया, मौलवी साहब आ रहे हैं..’’ असद छज्जे से झाँकता हुआ चिल्लाया।
हमदान मोबाइल पर गेम खेलने में मगन था। असद की आवाज़ ने रंग में भंग कर दिया, पर उसने अपनी निगाह मोबाइल पर गड़ाए रखी।
‘‘भैया...मौलवी साहब आ गए हैं...!!’’ असद ने एक-एक शब्द पर ज़ोर देकर दोबारा कहा।
‘‘आ गए हैं तो क्या करूँ..?’’ वह खीझकर बोला।
‘‘अम्मी, देखो, भैया क्या कह रहा है।’’ असद ने माँ का ध्यान खींचना चाहा।
पर अम्मी रसोई में जुटी थीं। उन्होंने न तो असद की शिकायत पर ध्यान दिया और न हमदान के जवाब पर।
तभी कॉलबेल बजी।
‘‘हमदान, जाकर दरवाज़ा खोलो।’’ अम्मी ने किचन से कहा।
‘‘असद खोल देगा।’’ हमदान अभी भी औंधा लेटा था।
‘‘वह अभी छोटा है, तुम जाओ।’’
हमदान मन मारकर दरवाज़े तक पहुँचा। असद दरवाज़ा खुलने के इंतज़ार में बेचैन-सा पहले से मौजूद था। हमदान ने दरवाज़े की कुंडी हटाते हुए कहा, ‘‘अस्सलाम अलैकुम, मौलवी साहब।’’
‘‘हाँ, हाँ, वालैकुमस्सलाम, दरवाज़ा खोलो। पीठ झुलसी जा रही है।’’ मौलवी साहब झुँझलाए हुए बोले।
हमदान ने दरवाज़ा खोला।
‘‘अब आगे से हटोगे?’’ मौलवी साहब साइकिल अंदर लाने के लिए खड़े उसे घूर रहे थे।

हमदान किनारे हो गया। साइकिल बरोठे में खड़ी करके मौलवी साहब वहीं खड़े हो गए। धूप का चश्मा उतारा और जेब से रुमाल निकालकर चेहरा पोंछने लगे। असद ने हमदान की ओर देखा। दोनों के चेहरे पर मुस्कान फैल गई। मौलवी साहब की आदत थी कि वह चेहरे का पसीना पोछते समय रुमाल इतनी ज़ोर-ज़ोर से रगड़ते थे। असद और हमदान की हँसी फूटी पड़ रही थी।
मौलवी साहब उनकी शरारत समझ गए। बोले, ‘‘चलो, अपना-अपना सिपारा लेकर पहुँचो।’’
‘‘और हाँ, अम्मी से कह देना मेरे लिए चाय न बनाएँ। सुबह से पीते-पीते पेट खौल रहा है।’’ उन्होंने तेज़ आवाज़ में इस तरह कहा कि रसोई में खड़ी अम्मी सुन लें। मौलवी साहब ने साइकिल के स्टैंड को जाँचा। रुमाल से एक बार फिर से चेहरा पोछा, थैले से निकालकर नज़र का चश्मा चढ़ाया और बैठक में दाखि़ल हो गए।
बिजली थी नहीं। हाथ का पंखा उठाकर झलते हुए बोले, ‘‘गर्मी तो ऐसी हो रही है कि बदन पिघला जा रहा है। जैसे-जैसे गर्मी बढ़ रही है, बिजली के भी नख़रे शुरू हो गए हैं। कब से नहीं आ रही है?’’
‘‘थोड़ी देर पहले तक तो थी...’’ हमदान ने दबी आवाज़ में जवाब दिया।
तब तक अम्मी ने पानी का गिलास लाकर रख दिया था।
‘‘नीबू का शर्बत बना दूँ?’’ उन्होंने पूछा।
‘‘हाँ, पर थोड़ी देर में। अभी तो पानी पी लिया है।’’
अम्मी चली गईं। मौलवी साहब ने रुमाल निकालकर एक बार फिर चेहरा पोंछा और बोले, ‘‘वज़ू किया था?’’
‘‘जी, किया था,’’ दोनों दबी हुई आवाज़ में बोले।
‘‘चलो, निकालो सिपारा। कल का सबक़ सुनाओ।’’ कहते-कहते उन्होंने अपने थैले से एक पतली-सी छड़ी निकाली और मेज़ पर रख दी।
असद की आदत थी कि जब भी वह सिपारा पढ़ता था तो सिर हिलाकर ज़ोर-ज़ोर से झूमता था। कभी-कभी बग़ल में बैठे हमदान से टकराता भी था। इससे हमदान का ध्यान टूटता था।
हमदान ने घूरकर असद की ओर देखा। असद अपना सबक़ सुनाने में मगन था। उसने हमदान की प्रतिक्रिया नहीं देखी, पर मौलवी साहब ने देख लिया और होंठ चबाकर बोले, ‘‘हमदान, थोड़ा खिसककर बैठो। गर्मी में सटे जा रहे हो।’’
सबक़ सुनाने की बारी हमदान की आई। उसने सुनाना शुरू किया-‘‘अलिप़फ़ दो ज़बर अन, बे दो ज़बर बन...ग़ैन दो ज़बर गन।’’
‘‘गन नहीं, ग़न। हलक़ से आवाज़ निकालो...ग़’’
हमदान के मुँह से फिर निकला-‘‘गन!’’
मौलवी साहब ने कान मरोड़ते हुए कहा, ‘‘कितनी बार समझाया ग़ैन को ग़ बोलते हैं और गाफ़ को ग! पर तुम्हारी समझ में तो आएगा नहीं क्योंकि दिमाग़ में मोबाइल घुसा हुआ है।’’ ग़ुस्से में कान ऐंठने के कारण उनका स्वर ऊँचा-नीचा हो रहा था।
तभी बैठक में मुहल्ले के चंदन चचा दाखि़ल हुए, ‘‘मौलवी साहब आदाब अर्ज हो!’’
‘‘आइए, आइए! चंदन भाई,’’ मौलवी साहब ने चंदन चचा के माथे पर पसीना देखा तो उनका रुमाल फिर से निकल आया। रुआँसे हो रहे हमदान के चेहरे पर पल भर के लिए मुस्कान थिरक उठी।
‘‘बाहर आपकी साइकिल खड़ी देखी तो चला आया। आपसे कई दिनों से मुलाक़ात करने की सोच रहा था।’’
‘‘बताइए, बताइए! कैसे याद किया?’’
‘‘नहीं अभी आप बच्चों को पढ़ा लीजिए, तब तक मैं यहीं बैठा हूँ।’’
‘‘चलो बीस बार बोल-बोलकर ग़ैन लिखो।’’ मौलवी साहब हमदान को सबक़ देकर चंदन चचा की ओर मुड़ गए।
‘‘च..च..च, बेचारे बच्चों पर कितना बोझ है,’’ चंदन चचा बोले, ‘‘स्कूल का काम, होमवर्क, ट्यूशन। बेचारे बचपन को जीने का मौक़ा ही नहीं पाते।’’
‘‘अजी छोडि़ए..’’ मौलवी साहब बोले, ‘‘क्या हम लोगों ने पढ़ाई नहीं की है? पर इनका ध्यान पढ़ाई में लगे तब न?’’
कहते-कहते उन्होंने हमदान को एक छड़ी जमाई क्योंकि उन दोनों को बातें करता देखकर उसका ध्यान पढ़ाई से हट गया था।
‘‘मियाँ, पढ़नेवाले तीन तरह के होते हैं। एक, रबर में कीला। यानी जब तक कील धँसी रहती है, तब तक ठीक, जैसे ही कील निकली कि सब बराबर। दूसरे होते हैं कंबल में कीला। जितना छेद बना दो उतना बना रहेगा, यानी जितना पढ़ा दो उतना याद रखते हैं। तीसरे होते हैं बाँस में कीला, यानी थोड़ा पढ़ाओ तो ज़्यादा समझते हैं। ये जनाब रबर में कीला हैं।’’
चंदन चचा ने गहरी साँस ली और बोले, ‘‘अरे नहीं। सब बच्चों समझदार होते है। कुछ का दिमाग़ खेल में चलता है, कुछ का पढ़ाई में, कुछ का और कामों में। पर हमने ऐसे क़ायदे बना रखे हैं कि पढ़ने में तेज़ बच्चे को ही अक़्लमंद मानते हैं।’’
‘‘ग़ बोलो ग़...’’ मौलवी साहब ने हमदान को फिर एक छड़ी जमाई।
‘‘मौलवी साहब एक बात पूछूँ? बुरा तो नहीं मानेंगे?’’ चंदन चचा ने कहा।
‘‘पूछिए,’’ मौलवी साहब ने उनकी ओर हैरत से देखा।
‘‘क्या पढ़ाई के लिए बच्चों की पिटाई करना ज़रूरी है?’’
मौलवी साहब हँसे, ‘‘चंदन भाई, आप तो जानते ही होंगे कि बच्चा जब समझदार हो जाए तो उसे दीनी तालीम दी जानी चाहिए। अगर बच्चा लापरवाही करे तो उसे डाँटकर रास्ते पर लाया जाए। फिर भी न माने तो पिटाई जायज़ है। बच्चे नादान होते हैं, उन्हें सही-ग़लत का पता नहीं होता। उन्हें इसकी जानकारी देना हमारी जि़म्मेदारी है। बुरी बातों की तरफ इंसान का ज़हन जल्दी जाता है। अच्छी बातों में दिल को ज़बरदस्ती लगाना पड़ता है। अब अगर इसके लिए पिटाई भी की जाए तो बुरा नहीं है।’’
चंदन चचा मुस्कराए, ‘‘पर अच्छी बातों की तरपफ़ ज़हन क्यों नहीं जाता?’’
‘‘ये तो इंसानी पिफ़तरत है?’’
‘‘पर मौलवी साहब मुझे लगता है कि बुरी बातों में इंसान का मन इसलिए लगता है कि उसमें मज़ा आता है। अगर अच्छी बातों में भी मज़ा आने लगे तो इंसान बुराई की तरफ क्यों देखे?’’
‘‘क्या मतलब?’’
‘‘मतलब यह कि स्कूल जाने से पहले बच्चा न जाने कितनी बातें सीखता है। ख़ुद कोशिश करके सीखता है। अपनी जिज्ञासाओं को सुलझाने के लिए तमाम तरह के सवाल करता है। पर स्कूल पहुँचते ही उसका दिमाग़ कुंद हो जाता है और वह बँधे-बँधाए दायरे में सोचने लगता है। जो वह सोचना चाहता है, हम उसे सोचने नहीं देते। हम उस पर अपनी सोच लाद देते हैं।’’
‘‘तो क्या स्कूल बंद कर दिए जाएँ?’’
‘‘अरे नहीं, नहीं,’’ चंदन चचा हँसे, ‘‘मेरा यह मतलब क़तई नहीं है। मैं तो आपसे यह जानना चाहता हूँ कि पढ़ाई के लिए बच्चों को पीटते क्यों हैं?’’
मौलवी साहब ठहाका लगाकर हँसे और बोले, ‘‘आप इन्हें दो दिन पढ़ाकर देखिए, फिर आपको यह सवाल पूछने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।’’
‘‘फिर भी, मैं आपकी राय जानना चाहता हूँ।’’ चंदन चचा शांत भाव से बोले।
‘‘इसलिए कि इनका ध्यान पढ़ाई में लगे। छड़ी के डर से ये इधर-उधर नहीं भटकते। सीधा अपनी राह पर चलते हैं।’’
‘‘अगर मकसद ध्यान लगाए रखना है, तो इसके और भी तरीक़े हो सकते हैं।’’
‘‘मतलब...?’’ मौलवी साहब हैरत से बोले।
‘‘आप पढ़ाई को ऐसा बना दीजिए कि बच्चे को उसमें मज़ा आने लगे। जिस काम में मज़ा आता है, उसमें मन लगाने की कोशिश नहीं करनी पड़ती। मन अपने आप लगता है। चीज़ें याद भी जल्दी होती हैं। बच्चा तो बच्चा, बड़ा भी फिल्म देखकर निकलने के बाद गुनगुनाता हुआ निकलता है। गाना याद करने को कोई नहीं कहता, लेकिन पूरा का पूरा गाना याद हो जाता है। पर अगर इसकी जगह पर दो लाइन की नज़्म दे दो और कहो कि कल सुनाना है तो याद होते हुए भी भूल जाती है। आप समझ रहे हैं न, मैं क्या कहना चाहता हूँ।’’
मौलवी साहब चुपचाप चंदन चचा की बात सुन रहे थे।
‘‘दुनिया बदली, तरीक़े बदले, पहले बैलगाड़ी पर चलते थे, अब हवा में उड़ान भरने लगे। पर हमारी सोच नहीं बदली। हम समझते हैं कि बच्चों को पढ़ाने का एकमात्र यही तरीक़ा है कि उसे मार के डर से पाठ रटा दो। हम चाहते हैं कि बच्चा वह बोले जो हम सुनना चाहते हैं। उसकी अपनी सोच क्या है। इस पर हम ध्यान नहीं देते। अगर हम बच्चे से पूछें कि आसमान का रंग कैसा होता है तो हमारी अपेक्षा यही होती है कि वह नीला कहे। पर यह भी तो हो सकता है बच्चे के दिमाग़ में साँझ का आसमान टँका हो और वह लाल कह बैठे। पत्ती को हरी की जगह पीली कह दे। दरअसल हम चाहते हैं कि बच्चा हमारी निगाह से देखे। हम बच्चे के अनुभव की क़द्र नहीं करते, उस पर अपना अनुभव लादना चाहते हैं, और इस प्रक्रिया में उसकी सोच, उसकी सृजनात्मकता को कुंद कर देते हैं। हालाँकि यह काम आसान नहीं। जहाँ एक मास्टर को पचास बच्चों की कक्षा पढ़ानी हो, वहाँ यह नामुमकिन-सा है। पर जितनी कोशिश हम कर सकते हैं, उतनी तो करनी ही चाहिए न?’’
चंदन चचा अपनी बात कहकर चुप हो गए। दोनों के बीच थोड़ी देर सन्नाटा छाया रहा। फिर अचानक मौलवी साहब ने मेज़ पर रखी छड़ी उठाई और उसके दो टुकड़े कर दिए।



Sunday, 23 June 2019

मियाँ मुनक्का की जासूसी


मियाँ मुनक्का रोज़ की तरह हकीम किशमिश के दवाख़ाने पहुँचे तो वह बेचैनी से टहलक़दमी कर रहे थे। मियाँ मुनक्का को देखते ही लपककर आए और दोनों कंधे थामते हुए बोले, ‘‘आ गए दोस्त! मैं बड़ी देर से तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहा था।’’
मियाँ मुनक्का हैरान रह गए। और दिनों में जब वह चाय पीने पहुँचते थे तो हकीम किशमिश के चेहरे की रंगत ऐसा बदलती थी मानो चाय पीने नहीं, ज़ायदाद में हिस्सा बँटाने आ गए हों। मियाँ मुनक्का हैरानी से अपनी कलाई घड़ी पर नज़र डालते हुए बोले, ‘‘पर आज तो मैं रोज़ के मुक़ाबले दस मिनट पहले हाज़िर हो गया।’’
‘‘सो तो ठीक है, पर आज तुम्हारे इंतज़ार में वक़्त पहाड़ हो गया।’’ हकीम किशमिश लंबी साँस लेते हुए बोले।
‘‘तो क्या आज चाय जल्दी बन गई?’’, मियाँ मुनक्का ने ख़ुश होकर पूछा।
हकीम किशमिश के चेहरे पर वही रोज़वाली रंगत की एक परत चढ़ गई। खीझकर बोले, ‘‘अमाँ, चाय को मारो गोली। आज तो मैं किसी और काम से याद कर रहा था।’’ फिर अपने नौकर जर्दालू को आवाज़ देकर बेरुख़ी से कहा, ‘‘अरे, जर्दू, चाय बना ला।’’
मियाँ मुनक्का के उत्साह पर ठंडा पानी पड़ गया। उन्हें लगा ज़रूर जड़ी-बूटियाँ लाने धौलपुर जाने को कहेंगे।

‘‘अब तुमसे क्या छिपाना, मुनक्का। तुम तो पुराने राज़दार ठहरे। और भला किससे कहूँ दिल की बात?’’ हकीम किशमिश के चेहरे पर पसीना छलछला आया था।
‘‘अब पहेलियाँ मत बुझाइए, हकीम साहब, साफ-साफ बताइए।’’ मियाँ मुनक्का ऊबते हुए बोले।
‘‘यार, मेरे पास परदादाओं के ज़माने के हकीमी नुस्ख़े की किताब थी। उसमें आज़माए हुए असली लुकमानी नुस्ख़े थे। न जाने कौन मनहूस मारा ले उड़ा। समझ नहीं आता क्या करूँ? जब से किताब ग़ायब हुई है खाना-पीना हराम हो गया है। आँखों की नींद, दिल का चैन उड़ गया है।’’
‘‘भला कोई फारसी की बोसीदा किताब का क्या करेगा? किसके पास इतना वक़्त होगा कि अपना सिर खपाए? घर में ही ढूँढिए। यहीं-कहीं रख दी होगी।’’ मियाँ मुनक्का ने बेफ़िक्री से जवाब दिया।
तब तक जर्दालू चाय लाकर रख गया था। मियाँ मुनक्का ने लपककर चाय उठा ली और सुड़सुड़ाने लगे। पर हकीम किशमिश ने चाय की तरफ देखा तक नहीं। वह चालू रहे, ‘‘अरे तुम नहीं जानते ऐसी पुरानी चीज़ों की क़ीमतें? लाखों में होती हैं लाखों में। पर मुझे उसकी क़ीमत की परवाह नहीं है। मुझे तो फ़िक्र इस बात की है कि अब मेरी हकीमी का क्या होगा। मुझे तो ख़ुद कुछ भी नहीं आता-जाता। मैं तो उसी से पढ़-पढ़कर हकीमी की गाड़ी घसीट रहा था।’’
‘‘ओह, तब तो बहुत बुरा हुआ। पर इसमें मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूँ?’’ मियाँ मुनक्का सिर खुजलाते हुए बोले।
‘‘दरअसल तुम ताक-झाँक करने में माहिर हो। इसलिए...’’
‘‘क्या...!’’ मियाँ मुनक्का की त्योरियाँ चढ़ गईं।
‘‘म...मेरा मतलब है कि तुम्हारे अंदर जासूसोंवाली क़ाबिलियत है।’’ हकीम किशमिश ने बात सँभालने की कोशिश की, ‘‘तुम्हारे लिए यह काम कोई मुश्किल नहीं है। तुम चुटकियों में चोर को ढूँढ निकालोगे। इतना मैं ज़रूर कह सकता हूँ कि चोरी करनेवाला कोई बाहर का आदमी नहीं है। नुस्ख़ा अंदर की अलमारी में रखा रहता था। वहाँ तक दोस्तों के अलावा किसी की पहुँच नहीं है।’’
अपनी तारीफ़ से मियाँ मुनक्का कचौड़ी की तरह फूल गए। बोले, ‘‘हकीम साहब, इत्मीनान रखिए। मैं अपनी एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दूँगा। ख़ुदा ने चाहा तो दो दिन के भीतर चोर आपके क़दमों में होगा।’’
‘‘तब तो चाय के साथ रोज़ का नाश्ता भी मुफ्त,’’ हकीम किशमिश ख़ुश होकर बोले।
मियाँ मुनक्का हकीम किशमिश की ड्योढ़ी से उतर आए। वह मन-ही-मन चोर को पकड़ने की तरकीबें सोचने लगे। पर उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि शुरुआत कहाँ से करें। अभी वह सोच ही रहे थे कि सामने लंबे-लंबे क़दम नापता चिरौंजी बनिया दिखा। मियाँ मुनक्का का जासूस मन कुलबुलाया। उन्होंने चिरौंजी को पुकारा, ‘‘अमाँ, चिरौंजी, चोरी-चोरी कहाँ भागे जा रहे हो?’’
आवाज़ सुनकर भी चिरौंजी नहीं पलटा। उसने लंबे-लंबे डग भरते हुए कहा, ‘‘अभी जल्दी में हूँ। बाद में मिलूँगा।’’
मियाँ मुनक्का का शक गाढ़ा होने लगा। फौरन चिरौंजी का रास्ता रोककर खड़े हो गए और भेदभरी निगाहों से तौलते हुए बोले, ‘‘रुको तो सही। यारों से बढ़कर कौन-सा काम हो सकता है भला?’’
चिरौंजी के माथे पर पसीना छलछलाने लगा। वह अटकते-अटकते बोला, ‘‘हर काम नहीं बताया जा सकता। बस, इस वक़्त मुझे जाने दो। वर्ना गड़बड़ हो जाएगी।’’
‘‘यह कहो न कि सच्चाई खुलने पर मुहल्लेवालों के सामने ऐसी की तैसी हो जाएगी।’’ मियाँ मुनक्का ने अंधेरे में तीर चलाया।
‘‘हाँ, कुछ ऐसा ही समझो...’’ चिरौंजी जाने को बेचैन हो रहा था पर मियाँ मुनक्का थे कि उसकी बाँह कसकर पकड़े हुए थे।
‘‘देखो, सच-सच बता दो। वादा करता हूँ। बात हमारे-तुम्हारे बीच रहेगी। हकीम साहब को भी नहीं बताऊँगा।’’
‘‘हकीम साहब के पास तो जाना ही पड़ेगा। पर अभी घर जाना ज़रूरी है। वर्ना, गड़बड़ हो जाएगी। मुहल्लेवालों के सामने मेरा तमाशा बन जाएगा।’’ चिरौंजी हाथ छुड़ाने के लिए तड़प रहा था।
‘‘तो फिर तुम्हारे साथ मैं भी चलूँगा। तुम कहीं भी जाओ, अब मैं तुम्हारा पीछा नहीं छोड़नेवाला।’’
‘‘पर वहाँ तुम्हें तो क्या किसी को भी साथ नहीं ले सकता।’’ चिरौंजी बेचैन था।
‘‘ऐसी कौन-सी जगह है आख़िर...? मैं भी तो जानूँ।’’ मियाँ मुनक्का को लग रहा था कि वह कामयाबी के नज़दीक पहुँच रहे हैं।
चिरौंजी गुड़गुड़ाता हुआ पेट पकड़कर बैठ गया और ऐंठता हुआ बोला, ‘‘अब घर जाने देते हो या यहीं गली में गंदगी फैला दूँ। कल रात ख़ुबानी मौसी के घर दावत में ढेर पूरियाँ ठूँसी थीं। अब पेट में ज्वार-भाटा उठ रहा है। दूकान नौकरों के हवाले करके भागा हूँ। अब जाने दो वर्ना सारी गड़बड़ यहीं हो जाएगी।’’
 सच्चाई जानकर मियाँ मुनक्का आसमान से गिरे। नाक पकड़कर ऐसा भागे कि दो गलियाँ पार करके रुके।
अभी वह अपनी साँसें सामान्य कर ही रहे थे कि बग़ल से चचा छुहारा की आवाज़ सुनाई दी। मियाँ मुनक्का के दिमाग़ में जासूसी का कीड़ा कुलबुला रहा था। उन्होंने अपने कान आवाज़ की तरफ लगा दिए। चचा छुहारा पिस्ता पहलवान को समझा रहे थे, ‘‘देखो मियाँ, काली तुलसी के बीज और असली अरकरा मिसरी में मिलाकर चूरन बना लो। रोज़ खाने से पहले खाओ। फिर देखो बाज़ुओं में कैसी ताक़त आती है। गामा पहलवान भी तुम्हारे आगे पानी भरेगा।’’
‘‘हे..हे...हे, चचा, तुम भी कहाँ-कहाँ की कौड़ी ले आते हो। ऐसा न हो तुम्हारे नुस्ख़े पर अमल करके सींकिया पहलवान रह जाऊँ।’’ पहलवान दाँत निकालता हुआ बोला।
‘‘अमाँ, तुमको मज़ाक़ लग रहा है। आज़माया हुआ असली लुकमानी नुस्ख़ा है। अमल करना फिर बताना।’’ चचा छुहारा ने तनकर कहा।
मियाँ मुनक्का के कान खड़े हो गए। हो न हो हकीम किशमिश का नुस्ख़ा चचा छुहारा ने ही चुराया है। वर्ना आज तक तो हकीमी पर लैक्चर झाड़ते उन्हें कभी न सुना। मियाँ मुनक्का दीवार की ओट में खड़े हो गए। चचा छुहारा और पहलवान पिस्ता थोड़ी देर बातें करने के बाद अपने-अपने रास्ते चले। पीछे-पीछे मियाँ मुनक्का भी।
हालाँकि मियाँ मुनक्का अपनी चाल में बिल्ली को मात दे रहे थे। पर अचानक चचा छुहारा पीछे पलट पड़े। मियाँ मुनक्का को देखा तो बोले, ‘‘अमाँ, तुम तो ऐसा चुपके-चुपके नज़र बचाकर चल रहे हो जैसे कहीं चोरी करके आए हो।’’
मियाँ मुनक्का हड़बड़ा गए। बोले, ‘‘नहीं, नहीं, ऐसी कोई बात नहीं। बस, आपको आवाज़ देने ही वाला था।’’
‘‘अब मिल ही गए हो तो चलो हकीम साहब की बैठक में चाय पीकर आते हैं।’’
मियाँ मुनक्का ने मन ही मन सोचा कि चचा छुहारा भी कितने शातिर चोर हैं। पहले तो हकीम साहब के नुस्ख़े पर हाथ साफ़ किया अब उनकी चाय गटकने जा रहे हैं। ज़रूर भेद लेने की फ़िराक़ में होंगे। मियाँ मुनक्का ने बहाना बनाते हुए कहा, ‘‘चचा, इस वक़्त थोड़ा काम है। वर्ना आपके साथ ज़रूर चलता।’’
चचा छुहारा हँसे। बोले, ‘‘काम और तुम्हें? चारपाई तोड़ने के अलावा भी तुम कोई काम करते हो यह आज पता चला। ख़ैर, कोई बात नहीं। मैं ही अकेला चला जाता हूँ।’’
चचा छुहारा आगे बढ़े तो मियाँ मुनक्का फिर उनके पीछे-पीछे हो लिए। पर इस बार ज़रा होशियारी से।
चचा छुहारा हकीम किशमिश की बैठक में घुसते ही बोले, ‘‘हकीम साहब, आज तो मज़ा ही आ गया। पहलवान पर अपने ज्ञान की ऐसी धौंस जमाई कि वह क़ायल हो गया।’’
‘‘अच्छा ऐसा क्या हुआ?’’ हकीम किशमिश ने पूछा।
‘‘मैंने ख़जूर मामू का पुराना नुस्ख़ा उसके आगे दुहरा दिया तो उसका मुँह खुला रह गया।’’
‘‘अच्छा, वही तुलसी और अकरकरा वाला। तुम्हारा वह नुस्ख़ा मैंने भी कई लोगों पर आज़माया है।’’
दीवार की ओट में खड़े मियाँ मुनक्का सारी बातें ध्यान से सुन रहे थे। हकीम किशमिश बात कान में पड़ते ही जासूसी का ख़ुमार उतर गया। इसका मतलब चचा छुहारा चोर नहीं हैं। उनका यह सुराग भी फेल हो गया। ख़ुद पर इतना ग़ुस्सा आया कि सीधे घर पहुँचे और टूटी-फूटी चारपाई में धँस गए।
शाम हो गई पर घर से न निकले। आख़िरकार रात हो गई और बेचैनी में नींद न पड़ी तो टहलने निकल पड़े। जब वह मिर्ज़ा चिलगोज़ा के घर के पास से गुज़र रहे थे तो घर के अंदर रोशनी दिखाई दी। खिड़की से झाँका तो देखा मिर्ज़ा चिलगोज़ा किताब खोले कुछ बुदबुदा रहे हैं। कान सटाया तो फुसफसाहट सुनाई दी--
क्यों पूछते हो कि कौन हूँ और क्या करता हूँ?
मैं चारागर हूँ मरीज़े इश्क़ का इलाज करता हूँ।
मियाँ मुनक्का के कान खड़े हो गए। जासूसी का नशा फिर से सिर पर सवार हो गया। उन्हें लगा ज़रूर हकीम साहब का नुस्ख़ा मिर्ज़ा चिलगोज़ा मार लाए, नहीं तो मरीज़ और इलाज की बातें क्यों करते।
बड़ी देर तक खड़े सोचते रहे कि मिर्ज़ा चिलगोज़ा को रंगे हाथ कैसे पकड़ा जाए। दस्तक देते तो वह फ़ौरन नुस्ख़ा छिपा देते। इधर-उधर नज़र दौड़ाने के बाद भी कोई रास्ता नज़र न आया तो उन्होंने अहाते की दीवार फाँदकर घुसने की सोची। लोगों की नज़रों से छिपकर, कुत्तों की भौं-भौं से बचकर किसी तरह दीवार फाँदकर अंदर पहुँचे। पर मिर्ज़ा चिलगोज़ा भी सयानेपन में कौए से आगे थे। ज़रा-सी आहट मिली कि किताब झट कुर्ते के भीतर। घूमकर देखा तो सामने मियाँ मुनक्का खड़े हुए हैं। हैरत से बोले, ‘‘अरे मियाँ इस वक़्त कैसे? और अंदर कैसे आए? दरवाज़ा तो बंद है?’’
‘‘वह सब बाद में पूछना। पहले यह बताओ तुमने कुर्ते के भीतर क्या छिपा रखा है?’’ मियाँ मुनक्का सख़्त होकर बोले।
मिर्ज़ा चिलगोज़ा एकदम लजा गए। बोले, ‘‘अमाँ, क्यों पोल-पट्टी खोलने पर तुले हो। दुनिया हँसेगी कि बुढ़ापे में यह क्या सूझा। यह सब छोड़ो, चलो, चाय पिलाता हूँ।’’
‘‘मुझे रिश्वत देने की कोशिश कर रहे हो?’’ मियाँ तेज़ होकर बोले।
‘‘हाँ, ऐसा ही समझो,’’ मिर्ज़ा चिलगोज़ा अंदर की ओर बढ़ने की कोशिश करने लगे।
मियाँ मुनक्का ने उन्हें लपक लिया और किताब निकालने की कोशिश करने लगे। मिर्ज़ा चिलगोज़ा ने भी पूरी ताक़त लगा दी। दोनों में थोड़ी देर छीन-झपट मचती रही। आखिरकार जब मिर्ज़ा चिलगोज़ा को लगा कि उनका इकलौता कुर्ता तार-तार हो जाएगा तो किताब निकालकर मियाँ मुनक्का के हवाले कर दी।
मियाँ मुनक्का ने किताब को उलट-पलटकर देखा तो उनका जासूसी का पारा एकदम से ज़ीरो पर आ गया। उस पुरानी डायरी में मिर्ज़ा चिलगोज़ा ने शेरो-शायरी लिख रखी थी।
‘‘अमाँ, किसी से कहियो मत, नहीं लोग कहेंगे कि बूढ़ा सठिया गया है। बुढ़ापे में इश्क़-माशूक़ की बातें करता है।’’ मिर्ज़ा चिलगोज़ा गिड़गिड़ाते हुए बोले।
जब मियाँ मुनक्का ने दीवार लाँघी थी तो कुहनियाँ छिल गई थीं। घुटने में चोट लगी थी। पर उससे उन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा था। लेकिन दिल पर लगी नाकामयाबी की चोट से उन्हें गश आ गया। मिर्ज़ा चिलगोज़ा रोकते रहे पर मियाँ मुनक्का न रुके। घर आकर निराशा से तकिए में मुँह छिपाकर पड़ रहे।
मियाँ मुनक्का रात भर उल्टे-सीधे ख़्वाबों की दुनिया में डूबते-उतराते रहे। सुबह उठे तो सिर भारी-भारी हो रहा था। आँखें ऐसी सूजी-सूजी लग रही थीं जैसे दो रातों से सोए न हों। दिल बुझ रहा था। चाय की तलब ज़ोर मार रही थी। पर समझ में नहीं आ रहा था कि हकीम किशमिश के पास कैसे जाएँ। वह नुस्ख़े के बारे में पूछेंगे तो क्या जवाब देंगे। जब मियाँ मुनक्का को कुछ न सूझा तो उन्होंने तय कर लिया कि अपने चचा के पास रामपुर चले जाएँगे।
फौरन हाथ-मुँह धोया और अलमारी पर रखा झोला जैसे ही कंधे पर लटकाया कि चौंक पड़े। झोला भारी लग रहा था। हैरानी से खोलकर देखा तो सिर घूम गया। लगा कि चक्कर खाकर गिर पड़ेंगे। झोले में हकीम साहब की किताब पड़ी हुई मुँह चिढ़ा रही थी। उन्हें तीन दिन पहले की घटना याद आ गई। जब हकीम किशमिश की नज़र बचाकर उनकी पुरानी किताब झोले में डाल लाए थे सोचा था कि रद्दीवाले को बेचकर दो पैसे पैदा कर लेंगे। उन्हें क्या पता था कि यही उनके पुश्तैनी हकीमी नुस्ख़ों की किताब है।
किताब ढूँढने की समस्या तो अब हल हो गई थी। पर मियाँ मुनक्का को यह नहीं समझ में आ रहा था कि हकीम किशमिश को वापस क्या कहकर लौटाएँ।