Saturday, 5 September 2020

पेड़ हैं तो रंग हैं

 

पात्र-परिचय:

                                    मैना, तोता, गिलहरी, बंदर, कौआ, चींटी, बादल              

                                                (सभी लगभग 6-7 वर्ष के बालक-बालिकाएँ)

                                    नेपथ्य से आनेवाली आवाज़

                                                (प्रौढ़ पुरुष की गंभीर आवाज़)

 


(मंच पर हरे पत्ते और डालियाँ बिखरी पड़ी हैं। बीचों-बीच अभी-अभी काटे गए हरे-भरे पेड़ के तने का ठूँठ है। पर्दा उठने के साथ ही हवा के झोंके से मंच पर पड़े पत्ते उड़ते हैं। साथ ही करुण स्वरों में हल्का-हल्का संगीत बजता है। नेपथ्य से वेदना भरी आवाज़ आती है-)

 

वह जो पूरी रात ठिठुरकर पहरेदारी करता था,

वह जो रिमझिम बारिश में छतरी बन जाया करता था,

वह जो कड़ी धूप में तपकर हमको देता था छाया,

जिसके नीचे हम सबने था अपना संसार बसाया,

जहाँ पिघलती हुई चाँदनी पत्तों से यों झरती थी,

नदी एक सपनों की जैसे कल-कल कल-कल बहती थी,

जिसके साए में हम सोए जागे खेले बड़े हुए,

पाते थे जिसको हम अपने साथ हमेशा खड़े हुए

कहाँ गया वह अपना साथी, अपना हमदम?

आँखें उसको ढूँढ रही हैं।

साँसें उसको तड़प रही हैं।

कहाँ गया वह?

कहाँ गया वह?

 

(आवाज़ प्रतिध्वनित होकर गूँजने लगती है। मंच पर मैना का वेश धारण किए हुए एक लड़की का प्रवेश)

मैना    : देखो, देखो, भरी दुपहरी कैसा अँधियारा छाया है! किरनों की छाया में छिपकर कैसे साए उतर रहे हैं। कहाँ गया वह हरा-भरा-सा आसमान? जिस आसमान में फूलों के चंदा-सूरज थे, जुगनू के तारे थे, कबूतरों का झुंड सफेद बादलों-सा मँडराता था। पर अब क्यों है सब रेत-रेत-सा? साँसें क्यों थमी-थमी-सी जाती हैं? धड़कन क्यों हैं रुकी-रुकी-सी? आँखें हैं क्यों बुझी-बुझी-सी? थककर चूर हुए तन को अब कौन सहारा देगा आखिर? दुनिया हमें सताएगी तो हमको कौन बचाएगा? बारिश की छत कौन बनेगा? कौन भला लोरी गाएगा? किससे पूछूँ? कौन बताए? कहाँ गया वह मेरा घर?                                           

 

(मंच पर तोते के वेश में एक लड़के का प्रवेश)

तोता   : जब मैं बच्चा था, नन्हा-सा। कोटर की उस नरम गोद में सोता-जगता रहता था। अभी नहीं खुली थी आँखें मेरी। माँ के आने की आहट पर बस मुँह को खोल चहकता था। माँ जब दाने लेने जाती थी तब भी मैं कहाँ अकेला था? कोटर की गर्माहट भी तो माँ के पंखों जैसी ही लगती थी। और कभी जब पंख तौलने डालों    पर आ जाता था, तो कौए की ‘काँव-काँव’ सुन सिहर-सिहर उठता था। तब वह अपनी बाहें फैलाकर हमें समेट लेता था, जैसे माँ हमको दुलराती थी।

 

(मंच पर गिलहरी के वेश में एक लड़की का प्रवेश)

गिलहरी : मैं ‘चिक-चिक’ करके गाती थी। नीचे-ऊपर, ऊपर-नीचे बेमकसद की उधम-उछल। कभी यहाँ पर, कभी वहाँ पर, इधर-उधर जो दाने-दुनके मिल जाते थे, अपने दोनों हाथों में लेकर ‘कुटुर-कुटुर’ मैं खाती थी। मुझे देख वह खिल-खिल हँसता। पत्तों को लहरा-लहराकर अपनी ख़ुशी जताता था। सूरज की गर्मी से कुम्हलाकर जब उसका चेहरा लटका होता। झुकी टहनियाँ, सूखे पत्ते, रूखे तन के रेशे होते। तब मैं उसके तन पर अपनी पूँछ फिराती। नन्हे पंजों से तन पर गुदगुदी मचाती तब वह सारे दुख बिसराकर हँस पड़ता था। फिर वह अपनी डाल हिलाकर, पत्तों-पत्तों को लहराकर ठंडी हवा चलाता था।

 

(मंच पर बंदर के वेश में एक लड़के का प्रवेश)

बंदर    : वह तो था मैदान हमारे खेल-कूद का। उसकी डालों पर उछल-कूदकर हम जमकर मौज मनाते थे। कच्चे-पक्के फल भी ढेरों खाते और गिराते थे। डालें और पत्तियाँ भी हम बिन हिचके तोड़ गिराते थे। पर वह कभी नहीं उफ करता था। अपनी डालों पर हम सबका बिस्तर सदा सजाता था। बारिश में हम भीग-भीगकर छिपने दौड़े आते थे। सर्दी की रातों में जब चारों ओर कुहासा घिरता, घनघोर हवाएँ हड्डी तक में घुस जातीं, तब उसकी गोदी में छिपकर हम सब रात बिताते थे।

 

(मंच पर कौए के वेश में एक लड़के का प्रवेश)

कौआ   : मैं कौआ हूँ। मुझे देखकर सब चिढ़ते हैं। मेरा काला रंग सभी की आँखों में चुभता है। मेरी कर्कश ‘काँव-काँव’ से जब मुझ पर पत्थर आते थे, तो मैं पत्तों में छिपकर अपनी जान बचा लेता था। ख़ुद पर सारे पत्थर सहकर वह हमें बचाया करता था। उसके सूखे तिनकों से हम अपना नीड़ बनाते थे। उसकी डालों पर हम सब फुदक-फुदक इतराते थे। वह बेफिक्री, वह सुकून, वह अपनापन कौन हमें अब देगा? अब पत्थर की चोट सहनकर कौन हमें दुलराएगा? कौन हमारे नीड़ों को अब अपने सूखे तिनके देगा?

 

(मंच पर चींटी के वेश में एक लड़की का प्रवेश)

चींटी   : मैं अपने नन्हे-नन्हे क़दमों से चोटी पर चढ़ जाती थी, तो अपनी आँखों में पूरा आकाश समा लेती थी। दूर गगन में उड़ते बादल मुझे देखकर ख़ुश होते थे। हवा थपकियाँ दे-देकर मुझको सहलाती थी। और बसंत में जब फूलों से डालें लदर-बदर हो जाती थीं। तब भौरों और तितलियों के संग हम भी जी भर रस पीते थे। पके फलों पर देख हमें जब मिट्ठू हम पर चिल्लाता था। तब वह कहता--लड़ो नहीं, मेरे सारे फल तुम सबके ही हैं। जैसे चाहो खाओ। अपने मित्र बुलाओ। उनको भी चखवाओ। पर बच्चे शैतान कभी जब ढेले लेकर आ जाते थे। तो पत्थर की चोट सहनकर, पीड़ा से सिसकारी भरकर पके हुए फल टपका देता था। कहता--काश, हमारी डालें थोड़ा और जो झुक पातीं तो इनको भी आसानी होती। उसकी मज़बूत जड़ों में ही तो अपना घर था। जब बारिश में पानी भरता तो अंडे लेकर हम ऊपर चढ़ जाते थे, और किसी खोखल में भूरे-लाल चींटों से छिपकर अपना समय बिताते थे।

 

(मंच पर बादल के वेश में एक लड़के का प्रवेश)

बादल  : कहाँ गया वह मीत हमारा? जेठ-आषाढ़ की कड़ी धूप में, तपते झोंकों से कुम्हलाई धरती को बेचैन देखकर वह कितना व्याकुल होता था। फिर वह धरती का संदेशा मस्त हवाओं के झोंकों से हमें समंदर तक पहुँचाता था। हम आलसियों की नींद टूटती। अपना भूला कर्तव्य याद आता। हम पानी के गगरे भरकर गिरते-पड़ते दौड़े आते। सूखी खेती, उजड़े उपवन, सूने पनघट राह हमारी तकते होते। झूम-झूमकर वह हम सबका स्वागत करता था। गाने गाता, और हवाओं में लहराकर अपना नृत्य दिखाता था। अँधियारे में उसकी डालों पर बैठ सुकून से हम बातें दो-चार किया करते थे। अब हमको कौन जगाएगा? कौन हमें संदेशे भेजेगा? कौन जली-तपी धरती का दुख देख पसीजेगा? हम भी किससे बतियाने आएँगे? कौन हमें ज़िद कर-करके रोकेगा? कौन भला...कौन भला...?

 

सब एक साथ   : जब भी कटता एक पेड़ है तो केवल पेड़ नहीं कटता, कटते कई-कई जीवन हैं। रुकती कई-कई साँसें हैं। थमती कई-कई धड़कन हैं। देख सको तो देखो थमकर। सोच सको तो सोचो रुककर। यह हँसी-खेल होगा तुम सबका। पेड़ काटकर तुम्हें कोई छोटी-सी, हाँ बस छोटी-सी सुविधा मिलती होगी। पर अपने तो जीवन की रफ्तार ठहर जाती है। सारी ख़ुशियाँ, घर-बार हमारा छिन जाता है। अब हम भला कहाँ जाएँगे? कभी ठहरकर सोचा तुमने? अगर नहीं सोचा तो सोचो। वर्ना इक दिन ऐसा भी आएगा। जब तुम हमको पाने को चिल्लाओगे और हम सभी सपनों से भी दूर किसी दुनिया में, सदा-सदा के लिए चले जाएँगे। आज अगर हम    नहीं रहे, तो फिर कल तुम भी कैसे रह पाओगे?

 

(मंच पर उपस्थित सभी पात्र फ्रीज हो जाते हैं। नेपथ्य से चेतावनी भरी आवाज़ में दृढ़ स्वर गूँजता है-)

पेड़ हैं तो साँसें हैं,

पेड़ हैं तो ख़ुशबू है,

पेड़ हैं तो ख़ुशियाँ हैं,

पेड़ हैं तो दुनिया है।

पेड़ हैं तो रंग हैं

पेड़ हैं तो बादल हैं।

पेड़ हैं तो संगीत है

कोयल की कूक और

बुलबुल का गीत है

पेड़ है तो धड़कन है

पेड़ हैं तो जीवन है

पेड़ सहेजो, पेड़ लगाओ,

धरती पर जीवन बचाओ।

 

(पर्दा गिरता है)

Photo Credit : Google

Tuesday, 7 July 2020

उम्मीद


करामत मियाँ की पाँचवीं औलाद भी लड़की पैदा हुई तो उनका दिल बैठ गया।
दाई बाहर निकलकर आई और बोली, ‘‘बधाई हो भैया, घर में बरकत आई है।’’
करामत मियाँ बुत बने बैठे रहे। 
‘‘अबकी हज़ार रुपए और धोती का जोड़ा लिए बिना न मानूँगी। पिछली बार की तरह नहीं कि डेढ़ सौ पर टरका दिया था। इस बार कोई बहाना नहीं चलेगा।’’ दाई हठ से इठलाती हुई बोली।
मग़रिब की अज़ान अभी-अभी ख़त्म हुई थी। ‘अल्लाहो अकबर’ की ध्वनि हवा में अभी पूरी तरह घुली न थी। बारिश की साँझ का पसीजता हुआ धुँधलका चारों ओर पसर रहा था। करामत मियाँ ने दुआ पढ़कर चेहरे पर हथेलियाँ मलीं और कुछ देर हाथों से चेहरा ढके बैठे रहे, फिर आह-सी भरते हुए बोले, ‘‘बुआ, कम से कम तुम तो जले पर नमक न छिड़को।’’
दाई का स्वर बदल गया--हठ की जगह सहानुभूति उमड़ आई, ‘‘ए भैया, दिल छोटा न करो। लड़का-लड़की तो सब भगवान की इच्छा है। उसकी दया से जच्चा-बच्चा दोनों ठीक हैं। जाकर एक बार देखो तो, बच्ची इतनी सुंदर है कि सारा कलेस दूर हो जाएगा।’’
करामत मियाँ कुछ न बोले। कुर्ते की जेब टटोली, जो भी था दाई के हाथ में रखकर मस्जिद की ओर बढ़ गए। नमाज़ को देर हो रही थी।
करामत मियाँ की बड़ी तमन्ना थी कि उनका एक बेटा होता। लेकिन क़िस्मत ने ऐसा मुँह फेर रखा था कि एक-एक करके पाँच बेटियाँ हो गईं, पर लड़के की आस पूरी न हुई। करामत मियाँ गाँव के ही एक मदरसे में पढ़ाते थे। मामूली-सी तनख़्वाह थी। शहर जाकर दो-चार घरों में बच्चों को अरबी पढ़ाने से भी थोड़े-बहुत पैसे मिल जाते थे। फिर भी ख़र्च पूरा न पड़ता था। 
बीवी बड़ी नेक और सलीके़मंद पाई थी। उनकी सादगी और सलीक़े की हर कोई तारीफ़ करता था। इतनी पर्देदार औरत थीं कि गाँववालों ने सूरत तो दूर, उनकी आवाज़ भी न सुनी थी। बेटियों को भी वैसे ही संस्कार दे रखे थे। करामत मियाँ उन्हें पढ़ने स्कूल नहीं भेजते थे। घर पर ही उर्दू-अरबी पढ़ा दिया करते थे। 
करामत मियाँ ख़ुद भी बड़ी सादगी से रहते थे। न किसी चीज़ का शौक़ था, न लत। जो सामने आ गया, खा लिया, जो मिल गया पहन लिया। कभी कोई ख़्वाहिश नहीं की। ज़रूरत की चीज़ें भी दस बार सोचने के बाद घर में आती थीं। न रेडियो था, न टी.वी.। अख़बार गुमटी पर पढ़ आते थे। इसके बावजूद तंगी का ऐसा आलम था कि महीना ख़त्म होते-होते हाथ ख़ाली हो जाता और क़र्ज़ अपने पैर पसारने लगता। ऐसा नहीं था कि बड़े परिवार की दुश्वारियों से करामत मियाँ अंजान थे, पर एक लड़के की ख़्वाहिश में परिवार बढ़ता जा रहा था, साथ ही ख़र्च और ज़िम्मेदारियों का बोझ भी। 
नमाज़ पढ़कर लौटते वक़्त इमाम साहब ने समझाया, ‘‘अल्लाह की मर्ज़ी पर किसी का बस नहीं चलता, करामत मियाँ। वह जो करता है, उसी में हमारी भलाई होती है। जानते हो हज़रत अली क्या फरमाते थे? कहते थे जब मेरी दुआ क़ुबूल होती है तो मैं बहुत ख़ुश होता हूँ, क्योंकि उसमें मेरी रज़ा होती है। पर जब दुआ क़ुबूल नहीं होती है तो मैं और ज़्यादा ख़ुश होता हूँ क्योंकि इसमें अल्लाह की रज़ा होती है।’’ कहते-कहते इमाम साहब के दोनों हाथ ऊपर उठ गए और होठ बुदबुदा उठे, ‘अल्लाहोअकबर...’
करामत मियाँ एक पल के लिए ख़ामोश रहे फिर कहने लगे, ‘‘समझता हूँ इमाम साहब, इसीलिए तो ख़ुद को बिखरने से बचा पाया हूँ। पर क्या करूँ? इंसानी फ़ितरत पीछा नहीं छोड़ती। कभी-कभी लगता है कि इस दुनिया में बिल्कुल तन्हा हूँ। कोई मेरा हाथ बटानेवाला नहीं। चिलकती धूप में दस किलोमीटर दूर शहर जाता हूँ तो पसीना एड़ियों तक आता है। इमाम साहब, अब उम्र हो आई। मेहनत नहीं हो पाती। काश, अल्लाह की रहमत मेरे लिए कोई सहारा निकालती।’’ करामत मियाँ ने ठंडी साँस भरी। 
‘‘एक बात कहूँ, करामत मियाँ?’’ इमाम साहब ने लंबी सफेद दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए बोले, ‘‘अपना समझकर कह रहा हूँ, बुरा मत मानना।’’
करामत मियाँ थोड़ा ठिठके लेकिन फिर होठों पर फीकी मुस्कान लाते हुए बोले, ‘‘बुरा क्या मानना,  इमाम साहब। आप तो बुज़ुर्गवार हैं। जो कहेंगे भले के लिए ही कहेंगे।’’
‘‘दरअसल...’’ इमाम साहब बात शुरू करने के लिए उपयुक्त संदर्भ तलाश रहे थे, ‘‘मैं यह कहना चाहता हूँ कि तुम अपनी लड़कियों को पढ़ाते क्यों नहीं?’’
‘‘जी...?’’ करामत मियाँ एकदम ठिठक गए।
‘‘मेरा मतलब है कि लड़का हो या लड़की उसके लिए दीनी तालीम तो ज़रूरी है, पर दुनियावी तालीम को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए।’’
करामत मियाँ के चेहरे पर भावों की हलचल थम गई और सूखे होठों पर फिर वही फीकी हँसी आहिस्ता से आ बैठी, ‘‘इमाम साहब, आपको क्या बताना, आप तो आलिम हैं। जानते ही होंगे कि औरत, खाना और पैसा--ये तीनों चीज़ें दुनिया से छिपाकर रखी जाती हैं।’’
इमाम साहब हौले से हँस दिए, ‘‘मैं भी बे-पर्दगी की बात कहाँ कर रहा हूँ? मेरा तो बस इतना मानना है कि लड़का हो या लड़की उसे ऊँची से ऊँची तालीम देनी चाहिए। तालीम इंसान के भीतर ताक़त और हिम्मत भरती है। दुश्वारियों का सामना करने का हौसला पैदा करती है।’’ 
करामत मियाँ को चुप देखकर इमाम साहब आगे कहने लगे, ‘‘फ़रहाना को तो देखा ही होगा? मेरी बेटी। अलीगढ़ में पढ़ती है। उस्ताद उससे इतना ख़ुश रहते हैं कि पूछो मत। अभी परसों ही उसने अपने उस्ताद बात कराई। कह रहे थे इंशाअल्लाह रिसर्च पूरी करते ही वहीं उसकी नौकरी के लिए सिफ़ारिश करेंगे।’’
‘‘माशाअल्लाह...’’ करामत मियाँ बुदबुदाए, ‘‘लेकिन ...फ़रहाना परदेस में अकेली तो नहीं रहती, भाई की सरपरस्ती भी तो है। एक लड़का ही होता तो क्या ग़म था, इमाम साहब?’’ 
‘‘तुम लड़की को इतना कमज़ोर क्यों समझते हो, करामत भाई? तुम्हें क्या लगता है कि लड़की बाहर निकली तो दुनिया का सामना नहीं कर पाएगी? या यह क़दम दीन के खिलाफ़ होगा? या फिर तुम्हें अपनी औलाद और अपनी परवरिश पर भरोसा नहीं? करामत मियाँ, अपने आपको बदलने और नई चीज़ों से जुड़ने की एक झूठी हिचक हमें रोके रखती है। वर्ना, एक बार उससे बाहर आकर तो देखो दुनिया कितनी सुनहरी और आसमान कितना नज़दीक लगने लगता है। रेगिस्तान में बहारें खिल उठती हैं। समंदर इतना छोटा हो जाता है कि मुट्ठी में समा जाए। करामत भाई, मौका लगे तो मेरी बातों पर ज़रूर ग़ौर करना।’’
इमाम साहब का घर आ गया था, वे चले गए। घुप्प अँधेरे में भी उनका सफेद चोग़ा कुछ दूर तक चमकता रहा।
करामत मियाँ जी कड़ा करके घर की ओर बढ़ चले। 
‘‘आ गए, चच्चा?’’ नसीबुन की लड़की रुकैया आहट पाकर बाहर निकल आई, ‘‘आज नमाज़ में बड़ी देर हो गई? चलकर बच्ची के कान में अज़ान दे दीजिए।’’
करामत मियाँ खँखारकर अंदर पहुँचे। नसीबुन ने लड़की उनकी गोद में थमा दी, ‘‘भाईजान, देखिए कितनी ख़ूबसूरत है। अल्लाह करे इसकी आमद से घर में बरकतें नािज़ल हों।’’
‘‘आमीन...!’’ करामत मियाँ बुदबुदाए।
बच्ची के कान में अज़ान सुनाकर उठते ही नसीबुन ने टोका, ‘‘भाभी को कुछ हरारत-सी महसूस हो रही है। ज़रा देख लीजिए। अगर दवा की ज़रूरत हो तो...’’
करामत मियाँ ने हिम्मत जुटाकर बीवी की ओर देखा। चेहरे की रौनक जैसे किसी ने छीन ली थी--पतझर के पत्ते जैसी पीली रंगत, होंठ नीले पड़े हुए, सिर पर चिथड़ा बँधा हुआ। आँखें टिपटिपाकर खुलतीं और कमज़ोरी की वजह से फिर ढल जातीं। करामत मियाँ को माथे पर हाथ रखते देख वह बुदबुदाईं, ‘‘फ़िक्र न... करिए... मैं... ठीक...हूँ..।’’
करामत मियाँ बाहर निकल आए और दरवाज़े पड़ी चारपाई पर बैठ गए। भादों का अँधियारा जवान हो रहा था। आस-पास से झींगुरों, मेंढकों और कीट-पतंगों की जाने कितनी जानी-अनजानी आवाज़ें आ रही थीं। आज करामत मियाँ को अँधेरा अच्छा लग रहा था। उन्हें उन दिनों की याद आने लगी, जब पहली बेटी आयशा पैदा हुई थी। आयशा भी मग़रिब बाद ही पैदा हुई थी। कितना ख़ुश थे वह। पूरा गाँव उनकी ख़ुशी में शरीक़ हुआ था। देर रात तक गैस-बत्ती में दरवाज़े पर लोगों का जमावड़ा लगा रहा था। मीलाद हुआ था और शीरिनी बटी थी। पर आज वह बिल्कुल अकेले थे और अकेले ही रहना चाहते थे। 
‘‘अब्बू, खाना खाएँगे?’’ तभी आयशा ने दरवाज़े के पर्दे की ओट से पूछा। उसे पता था कि वे मग़रिब के फ़ौरन बाद खाना खाते हैं।
करामत मियाँ का ध्यान टूटा। वह हड़बड़ाकर बोले, ‘‘नहीं, अभी नहीं, हकीम साहब के घर से लौटकर खा लूँगा।’’
वे उठे और हकीम साहब के घर की तरफ़ चल पड़े।
आयशा पर्दे की ओट हो गई। उसके सपाट चेहरे से मन में उठनेवाले भावों का पता नहीं पाया जा सकता था। आयशा ही नहीं बाक़ी लड़कियाँ भी इस भाव से रहती थीं जैसे इस घर में उनका अनधिकार प्रवेश हो। मन का बोझ उनके सिर झुकाए रखता था। न कभी किसी चीज़ की ज़िद करती थीं, न आपस में झगड़े। खेल-खिलौनों के बारे में तो सपने में भी नहीं सोचती थीं। पहनने-ओढने के नाम पर ईद में एक बार कपड़े बनते थे। उन्हीं कपड़ों को सहेजकर वे मौकों के लिए रखती थीं। करामत मियाँ अपनी बेटियों को बहुत चाहते थे। लेकिन जाने क्या बात थी कि वे उनसे प्यार के दो बोल न बोल पाते थे। जाने कौन-सी बात थी, जो उन्हें रोके रखती थी।
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वक़्त गुज़रते देर नहीं लगती। करामत मियाँ की छोटी बेटी साल भर की हो गई थी। उसने ठुमक-ठुमककर चलना भी शुरू कर दिया था। दूसरी बेटियों के मुक़ाबले यह ज़्यादा चंचल थी। शोरगुल से दिन भर घर भरा रखती थी। कभी इधर, कभी उधर। कभी यह उठाना, तो कभी वह पटकना। उस नामसझ को शायद नहीं पता था कि लड़के की चाहत रखनेवाले इस घर में उसे कैसे रहना चाहिए।
करामत मियाँ इस बार शहर के एक हकीम से दवा कर रहे थे। टोने-टोटके और झाड़-फूँक से भी अपना बैर समाप्त कर लिया था। जहाँ से कोई उम्मीद दिखाई देती कोई फौरन दौड़ पड़ते। नदी पारवाले गाँव में शहीद पीर बाबा की मज़ार थी। हर साल उर्स होता था और बड़ा मेला लगता था। कहा जाता था कि वहाँ मन्नत मानने से बड़ी-बड़ी मुरादें पूरी हो जातीं हैं। लोग रोते-रोते आते हैं और हँसते-हँसते जाते हैं। हालाँकि करामत मियाँ आज तक किसी मज़ार पर मन्नत मानने न गए थे, पर बेटे की चाहत उन्हें खींच ले गई। हर जुमेरात को वह मज़ार को घने साए में लपेटे हुए बरगद के पेड़ पर एक सूत बाँध आते।
अबकी उनकी बीवी हामला हुईं तो करामत मियाँ अतिरिक्त सतर्क हो गए। सगुन-असगुन और खान-पान का पूरा ख्याल रखना शुरू किया। इमाम साहब से तावीज़ बनवा लाए। तमाम तरह की सुनी-सुनाई ताक़ीदें देने लगे, ‘अज़ान के वक़्त खुले में मत रहो’, ‘ज़वाल के वक़्त भूल से भी मत लेटो, उस वक़्त खाओ-पियो भी नहीं’, ‘अच्छी-अच्छी बातें सोचो, कलमा पढ़ो’।
अब वह घर में अपना वक़्त ज़्यादा बिताते। बीवी का पूरा ख़्याल रखते। उनके उठने-बैठने और लेटने-उठने की पूरी परवाह रखते। 
करामत मियाँ के घर पर रहने से लड़कियों की साँसत हो गई थी। माँ के सामने तो वे जैसे चाहे लेट-बैठ सकती थीं। हर वक़्त सिर पर दुपट्टा ओढ़े रखने की मजबूरी भी नहीं थी। कभी-कभी दबे स्वरों में गुनगुना भी सकती थीं। पर करामत मियाँ के सामने उनकी नज़रें झुकी रहतीं। कान हर वक़्त उनके आदेश और वर्जनाओं के पालन में तत्पर रहते।
अल्लाह-अल्लाह करते दिन पूरे हुए। करामत मियाँ ने इस बार बड़ी दुआएँ कीं थीं। रात-रात जागकर इबादत की थी। पूरा यक़ीन था कि इस बार क़िस्मत उनके साथ इंसाफ़ करेगी। जब एक शाम बीवी ने दर्द शुरू होने की सूचना दी तो वे दाई को बुलाने फ़ौरन दौड़े गए।
करामत मियाँ को इस बार बड़ी उम्मीद थी। डरते-डरते उनका मन ख़्वाब संजोने लगा था। बाहर धीरे-धीरे अँधेरा बढ़ रहा था, पर उनके मन में रोशनी की एक धुँधली-सी उम्मीद झिलमिला रही थी। इंतज़ार में बैठे करामत मियाँ के लिए एक-एक पल पहाड़-सा हो रहा था।
तभी उस अँधेरे में किसी ने कंधे पर हाथ रखा। देखा तो इमाम साहब थे-मिठाई का डिब्बा लिए हुए।
‘‘मुबारक हो करामत मियाँ, अल्लाह के फ़ज़लो-करम से तुम्हारी भतीजी को नौकरी मिल गई। लो मिठाई खाओ।’’ इमाम साहब का नूरानी चेहरा ख़ुशी से खिला हुआ था। 
इससे पहले कि करामत मियाँ कुछ कहते कि उनके घर का दरवाज़ा खुला और दाई बाहर निकलकर आई। करामत मियाँ ने बड़ी आस से उसकी ओर देखा। दाई मरियल-सी आवाज़ में बोली, ‘‘बधाई हो भैया, घर में बरकत आई है।’’ और प्रतिक्रिया का इंतज़ार किए बिना अँधेरी गली में ओझल हो गई।
करामत मियाँ पछाड़ खाकर गिर पड़े। 
(सभी चित्र गूगल से साभार)

Friday, 10 January 2020

मिट्टी का कटोरा




दादी को हज पर जाने में अभी दो महीने बाक़ी थे, पर उसकी तैयारियाँ उन्होंने अभी से शुरू कर दी थीं। एक पुरानी अटैची, जिसके कुंडों में ताला लटक जाता था, को धूप दिखाकर, अंदर अख़बार बिछाकर तैयार कर लिया था, उसमें वह रोज़ कुछ न कुछ सामान रखा करती थीं।
उनके साथ अब्बू भी हज को जा रहे थे। दूकानदारी की व्यस्तता में वे इतना समय न पाते थे कि इस बारे में सोच सकें। जाने से पहले वह बड़े चाचा को सारी बातें समझा जाना चाहते थे। बड़े चाचा यों तो उनके साथ दूकान पर बराबर बैठते थे, सारा हिसाब-किताब भी देखते थे, पर अब्बू की वजह से उनमें बेफिक्री थी। दोपहर को खाना खाने के बहाने घर आकर आराम भी कर जाते थे। पर अब्बू के जाने के बाद ये संभव नहीं था। अब्बू को भी उनकी आदत मालूम थी इसलिए वह उनके अंदर ज़िम्मेदारी का अहसास जगा देना चाहते थे।
अब्बू जब रात को घर लौटते तो दादी उन्हें अगले दिन लानेवाले सामानों की फेहरिस्त थमा देतींµछोटे आकार की क़ुरान, पंजसूरा, तस्बीह, जा-नमाज़ और भी बहुत कुछ। एक दिन अब्बू को सामानों की लिस्ट सौंपते हुए उन्होंने कहा, ‘‘बेटा, यूसुफ़, लौटना तो एक मिट्टी का कटोरा भी लेते आना।’’

‘‘मिट्टी का कटोरा...किसलिए?’’ अब्बू ने हैरत से पूछा।
‘‘पानी पीने के लिए।’’
‘‘लेकिन आप तो हमेशा ताँबे के गिलास में पानी पीती हैं?’’
‘‘हाँ, पर सुना है कि अरब में पेड़-पौधे नहीं हैं। वहाँ गर्मी बहुत पड़ती है। रेगिस्तानी लू के थपेड़े चलते रहते हैं। ऐसे में मिट्टी के कटोरे में पानी ठंडा रहेगा।’’
अब्बू हँस पड़े, ‘‘अरे अम्मा, वहाँ के इंतज़ाम बहुत पुख़्ता हैं। वो लोग हाजियों को कोई परेशानी नहीं होने देते। आपको हर वक़्त ठंडा पानी मुहैया कराएँगे। और तो और बताते हैं कि क़ाबे शरीपफ़ का फर्श कड़ी धूप में भी गर्म नहीं होता। जाने क्या इंतज़ाम कर रखा है कि तलुओं को ऐसा अहसास होता है कि संदल पर चल रहे हों।’’
‘‘कुछ भी हो पर मुझे मिट्टी का कटोरा चाहिए। न ला सको तो मैं ख़ुद ले आऊँगी।’’ दादी ने नाराज़गी से कहा और मुँह घुमाकर तस्बीह फिराने लगीं।
‘‘ऐसा मैंने कब कहा। आपको चाहिए तो मैं ज़रूर ले आऊँगा।’’ अब्बू ने कहा और अपने कमरे की ओर चले गए।
तीन साल का माहताब बड़ी देर से अब्बू और दादी को बातें करते देख रहा था। उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। उसने दादी के पास जाकर पूछा, ‘‘दादी आप कहाँ जा रही हैं?’’
‘‘हज करने बेटा।’’
‘‘यह हज क्या होता है?’’ उसने अपनी तोतली आवाज़ में दूसरा सवाल पूछा।
‘‘बेटा, हज इस्लाम के पाँच प़फ़ज़ोर्ं में से एक है। अल्लाह ने हर उस मुसलमान पर हज फ़र्ज़ किया है जो अपनी सारी दुनियाबी ज़िम्मेदारियाँ पूरी कर चुका हो और जिसके पास इतनी दौलत हो कि वह हज का ख़र्च उठा सके।’’
माहताब को कुछ समझ नहीं आया। वह चला गया। पर दादी की बात सुन रही सबीहा ने पूछ लिया, ‘‘दादी, इस्लाम के बाक़ी चार फ़र्ज़ कौन-कौन से हैं?
दादी ख़ुश हो गई। आजकल वह यही चाहती थीं कि घर पर सिप़फ़र् दीन की बातें हो। वह चहककर बताने लगीं, ‘‘पहजा फ़र्ज़ है तौहीद, यानी कि अल्लाह एक है। सिर्फ वही इबादत के लायक़ है और मुहम्मद उसके रसूल हैं। दूसरा पांच वक़्त की नमाज़ पढ़ना, तीसरा रमज़ान के रोज़े रखना और चौथा जक़ात यानी साल भर के ख़र्चे पूरे करने के बाद जो पैसा बच रहे उसका ढाई फीसदी ग़रीबों-मिसकीनों में दान करना।’’
दादी की बातें सुनकर अब्बू भी बाहर आ गए और बोले, ‘‘बेटा, तुम जो अपनी किताबों में ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ पढ़ती हो हज का ताल्लुक उससे भी है।’’
‘‘अच्छा...!’’ सबीहा हैरत से बोली।
‘‘देखो बेटा, जब आदमी अपने क़रीब की मस्जिद में पाँच वक़्त की नमाज़ पढ़ने जाता है तो मुहल्ले के लोगों से उसका मिलना-जुलना होता है। उसे पड़ोसियों के दुख-सुख की जानकारी होती है। इसी तरह हफ्रते में एक दिन जुमे की नमाज़ में वह कई मुहल्ले के लोगों से मिलता-जुलता है। फिर जब ईद की नमाज़ होती है तो सारे शहर के लोगों से मुलाक़ात होती है। उसी तरह हज के दौरान वह पूरी दुनिया के लोगों से मिलता-जुलता है और उसके अंदर यह अहसास जगता है कि अल्लाह के दरबार में छोटा-बड़ा, गोरा-काला, अमीर-ग़रीब नहीं होता, सब बराबर हैं।’’
फिर तो बैठक जम गई। अम्मी, बड़े चाचा, छोटे चाचा सब आकर बैठ गए। देर तक बातें होती रहीं।
एक दिन हज्जिन दादी उनसे मिलने आईं। वह मुहल्ले की सबसे बुज़ुर्ग महिला थीं। दादी उन्हें बज्जो कहती थीं। बज्जो यानी बाजी, मतलब बड़ी बहन। उनकी सुना-सुनी हम सब भी उन्हें बज्जो कहने लगे थे। वह हज कर चुकी थीं। 70-75 की उम्र में भी उनकी चुस्ती-फुर्ती लोगों को हैरत में डालती थी। दुबली-पतली काठी, पूरी बत्तीसी सलामत, बालों पर सफेदी ज़रूर आ गई थी, पर अब भी वैसे ही घने थे। कमर थोड़ी झुक गई थी, पर चाल ऐसी कि 5 मिनट में किलोमीटर तय कर लें। कहीं जाना हो तो बिना किसी का सहारा लिए अकेली जातीं। पुराना मटमैला नक़ाब ओढ़े, एक हाथ में पान का बटुआ दबाए जब घर से निकलतीं तो हर कोई उन्हें सलाम बजाता।
आते ही वह दादी से बोलीं, ‘‘देखो बिलक़ीस, कपड़े-लत्ते जो भी ले जा रही हो, ले जाओ, पर छोटी-मोटी चीज़ें रखना मत भूलना। दोपट्टे की चप्पलें, वज़ू का लोटा, जा-नमाज़, नहाने-धोने का साबुन, तौलिया, मिसवाक, खाने-पीने की सूखी चीज़ें। ये चीज़ें, बहुत काम आएँगी। ले जाने वाले सामानों की एक फेहरिस्त तैयार कर लो। एक-एक सामान रखती जाओ और उस पर निशान लगाती जाओ।’’
हज्जिन दादी की बातें सुनने के लिए सब घेरकर बैठे हुए थे। बातें करने का उनका अंदाज़ ऐसा मज़ेदार होता था कि वह जब भी आतीं, सारा घर उनकी बातें सुनने बैठ जाता था। छोटा माहताब तक उनकी गोद में सवार हो जाता।
हज्जिन दादी ने बटुए से पान निकाला और मुँह में डालते हुए बोलीं, ‘‘और हाँ, ले जानेवाले बक्से में थोड़ी जगह ज़रूर बचाकर रखना। उधर से बहुत कुछ लाना होता हैµख़जूरें, आबे-ज़मज़म, जा-नमाज़ें, तस्बीह। हज्जिन बनकर लौटोगी तो लोगों को वहाँ का तबर्रुक भी तो बाँटना होगा। हाँ, नहीं तो यहाँ से सामान ठूँसकर ले गए और वहाँ से कुछ लाने की जगह ही न बची।’’ यह कहकर वह हँसने लगीं। उन्हें हँसता देख माहताब भी हँसने लगा।
धीरे-धीरे हज पर जाने की तारीख़ भी आ गई। अब्बू ने सारा सामान अंतिम रूप से पैक करते हुए कहा, ‘‘अम्मा, आपने पानी का कटोरा रख तो लिया है, पर लाने-ले जाने में यह सलामत रह पाएगा, मुझे नहीं लगता।’’ वह चाह रहे थे कि दादी मिट्टी का कटोरा अपने साथ न ले जाएँ।
‘‘तुम उसकी फिक्र मत करो,’’ दादी ने कहा, ‘‘मैंने उसे थैले में रख लिया है। थैला मेरे ही पास रहेगा। मैं पूरा ध्यान रखूँगी।’’
अब्बू चुप हो गए।
जिस दिन घर से निकलना था, रिश्तेदार और मुहल्ले के लोग मिलने आए। सबने उन्हें फूलों की माला पहनाई, मिठाइयाँ भेंट की और अपने लिए दुआ करने की दरख़्वास्त की।
दादी जब घर से निकलीं तो अम्मी उनसे लिपटकर रोने लगीं। दादी भी अपने को नहीं सँभाल सकीं। भरे गले से बोलीं, ‘‘बेटा, ज़िंदगी सलामत रही तो 40 दिन बाद लौटना होगा। मेरी जो भूल-ग़लतियाँ हों, अनजाने में कभी दिल दुखाया हो तो तो माफ़ करना।’’
‘‘अम्मा, आप...’’ अम्मी बस इतना ही कह सकीं और फफक पड़ीं। जब उनकी गाड़ी लखनऊ एअरपोर्ट की ओर रवाना हुई तो वह ओझल होने तक उसे देखती रहीं।
हज हाउस की तमाम प्रक्रियाओं से गुज़रकर दादी और अब्बू एअरपोर्ट पहुँचे। उनकी अटैचियाँ पैक होकर जहाज़ पर लदने भेज दी गईं। कंधे पर पड़ा थैला ही उनके साथ रह गया। जब वे जहाज़ पर सवार होने के लिए गेट पर पहुँचे तो उनके थैलों की जाँच की गई। दादी के थैले में मिट्टी का कटोरा देखकर जाँच करनेवाला अधिकारी व्यंग्य से मुस्करा दिया। अब्बू शर्म से पानी-पानी हो गए, लेकिन दादी पर कोई असर नहीं हुआ। वह बोलीं, ‘‘पानी पीने के लिए ले जा रही हूँ।’’ पर अधिकारी ने उनकी बात पर ध्यान न देते हुए थैला उन्हें वापस पकड़ा दिया।
मक्का में उन्हें क़ाबे के नज़दीक ही कमरा मिला था। उसकी खिड़की से क़ाबा दिखाई देता था। दादी हाथ फैला-फलाकर सबके लिए दुआ माँगतीं। कमरे से निकलते ही बाहर फ्रीज़र लगा हुआ था। अब्बू रोज़ सुबह ठंडा-ताज़ा पानी लाकर कूलर में भर लेते। पर उन्होंने ध्यान दिया कि आने के बाद एक भी दिन दादी ने मिट्टी के कटोरे में पानी नहीं पिया। हाँ, यह ज़रूर था कि वह रोज़ कटोरा निकालतीं, उसे ऐसे छूतीं जैसे किसी बच्चे को गोद में दुलार रही हों और थैले में वापस रख देतीं।
हजवाले दिन, जिस दिन उन्हें क़ाबे का तवाफ़ करना था, दादी ने कटोरे को थैले में डालकर कंधे पर लटका दिया। अब्बू चिढ़कर बोले, ‘‘अम्मा, ये सब ले जाकर क्यों बोझ बढ़ा रही हो। वहाँ वैसे भी बहुत भीड़ होगी। और आज से तीन दिन कड़ी इबादत और मेहनत के हैं। किलोमीटरों चलना पड़ेगा। सफ़ा-मरवा पहाड़ियों के बीच दौड़ना होगा। शैतान को कंकरियाँ मारनी होंगी, मिना से अराफ़ात, अराफ़ात से मुज़्दल्प़फ़ा, फिर वापस मिना लौटना...आप नहीं समझतीं कितनी परेशानी होगी।’’
दादी कुछ न बोलीं। पर उन्होंने चेहरे से ऐसे ज़ाहिर किया जैसे वह इस बारे में कोई बात नहीं करना चाहतीं। अब्बू ख़ामोश हो रहे।
दादी यों तो घुटने के दर्द से परेशान रहती थीं, पर क़ाबे में पहुँचकर उनमें जाने कहाँ की ताक़त आ गई थी। उन्होंने हज के सारे अरकान किसी बच्चे की तरह उत्साह से पूरे कर लिए।
हज के बाद धीरे-धीरे हाजियों के जत्थे वापस लौटने लगे। दादी और अब्बू का जहाज़ वापस उड़ा तो उसने आठ घंटों में उन्हें लखनऊ उतार दिया। बड़े चाचा, छोटे चाचा गाड़ी लेकर पहले ही उनके इंतज़ार में खड़े थे।
घर आकर जब सारा सामान ख़ाली किया जाने लगा तो अब्बा ने मिट्टी का कटोरा दादी को थमाते हुए कहा, ‘‘अम्मा यह रहा आपका कटोरा। हिफ़ाज़त से रख लीजिए वर्ना सामान इधर-उधर करने में टूट जाएगा।’’
‘‘कोई बात नहीं। अब इसकी ज़रूरत नहीं।’’ दादी बेफिक्री से बोलीं।
अब्बू हैरत में आ गए। उनसे न रहा गया। बोले, ‘‘अम्मा, कहाँ तो इस कटोरे को आप सहेजकर ले गई थीं और अब कह रही हैं इसकी कोई ज़रूरत नहीं? जब इस्तेमाल ही नहीं करना था तो आख़िर इसे ले क्यों गई थीं?’’
दादी एक पल के लिए ख़ामोश हो गई। उनकी सूखी आँखों में आँसू छलछला आए। उन्होंने ख़ुद को क़ाबू करते हुए कहा, ‘‘बेटा, यह मिट्टी का कटोरा दुनिया के लिए होगा। मेरे लिए यह अपने पाक वतन की मिट्टी थी। वतन से इतने दिनों दूर रहकर भी वतन का अहसास मेरे साथ था। ख़ुदा न करे, परदेश में मुझे कुछ हो भी जाता तो इस बात का सुकून रहता कि मुझे प्यारे वतन की मिट्टी नसीब हुई। बेटा मेरा बचपन, जवानी और अब बुढ़ापा इसी मिट्टी में बीता। मैं इस अहसास को अपने सीने से एक पल को जुदा नहीं कर सकती। जिस वतन की मिट्टी में खेलकर हमारी पीढ़ियाँ गुज़रीं, उसे मैं ऐसे कैसे छोड़ देती?’’
दादी बोलती रहीं और सब अपनी आँखों में आँसू लिए उनके जज़्बात सुनते रहे।